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इस बार नहीं होगा दड़ा महोत्सव:प्रदेश में अकाल होगा या सुकाल, इस साल दड़ा नहीं बता पाएगा

टोंक4 दिन पहले
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  • 1956 व 2002-03 में अकाल गोलपोस्ट की ओर गया था दड़ा, तभी से इसका महत्त्व और प्रमाणिकता बढ़ी

महावीर बैरवा | प्रदेश में अकाल पड़ेगा या खेतों में फसलें लहलहाएंगी? इसकी भविष्यवाणी करने वाला आवां का दड़ा भी कोविड-19 का शिकार हो गया है, इसलिए पूरे देश में चर्चित और अनोखा यह खेल इस बार नहीं खेला जाएगा। जानकारों की मानें तो ऐसा पहली बार होगा।इस संबंध में आंवा के सरपंच दिव्यांश महेंद्र भारद्वाज से जानकारी ली तो उन्होंने भी इसकी पुष्टि की है। कोरोना गाइड लाइन के चलते ही ये फ़ैसला लिया गया है, लेकिन इसकी जानकारी अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई, इसीलिए बारह पुरे के हज़ारों खिलाड़ी आने वाली 14 जनवरी मकर संक्रांति को सज-धज कर दड़ा खेलने के लिए बेताब है। दड़ा एक 70 किलो वजनी फ़ुटबाल नुमा गेंद है। जिसे हर साल टोंक जिले के आवां और आवां के पड़ोसी गांव बराह पुरा के क़रीब 5 हज़ार खिलाड़ी फुटबाल की भाँति खेलते है। गाव के अखनिया दरवाज़ा और दूनी दरवाज़ा बाकायदा गोल पोस्ट के रूप में इस्तेमाल होते है। दड़ा यदि अखनिया गोल पोस्ट की ओर चला गया तो समझो अकाल और दूनी गोल पोस्ट की ओर आ गया तो सुकाल। गांव के लोग बताते है कि 1956 में दड़ा अखनिया दरवाजे की और चला गया था, इसलिए उस समय छपनियां अकाल पड़ा। इसी प्रकार 2002-3 में भी दड़े ने अखनिया दरवाजे की ओर रुख़ किया तो प्रदेश में अकाल के हालत पैदा हुए।लोगों बताते है कि आवां में दड़ा करीब साै साल से पहले गांव की बसावट के साथ से ही खेला जा रहा है। यहां के राजा सरदार सिंह तो दड़े के माध्यम से अपनी सेना के लिए पैदल सैनिकों का चयन भी कर लेते थे। जो दड़े में अच्छा खेलता वे उसे अपनी सेना में भर्ती कर लेते थे। दड़ा खेलने की परम्परा को राव राजा सरदार सिंह ने ही आगे बढ़ाया। उसके बाद उनकी गद्दी पर आये रावराजा राजेन्द्र सिंह ने भी इस सिलसिले को जारी रखा।फिर जयेन्द्र सिंह ने इस परम्परा को लगातार ज़ारी रखा तो आज यह अद्भुत और रोचक खेल जिंदा है।आवां के गोपाल चौक में मकर संक्रांति पर खेले जाने वाले अजब-ग़ज़ब इस खेल में छह गाँव के लोग एक तरफ़ और छह गांव के लोग दूसरी तरफ़ टीमों के रूप में खड़े हो जाते हैं, जिनकी संख्या क़रीब पाँच हज़ार होती है। गोपाल मंदिर,सीनियर स्कूल की पुरानी बिल्डिंग, गढ़ और आसपास के मकानों की छतें स्टेडियम का काम करती और इन छतों पर दर्शकों के रूप में बैठी रहती है बारह पुरों से सज-धज कर आई महिलाएं और अन्य। ये महिलाएं और युवतियां आदि अपने ग्रुप टीम के खिलाड़ियों को जोश दिलाने के लिए हुटिंग करती रहती है। इस खेल की खास बात यह है कि इसमें हजारों की संख्या में खिलाड़ी होते हैं, लेकिन कोई रेफरी नहीं होता है। पूरी ईमानदारी से खेल का समापन होता है।दड़ा बुराई के प्रतीक रावण का सिर है जिसे ठोकर मारी जाती हैये दड़ा तब का है जब से ये खेल शुरू हुआ। तब से लेकर अब तक हर मकर संक्रान्ति पर वही दड़ा खेला जाता आ रहा है। मकर संक्रान्ति से 8-10 दिन पहले हर साल इसको पानी में डाल दिया जाता है जिससे इसका वज़न और भी बढ़ जाता है।फिर इस पर हर साल टाट और कपड़ा चढ़ा कर मकर सक्रांति से एक दिन पहले तक गुथा जाता है। दड़ा बनाने का कार्य स्थानीय लोग ही करते है। दड़े को खेल की समाप्ति पर इसे वापस गढ़ में अगले साल मकर सक्रांति पर खेलने के लिये सुरक्षित रख दिया जाता है। लोग कहते है की दड़ा बुराई के प्रतीक रावण का सिर है जिसको ठोकरें मार कर ये खेल खेला जाता है।

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