कांग्रेस जिलाध्यक्ष को लेकर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मियां:कोई पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के सहारे तो कई CM गहलोत से कर रहे हैं संपर्क

टोंक6 महीने पहले
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कांग्रेस जिलाध्यक्ष के संभावित चेहरे बाएं से क्रमवार प्रथम लक्ष्मण गाता, कमल लोदी, कुलदीप सिंह राजावत,सुनील बंसल और आखरी में एडवोकेट महावीर तोगड़ा। (फाइल फोटो)। - Dainik Bhaskar
कांग्रेस जिलाध्यक्ष के संभावित चेहरे बाएं से क्रमवार प्रथम लक्ष्मण गाता, कमल लोदी, कुलदीप सिंह राजावत,सुनील बंसल और आखरी में एडवोकेट महावीर तोगड़ा। (फाइल फोटो)।

13 जिलों में कांग्रेस जिलाध्यक्ष की नियुक्ति होने के साथ ही जिले में भी जिलाध्यक्ष को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनने के लिए कोई सीधे तौर पर तो कोई राजनीतिक गॉडफादर के जरिए अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट से संपर्क साध रहे हैं। कोई वर्षों से कांग्रेस पार्टी की सेवा करने की बात करके तो कोई जातिगत समीकरण का हवाला देकर जिलाध्यक्ष बनने की जुगत में लगे हुए है। जिले की कांग्रेस पार्टी दो गुटों के बीच बटी दिखाई दे रही है। दोनों ही गुटों के नेता जिलाध्यक्ष बनने के लिए जयपुर से दिल्ली तक चक्कर लगा रहे है।

पायलट के लिए चुनौती से कम नहीं जिलाध्यक्ष बनवाना
पूर्व डिप्टी सीएम टोंक विधायक सचिन पायलट और सीएम अशोक गहलोत के बीच जिस तरह से राजनीतिक मतभेद है। उसको लेकर सचिन पायलट के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र वाले जिले में पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाना चुनौती से कम नहीं है। उनके समर्थकों को भी यह चिंता सता रही है कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, सीएम गहलोत के खास माने जाते है। ऐसे में डोटासरा, पायलट के कट्टर समर्थक के बजाए अन्य नेता को जिलाध्यक्ष बना दें तो पायलट को राजनीति के तौर पर नीचा देखना पड़ेगा।

यह नेता बन सकते है जिलाध्यक्ष
भास्कर ने कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं आदि से बात कि तो प्रमुख रूप से जिला अध्यक्ष की दौड़ में पूर्व जिलाध्यक्ष लक्ष्मण गाता, पूर्व निवाई विधायक कमल लोदी और एडवोकेट महावीर तोगड़ा के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश सचिव कुलदीप सिंह राजावत और सुनील बंसल का नाम भी संभावित कांग्रेस जिलाध्यक्ष के रूप में सामने आए हैं। लेकिन इनमे से कुलदीप सिंह राजावत तो पायलट के बेहद करीबी सउद सईदी की तरह जिला अध्यक्ष से ज्यादा राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त किसी बोर्ड के चेयरमैन समेत अन्य लाल बत्ती वाला बडा पद पाने के प्रयास में है।

किस नेता का क्या है मजबूत और कमजोर पक्ष

लक्ष्मण गाता: गाता का जिलाध्यक्ष बनने के लिए मजबूत पक्ष राजनीति के तौर पर टोंक विधायक पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के कट्टर समर्थक और जातिगत आधार है। ये जाट समुदाय से आते हुआ। जिले में भी इस समाज का काफी मतदाता है। साथ ही पार्टी में वर्षों से जुड़े हुए है। साधा जीवन है। पहनावा भी सिंपल है। आज भी देशी अंदाज में साफा बांधते है। कार्यकारिणी भंग होने से पहले भी ये ही जिलाध्यक्ष थे। इनका कमजोर पक्ष पायलट के प्रति एक तरफा निष्ठा, जिले भर में सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं में कम पकड़ होना है। इसके अलावा कांग्रेस जिलाध्यक्ष रहते हुए इनके पैतृक गांव में इनके समाज के कुछ लोगों की ओर से शमशान में दलित के शव का अंतिम संस्कार करने से मना करने के मामले में इनके प्रति दलित वर्ग में नाराजगी। हालांकि जांच में इनका इस प्रकरण कोई हाथ नहीं होना पाया गया था।

कमल लोदी: लोदी का जिलाध्यक्ष बनने के लिए मजबूत पक्ष है दोनों पायलट और अशोक गहलोत के गुटों में बराबर तालमेल। ये गुट के बजाए कांग्रेस पार्टी की राजनीति करते हैं। पूर्व डिप्टी सीएम बनवारी लाल बैरवा के भतीजे है, इसलिए लोगों का जुड़ाव पहले से ही है। निवाई से कांग्रेस के विधायक रहे है। जिले में एससी वर्ग में सबसे ज्यादा बैरवा समाज है और उनकी पकड़ अच्छी है। इन्हें भी इनके चाचा पूर्व डिप्टी सीएम बनवारी लाल बैरवा की तरह ही सरल स्वभाव के रूप में मानते हैं। इनका कमजोर पक्ष है राजनीति तौर पर निवाई विधायक प्रशांत बैरवा से तालमेल नहीं होना। प्रशांत बैरवा वर्तमान में विधायक है और जिस तरह से सरकार बनाए रखने में एक एक एमएलए सीएम के लिए महत्वपूर्ण है, उसी तरह इनकी मांगे भी सीएम या फिर प्रदेश अध्यक्ष इग्नोर नहीं कर सकते है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते निवाई विधायक प्रशांत बैरवा कमल लोदी को जिला अध्यक्ष बनते नहीं देखना चाहेंगे।

एडवोकेट महावीर तोगड़ा: एडवोकेट तोगडा का जिलाध्यक्ष बनने के लिए मजबूत पक्ष है। इनके कांग्रेस पार्टी में अनुशासित सिपाही की तरह काम करना और सरल स्वभाव। यह भी किसी गुटबाजी में नहीं पड़ते है। यह कांग्रेस पार्टी की विचारधारा को सर्वोपरि मानते है। ये जाट समाज से है और इनकी जाट समाज ही नहीं सभी वर्गों के लोगों में अच्छी पकड़ है। तथ्यात्मक बात करते है।इनका कमजोर पक्ष वैसे तो इतना नहीं है, लेकिन इनका राजनीतिक दायरा सीधे तौर जिले भर में नहीं है। वकालत में काफी व्यस्त रहते हैं। इनका राजनीति में बड़े स्तर पर गॉडफादर नहीं है।

कुलदीप सिंह राजावत: पूर्व कांग्रेस प्रदेश सचिव राजावत का जिलाध्यक्ष बनने के लिए मजबूत पक्ष युवा वर्ग में अच्छी पकड़ का होना और अधिकांश निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को नाम से जानना है। ये विश्वविद्यालय जयपुर की छात्र राजनीति से सक्रिय है। इन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। उसके बाद से कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए है। ये जिला परिषद सदस्य भी रहे है। पार्टी से जिला प्रमुख का चुनाव लड़ा था। बहुमत नहीं होने से जिला प्रमुख नहीं बन पाए थे। देवली उनियारा से विधायक के टिकट की प्रबल दावेदारी रही थी। इनके बारे में यह भी कहा जाता है कि कोई कार्यकर्ता किसी काम से इनके पास गया और इन्होंने हां कर दी तो फिर उस काम करवाने के लिए पूरी भागदौड़ करते है। कमजोर पक्ष जातिगत समीकरण इनके पक्ष में नहीं है, जो राजनीति का सबसे मजबूत आधार है।

सुनील बंसल: यह भी छात्र राजनीति से ही कांग्रेस से जुड़े हुए हैं। 20 साल की राजनीति में कांग्रेस के पार्षद से लेकर पार्टी में महासचिव रह चुके हैं। उनका नाम टोंक शहर के नए बड़े उद्यमियों में शामिल है। यूथ कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ है। ये जिले में प्रभाव रखने वाले हर बड़े नेताओं पूर्व केंद्रीय मंत्री नमो नारायण मीणा, पूर्व डिप्टी सीएम टोंक विधायक सचिन पायलट जैसे बड़े नेताओं के पास एक अच्छे समर्थक के रूप में जगह बना लेते है। चुनाव के दौरान इनका टोंक विधायक प्रत्याशी और टोंक नगर परिषद सभापति के संभावित नाम में चर्चा चली थी। इनका कमजोर पक्ष जातिगत आधार और सीनियरिटी है। जैन समाज शहरी क्षेत्र में तो अच्छी तादाद में है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इतने ज्यादा नहीं है। पार्टी जिले की कमान सौंपते समय जातिगत आधार को भी तवज्जो देती है।