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  • The Work Of Weaving Cloth And Carcass, Which Has Its Own Identity In Foreign Countries, Can Again Become A Major Source Of Self employment.

स्वरोजगार:विदेशों तक में कभी अपनी पहचान रखने वाला कपड़ा एवं दरी बुनाई का कार्य फिर स्वरोज़गार का बन सकता है प्रमुख साधन

टोंकएक वर्ष पहले
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  • कभी 40 हजार लोगों के रोजगार का थी साधन बनने वाली कपड़ा बुनाई की मशीनों पर जमी धूल

कभी कैदियों तक को जेल में कपड़ा, दरी आदि बुनाई का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया जाता था, लेकिन आज स्थितियां ये हैं कि कपड़ा एवं दरी बुनाई की मशीनें कबाड़ होकर बेकार पड़ी है। 30 साल पहले तक कपड़ा एवं दरी बुनाई का कार्य परवान था। लेकिन अब हालत ये हैं कि कपड़ा एवं दरी बुनने वाली मशीनें कबाड़ चुकी हैं। हालांकि अभी कई जानकार मानते हैं कि जिले में कपड़ा एवं दरी का कार्य फिर लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही स्वरोज़गार का साधन बन सकता है। लेकिन इसके लिए सरकारी स्तर पर विशेष पैकेज दिए जाने की जरुरत है। जबकि सरकार द्वारा बुनकर कार्ड धारकों को 1 लाख रुपए तक के ऋण पर ब्याज का शत-प्रतिशत पुनर्भरण अनुदान के रुप में दिया जा रहा है, जो अपर्याप्त माना जा रहा है। साथ ही कई बुनकर इस कार्य को पूर्व में छोड़ चुके हैं, ऐसे में उनके पास अब कार्ड भी नहीं है, तो वो लाभ लेने की स्थिति में भी नहीं है। खादी बुनकर रशीद मियां का कहना है कि 95 से पहले तक हजारों की संख्या में कपड़ा एवं दरी बुनाई के कार्य से जिलेभर में लोग जुड़े हुए थे। लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इस क्षेत्र में सरकार जो अनुदान दे रही है, वो अपर्याप्त है। इस उद्योग को फिर से जीवित करने के लिए विशेष योजना के साथ ही आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण व नई मशीनों की खरीद में अनुदान दिया जाए, तो इस को फिर जीवित किया जा सकता है। करीब 30-35 साल पहले तक करीब हजारों लोग इस कार्य से जुड़े हुए थे।सौ साल पहले विदेशों में रही पहचान :एक समय में कपड़ा, दरी एवं गलीचा, नमदा का कार्य टोंक में इतना प्रचलित था एवं रोजगार का प्रमुख साधन हुआ करता था। यहीं कारण था कि कैदियों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए जेल में भी इसका प्रशिक्षण दिया जाता था। इसबात को एन्यूअल रिपोर्ट ओन द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ द टोंक स्टेट 1917-18 एवं 1923-24 में उल्लेख किया गया। इसका हवाला रियासत टोंक के हुकमराने ज़ीशान भाग प्रथम में भी दिया गया।लुप्त होने के कारणरशीद मियां सहित कई खादी बुनकरों ने बताया कि करीब 30 साल पहले तक ये कपड़ा बुनाई एवं दरी का कार्य काफी परवान पर रहा। लेकिन उसके बाद से सरकार ने धागे में अनुदान देना बंद कर दिया। जो योजनाएं आई उसका बुनकरों तक लाभ नहीं पहुंच पाया। आज मशीन करीब पांच लाख रुपए तक की आ रही है। ऐसे में स्वरोजगार का प्रमुख साधन धीरे-धीरे ख़त्म हो गया। कपड़ा एवं दरी बुनाई की मशीनें बिजली, डीजल, पेट्रोल आदि से नहीं चलती है। उसमें सभी कार्य हाथ एवं पैरों के माध्यम से होता है। इसमें कच्चें माल धागा के अतिरिक्त कोई विशेष लागत नहीं आती है। ऐसे में हम गमछा, छोटी दरी सहित कई ऐसे आइटम तैयार कर सकते हैं, जो घरेलू उपयोग में आते हैं।

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