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बिना किसी भू-उपयोग परिवर्तन के प्लॉट काटे:सवाई का मास्टर प्लान तैयार, मंजूरी से पहले ही माफिया सक्रिय, ग्रीनबेल्ट के लिए प्रस्तावित जमीन पर प्लॉट काटे

सवाई माधोपुरएक दिन पहले
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  • भास्कर मुद्दा - बिना भू-उपयोग परिवर्तन मंदिर माफी की जमीन पर भी आबाद की जा रही है बस्ती

जिला मुख्यालय का मास्टर प्लान बनकर मंजूरी के लिए तैयार है, लेकिन को मंजूरी मिले, इससे पहले ही इसकी धज्जियां उड़ाने के लिए एक माफिया प्लान भी शहर में काम कर रहा है। इस माफिया प्लान के आगे न तो कोई नियम काम कर रहा है और न ही सरकारी तंत्र। आलम यह है कि न केवल मास्टर प्लान में ग्रीनबेल्ट के लिए प्रस्तावित जमीन पर बिना किसी भू-उपयोग परिवर्तन के प्लॉट काटे जा रहे हैं, मंदिर माफी की जमीन पर कॉलोनी आबाद की जा रही है। चिंता की बात तो यह भी है कि जिस जमीन पर यह कारगुजारी की जा रही है वह जमीन रणथंभौर अभयारण्य के लिए आरक्षित 500 मीटर के दायरे में आने के कारण पूर्ण रूप से निर्माण के लिए प्रतिबंधित भी है।जून 2018 में हुआ था प्रारूप का प्रकाशनदैनिक भास्कर ने 26 अगस्त 2020 को पहली बार शहर की ग्रीन बेल्ट की जमीन के संरक्षण के लिए मुद्दा उठाया था। सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर वर्ष 2018 में 2035 तक का मास्टर प्लान बना कर उसे 28 जून 2018 को इसे के प्रारूप का प्रकाशन भी कर दिया। इससे पूर्व के मास्टर प्लान वर्ष 2006 में मंजूर मास्टर प्लान में भी इस जमीन को ग्रीन बेल्ट के लिए सुरक्षित रखा था। शहर में ग्रीन बेल्ट के लिए आरक्षित इसी प्रकार की एक जमीन को बचाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता हरिप्रसाद योगी ने आवाज उठाई है। योगी ने बताया कि जिला मुख्यालय के बीच आलनपुर दुर्ग पैलेस से एक सड़क होटल ताज तक जाती है। इस मार्ग के पूर्व की तरफ रणथंभौर अभयारण्य के लिए आरक्षित रणथंभौर अभयारण्य के लिए आरक्षित 500 मीटर के दायरे में कई कृषि जमीन है। इस जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा कालागौरा भैरव मंदिर के नाम दर्ज है। यह जमीन करीब 200 बीघा बताई जाती है। योगी के अनुसार इस जमीन में तीन बड़ी कानूनी अड़चन होने कारण इस पर न तो कॉलोनी बसाई जा सकती है और न ही इसका किसी दूसरे कार्य के लिए उपयोग किया जा सकता है।

राजस्व के साथ वन विभाग की भी अनदेखी पहला यह जमीन वर्ष 2006 के मंजूर मास्टर प्लान एवं वर्ष 2018 से 2035 तक के प्रस्तावित मास्टर प्लान में शहर के पर्यावरण की रक्षा के लिए ग्रीन बेल्ट के नाम से आरक्षित की गई है। इसमें किसी प्रकार का कोई बदलाव नहीं किया गया है। बिना मास्टर प्लान में बदलाव एवं बिना मंजूरी के लिए कोई भी निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है।> दूसरा इस जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा 200 बीघा काला-गौर भैरव मंदिर के लिए राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार मंदिर की जमीन मूर्ति के नाम होती है और उसे नाबालिग मानते हुए उसका किसी भी कारण से नामातंकरण दूसरे के नाम से नहीं खोला जा सकता है। इसका बेचान भी संभव नहीं है। इस जमीन का संरक्षक कलेक्टर को होता है। फिर इस जमीन पर कॉलोनी कौन काटकर वहां मकान बनवा रहा है। तीसरा कारण यह है कि यह पूरी जमीन रणथंभौर अभयारण्य की सीमा के 500 मीटर के दायरे में आता है। इस कारण इस जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण करने या कॉलोनी आबाद करने पर पूरी तरह पाबंदी लगी हुई है। ऐसे में अगर इस दायरे में अगर कोई निर्माण बिना वन विभाग की मंजूरी के भी किया जाता है तो उसे अवैध मान कर हाथोंहाथ तोड़ने का प्रावधान है, लेकिन इस मामले में राजस्व विभाग के साथ वन विभाग भी आंखें मूंदे हुए हैं।शिकायत के बाद हरकत में आया प्रशासन> मामले में हरिप्रसाद योगी द्वारा शिकायत कर मोर्चा खोलने के बाद 24 जून 2019 को पहली शिकायत कलेक्टर को की। इस पर कार्रवाई नहीं होने पर अंतराल से पांच पत्र लिखे गए, तब जाकर प्रशासन की पहली कलम चली। 17 दिसंबर 2019 को मामला दर्ज कर यूआईटी से जांच रिपोर्ट मांगी गई। इसमें यूआईटी ने प्रशासन को जवाब देते हुए बताया कि शिकायत सही है और वहां गलत तरीके से निर्माण हो रहा है। यूआईटी ने इस बारे में शीघ्र कार्रवाई करने का आग्रह भी किया, लेकिन हुआ कुछ नहीं। > यहां से निराश योगी ने यह मामला पुलिस महानिदेशक एसीबी के समक्ष रखा गया, लेकिन वहां पर भी यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 8 अक्टूबर 2020 को फिर यह मामला उठा और वर्तमान कलेक्टर ने इस मामले में संज्ञान लिया।> 8 अक्टूबर 2020 को अतिरिक्त जिला कलेक्टर भवानी सिंह पंवार के हस्ताक्षरों से एक पत्र तहसीलदार सवाई माधोपुर को जारी किया है। इस पत्र में पुरानी शिकायतों एवं पत्रों का हवाला देते हुए लिखा है कि यह मामला एक वर्ष तीन माह पश्चात भी अनिस्तारित है, जो बहुत ही खेदजनक है। मामले में एडीएम ने 8 अक्टूबर को ही इसकी वास्तविक रिपोर्ट उनके कार्यालय में मांगी गई थी, लेकिन उ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

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