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खतरे में जलस्त्रोतो का अस्तित्व:देखभाल के अभाव में हुए दुर्दशा का शिकार, 50 से ज्यादा गांवो में वर्तमान में परम्परागत जल स्त्रोत बेकार पड़े

सवाई माधोपुरएक महीने पहले
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कचरा पात्र बना एक पुराना कुआ। - Dainik Bhaskar
कचरा पात्र बना एक पुराना कुआ।

वो भी एक पुराना समय था जब परम्परागत जल स्त्रोतों कुए व बावड़ियो पर पणिहारियों के पायल के साथ चहल पहल रहती थी। लोग कुओं से पेयजल के लिए निर्भर रहा करते थे, लेकिन उन परम्परागत जल स्त्रोतों पर सुनसान व वीरान का पहरा लगने लगा है। अब यह बीते जमाने की बात हो गए है।

वर्तमान में हैडपंप व नलकूप जैसे जल स्त्रोतों ने लोगों के बीच अपनी जगह बना ली है। परम्परागत जल स्त्रोतों की सार सम्भाल नहीं होने से वे दुर्दशा का शिकार बन गए है। वर्तमान में परम्परागत जल स्त्रोतों को या तो जमीन के नीचे दबा कर बंद कर दिया गया है।

कुए को बन्द कर लगाया जाल।
कुए को बन्द कर लगाया जाल।

फिर वे जीर्ण शीर्ण अवस्था में है उपयोग में नहीं आने पर इस प्रकार के जलस्त्रोत अब अतीत का हिस्सा व इतिहास बनकर रह गए है। परम्परागत जलस्त्रोत हमारे देश की संस्कृति का हिस्सा बने हुए थे। जो की अब जनसमुदाय , शासन व प्रशासन की उदासीनता के चलते नकारा हो चले है। मलारना चौड़ कस्बे में प्रशासन द्वारा सार संभाल नहीं होने से एक दर्जन से ज्यादा कुओ का अस्तित्व मिट चुका है।

खतरे में जलस्त्रोतो का अस्तित्व:

जिले में करीब 50 से ज्यादा गांवो में वर्तमान में परम्परागत जल स्त्रोत नकारा पड़े हुए है। आधुनिकता के चलते वर्तमान में परम्परागत जल स्त्रोतों के हाल बेहाल है। इन पुराने कुओ की सार सम्भाल नहीं होने से या तो वे कचरा पात्र बने हुए है या उनकी दीवारे गिर चुकी है

इन जगहों पर कुओं का अस्तित्व मिटा:

मलारना चौड़ कस्बे में एक दर्जन से ज्यादा परम्परागत जल स्त्रोत रहे कुओ का अस्तित्व मिटने के साथ ही यहां मौजूद तालाबों का भी अतिक्रमण के चलते अस्तित्व मिट रहा है कस्बे में मुख्यतया बस स्टैंड स्थित खारा कुएं में स्थानीय लोगो द्वारा कचरा डाला जा रहा है। दुर्गासागर तालाब के समीप मुख्य बाजार में स्थित कुए पर जाल लगाकर उसको बंद कर दिया गया है । इसी के साथ ही पंचायत परिसर स्थित कुए को मिट्टी से भरकर उस पर भवन निर्माण किया जा चुका है।

मलारना चौड़ का दुर्गासागर तालाब।
मलारना चौड़ का दुर्गासागर तालाब।

इसी प्रकार तालाबों की नगरी के नाम से जानने वाले मलारना चौड़ कस्बे में अब तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। मुख्यतया दुर्गासागर तालाब पर लोगो द्वारा अतिक्रमण करने से यह सिकुड़ता जा रहा है वही आम लोग पेयजल के लिए प्रशासन को लगातार दोषी ठहराने के साथ ही पेयजल व्यवस्था नहीं होने का आरोप लगाते है।

बनी रहती थी अपनत्व की भावना:

मलारना चौड़ कस्बे की रहने वाली 93 वर्षीय राजबाई देवी मीना ने पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कुओं पर पानी लेने के लिए आस पास के गावों से लोग आते थे लोकगीत गाते हुए कुओं से पानी निकालते थे महिलाएं पानी ले जाती थी इससे आपसी मिलन रहने के साथ समाचार मिलते रहते थे जिससे अपनत्व की भावना बनी रहती थी।

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