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धर्म-कर्म:कल से अधिकमास, नहीं होंगे शुभ व मांगलिक कार्य

सवाई माधोपुर7 दिन पहले
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  • मलमास को अधिक मास व पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, यह हर तीन वर्ष में एक बार आता हैं

मलमास 18 सितंबर 2020 से आरंभ हो रहे हैं। मलमास को अधिक मास व पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। धर्म-कर्म की दृष्टि से मलमास का विशेष महत्व है। आचार्य पंडित ताराचंद शास्त्री ने बताया कि मलमास 18 सितंबर से आरंभ हो रहा है और 16 अक्टूबर को समाप्त होगा। अगले दिन 17 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का पर्व आरंभ हो जाएगा।मलमास का संबंध ग्रहों की चाल से है। पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास का आधार सूर्य और चंद्रमा की चाल से है। सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। इन दोनों वर्षों के बीच 11 दिनों का अंतर होता है। यही अंतर तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास आता है। इसी को मलमास कहा जाता है।उन्होंने बताया कि मलमास में कई ऐसे कार्य हैं, जिन्हें नहीं करना चाहिए। मलमास में किसी भी शुभ और नया कार्य नहीं किया जाता है। पंचांग के अनुसार मलमास प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार आता है। मलमास में शादी-विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि जैसे शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। शुभ कार्यों को मलमास मे निषेध माना गया है। वहीं मलमास में पूजा-पाठ, व्रत, उपासना, दान और साधना को सर्वोत्तम माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मलमास में भगवान का स्मरण करना चाहिए। अधिक मास में किए गए दान आदि का कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। इस मास को आत्म की शुद्धि से भी जोड़कर देखा जाता है।अधिक मास में व्यक्ति को मन की शुद्धि के लिए भी प्रयास करने चाहिए। आत्म चिंतन करके मानव कल्याण की दिशा में विचार करने चाहिए। उन्होंने बताया कि मलमास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस समय चतुर्मास चल रहा है। चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और विश्राम करने के लिए पाताल लोक में चले जाते हैं। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।अधिक मास में भगवान विष्णु का पूजन देगा कई गुना फल: अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है, इसीलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। शास्त्रों में इस मास में भगवान विष्णु का पूजन कई गुना फल दाई बताया गया है। प्राचीन धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में विष्णु स्वरुप शालिग्राम के साथ श्री महालक्ष्मी स्वरूपा श्रीयंत्र का पूजन संयुक्त रूप से करने का काफी महत्व बताया गया है। जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी होते हैं, वहां भगवान श्री हरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती है।ऐसे करें पूजा: पुरुषोत्तम मास के पहले दिन प्रातः काल नित्य नियम से निवृत हो श्वेत या पीले वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके किसी ताम्र पात्र में पुष्प बिछाकर शालिग्राम स्थापित करें। फिर शुद्धजल में गंगाजल मिलाकर, श्री विष्णु जी का ध्यान करते हुए स्नान कराएं। इसके बाद शालिग्राम विग्रह पर चन्दन लगाकर तुलसी पत्र, सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य, फल आदि अर्पित करें। शक्ति ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करने के उपरान्त कपूर से आरती करें। अभिषेक के जल को स्वयं एवं परिवार के सदस्यों को ग्रहण कराएं। इसी के साथ श्रीमदभागवत कथा, गीता का पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ पुरुषोत्तम मास में करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।कैसे शालिग्राम रखें: छत्राकार शालग्राम के पूजन से राज्य सुख आदि एवं वर्तुलाकार की पूजा से धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। विकृत फटे हुए, शूल के नोक के समान, शकट के आकार के पीलापन लिए हुए, भग्न चक्र वाले शालिग्राम दुःख, दरिद्रता, व्याधि, हानि के कारण बनते हैं। अतः इन्हें घर, मंदिर में नहीं रखना चाहिए। शालिग्राम, तुलसी और शंख को जो व्यक्ति श्रद्धा से सुरक्षित रखता है, उससे भगवान श्री हरि बहुत प्रेम करते हैं।

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