जंगल में बाघों के बीच माता के धाम:रणथम्भौर बाघ परियोजना में कई जगहों पर माता के मंदिर, वन्य जीवों के मूवमेंट के कारण कम होता है धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन

सवाई माधोपुर3 दिन पहले
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कचीदा माता रणथम्भौर। - Dainik Bhaskar
कचीदा माता रणथम्भौर।

रणथम्भौर बाघों के लिए देश-विदेश में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। रणथम्भौर बाघ परियोजना क्षेत्र में वन्य जीवों के साथ ही मां शक्ति के विभिन्न रूपों के धाम है। इन स्थलों की देखरेख व सार संभाल का काम वन विभाग की ओर से किया जाता है। मंदिर जंगल में होने के कारण यहां धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कम ही होता है तो कुछ धार्मिक स्थानों की देखरेख समिति की ओर से भी की जा रही है। फिलहाल मां शक्ति की आराधना का त्योहार नवरात्र चल रहा है।

कचीदा माता मंदिर
रणथम्भौर की कुंडेरा रेंज में कचीदा माता का मंदिर स्थित है। यहां पर ग्रामीणों द्वारा ही पूजा अर्चना की जाती है। वन विभाग की ओर से भी क्षेत्र में लगातार पेट्रोलिंग भी कराई जाती है। कुछ महीनों पहले वन विभाग की ओर से मोरम बिछाकर यहां रास्ता भी तैयार करवाया गया था। रणथम्भौर के जोन नंबर 5 में टाइगर हैबिटाट के कारण ज्यादा लोगों की आवाजाही नहीं होती है। कुछ लोगों को माता की पूजा के लिए वन विभाग की ओर से अनुमति दी गई है।

सीता माता मंदिर।
सीता माता मंदिर।

सीतामाता मंदिर
रणथम्भौर टाइगर रिजर्व की फलौदी रेंज के नीमली गांव के पास स्थित सीता माता मंदिर में साल भर कई आयोजन होते हैं। सीता माता मंदिर में भादवा की पूर्णिमा को मेले का आयोजन भी होता है। फिलहाल कोरोना संक्रमण के कारण पिछले 2 साल से मेले का आयोजन नहीं हो पा रहा है। यहां की देखरेख व विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन सीता माता मंदिर समिति की ओर से किया जाता है। सालभर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। बारिश के मौसम में यहां पहाड़ी से झरना बहता है। ऐसे में बारिश के दिनों में बड़ी संख्या में सैलानी सैर सपाटे व पिकनिक के लिए भी यहां आते हैं।

कंकाली माता मंदिर
रणथम्भौर दुर्ग में अति प्राचीन शक्ति आराधना का केन्द्र है। जहां साल भर लोग काली माता के दर्शन करने आते हैं। नवरात्रों में यहां माता के दर्शन करने दूर-दूर से भक्त आते हैं। रणथम्भौर आने वाले सैलानियों की यात्रा कंकाली माता के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है।

गुढा माता मंदिर
रणथम्भौर में आरओपीटी रेंज की गुढा वन चौकी के पास गुढा माता का मंदिर है। गुढा वन चौकी के पीछे ही एक चबूतरा बना हुआ है। जहां वन विभाग की ओर से रोजाना पूजा अर्चना की जाती है। रणथम्भौर के जोन नंबर 2 में टाइगर हैबिटाट में होने के कारण यहां श्रद्धालुओं नहीं आते हैं, लेकिन वन विभाग की ओर से ड्यूटी पर तैनात वनकर्मी नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा अर्चना करते हैं।

जयंती माता खंडार।
जयंती माता खंडार।

खण्डार रेंज में लंगड़ी माता का मन्दिर
रणथम्भौर की खण्डार रेंज में जंगल में लंगड़ी माता का मंदिर है। यहां भी एक छोटे चबूतरे में माता का स्थान बना हुआ है। यहां भी ग्रामीणों व वन विभाग की ओर से ही पूजा अर्चना की जाती है। ग्रामीणों में इस स्थान की खासी मान्यता है। हालांकि जंगल में होने के कारण यहां किसी प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन नहीं होता है।

तारागढ़ दुर्ग में जयंती माता का मंदिर
रणथम्भौर की खण्डार रेंज में तारागढ़ दुर्ग में जयंती माता का मंदिर है। यहां भी साल भर ग्रामीण पहाड़ों में दुर्गम रास्ते से होकर माता के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र के अवसर पर ग्रामीणों द्वारा यहां माता की जोत भी जलाई जाती है। मंदिर घने जंगल में होने के कारण और वन्यजीवों का मूवमेंट बने रहने के कारण यहां कम ही लोग पहुंचते हैं। यहां भी पिछले दो साल से कोरोना की वजह से मेले का आयोजन नहीं हो पाया है।

करनपुर माता मंदिर
रणथम्भौर बाघ परियोजना द्वितीय में करनपुर में माता का मंदिर है। यहां की सबसे खास बात यह है कि माता की पूजा केवल वहीं लोग करते हैं, जिनकी यह कुल देवी है। इसके अलावा अन्य लोगों को इस मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता है। अगर गलती से कोई व्यक्ति इस मंदिर के दर्शन कर लेता है या फिर माता की जोत को देख लेता है तो उसे यहीं की मान्यता माननी पड़ती है। मान्यता नहीं मानने पर माता रूष्ट हो जाती है। ऐसा लोगों का मानना है।

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