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20 दिन के लिए गांव में लगा सर्कस:10 दिन तक मनोरंजन के बाद लॉकडाउन, फिर गांव ने पाला 30 कलाकारों का सर्कस परिवार, अब अनलॉक हुआ तो लौटा

टोंक2 महीने पहले
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सर्कस वालों को रवाना करते लोग। - Dainik Bhaskar
सर्कस वालों को रवाना करते लोग।

लॉकडाउन के चलतेे लांबा हरि सिंह कस्बे में फंसे अमर ज्योति सर्कस का परिवार आखिरकार लोगों के सहयोग सेेेे तीन सर्कस संचालक भाइयों की मौत का गम लेकर शनिवार को एमपी स्थित अपने घर के लिए रवाना हो गया। जाते समय दोनों ओर सेे इस तरह सेेेे भावनात्मक अटैचमेंट हुआ कि ग्रामीण और सर्कस केे लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े। इस दौरान सर्कस कर्मियों ने लाम्बाहरिसिंह की जनता के लिए प्रार्थनाएं भी कीं।

जिले के लांबाहरिसिंह कस्बे में मार्च माह में अमर ज्योति सर्कस आया था। प्रशासन से 20 दिन की स्वीकृति लेकर सर्कस शुरू किया। कलाकारों ने ग्रामीणों को अपनी कला दिखा कर व मनोरंजन करते हुए खूब तालियां बटोरीं। सब कुछ सही चल ही रहा था कि अचानक कोरोना की दूसरी लहर आ गई। सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा कर दी। शो तुरंत बंद कर दिए। वहीं यातायात साधानों के साथ ही हर तरह की आवाजाही बंद कर दी गई।

नतीजतन सर्कस व कलाकार यहीं फंस कर रह गए। शो बंद होने से धीरे-धीरे बचत खत्म होने लगी। जितने दिन चले शो के दौरान जो कुछ कमाया था वह खत्म होने लगा। 30 कलाकारों सहित अन्य सर्कसकर्मियों जिनमें बच्चे, महिलाएं भी शामिल हैं इनके सामने राशन पानी की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया। कुछ कलाकार छोटा-मोटा काम करने लगे। मगर उनका यह प्रयास काफी कम था। शनिवार को भारी मन से लोगों ने चंदा एकत्रित कर उन्हें रवाना किया। इस मौके पर उप सरपंच संजय पाराशर, रमेश चंद वैष्णव, महेंद्र अग्रवाल, दिनेश कुमार साहू, महावीर टेलर, श्रवण कुमार, विजय गौत्तम, वार्ड पंच संपत मेघवंशी, सरपट सोनी, नोरतमल सहित कई ग्रामीण मौजूद थे।

तीनों संचालक भाइयों की हुई मौत के सदमे में थे परिजन

2 मई को सर्कस के मुख्य संचालक जोनी भाई की मौत हो गई। इसाई धर्म से ताल्लुक होने के चलते ग्रामीणों के सहयोग से 10 हजार रुपए एकत्र कर शव को आशापुरा नसीराबाद पहुंचाया। जहां इसाई धर्म अनुसार अंतिम संस्कार करवाया। सर्कस परिवार इस गम से उभरा भी नहीं कि सात दिन बाद ही 9 मई को जोनी के भाई राजकुमार की भी मौत हो गई। गांव में अफवाह फैली कि भाइयों की मौत कोरोना से हुई है।

पंचायत प्रशासन ने तुरंत सर्कस कलाकारों की जांच करवाई। सभी की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने पर ग्रामीणों ने राहत की सांस ली। 18 दिन बाद ही 27 मई को राजकुमार से बड़े भाई विजय जोनी की भी मौत हो गई। जिससे सर्कस कलाकार व अन्य कर्मचारी काफी टूट गए।

जहां सर्कस तंबू लगा था, वहां पर अत्यधिक धूप और बढ़ती गर्मी से हो रही परेशानी को देखते हुए सरपंच आशा देवी ने सरकारी स्कूल में इनके रहने की व्यवस्था करवाई। शारीरिक शिक्षक दिनेश कुमार साहू ने स्कूल में हर संभव मदद की। यहां करीब एक माह बिताया। उप सरपंच संजय कुमार पाराशर ने बताया कि सर्कस के लोगों की मदद के लिए सरकार व क्षेत्रीय प्रशासन से मदद मांगी गई। मगर किसी भी प्रकार की सरकारी मदद नहीं मिल सकी। ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से मदद मांगी गई। जिसके बाद इनकी मदद के लिए कई हाथ बढ़े। लोगों ने गेहूं, दाल, चावल, दूध, चीनी, मिर्च-मसाला, घोड़ों के लिए चारा सहित खान-पान के लिए जिससे जो हो सका व्यवस्था की।

- मध्य प्रदेश के धार जिले के थे सर्कस संचालक:सर्कसकर्मियों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों से उनके घर तक पहुंचा दिए जाने की मदद मांगी। समस्या ये थी कि ये मध्य प्रदेश के धार जिले में प्रीतमपुर गांव के हैं। लंबी दूरी होने के कारण किराया बहुत ज्यादा था। सरपंच व पंचायत समिति सदस्य ने उच्चाधिकािरयों से बात की। मगर कोई मदद नहीं मिली।

ऐसे में एक फिर कस्बेवासी मदद के लिए आगे आए। करीब 50 हजार रुपए एकत्र किए। महेंद्र अग्रवाल ने वाहनों की व्यवस्था करवाई। लगभग 3 महीने रहा यह परिवार गांव के लोगों से काफी घुल मिल गया था।-गांववासियों का अहसान जिंदगी भर नहीं भूलेंगे:सर्कस के कर्मचारी ईसाई धर्मावलंबी हैं। उन्होंने कहा कि गांववासियों ने हमारे संकट काल के दौरान मानवता की मिसाल पेश की। जिससे आज हम अपने गांव जा रहे हैं। ईसा मसीह सभी गांववासियों को बहुत आशीष देना।

गांंव वालों केे सहयोग से रवाना:

लांबाहरिसिंह सरपंच गीता देवी वैष्णव ने बताया कि सर का संसार संचालकों के साथ बहुत बुरा हुआ। एक-एक करके थोड़े दिन के अंतराल में ही तीन भाईयों की मौत को गई। प्रशासन को बार-बार अवगत करवाने के बाद भी सर्कस के परिवार को कोई सहायता नहीं मिली। ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर इनके शनिवार को उनके मूल निवास स्थान प्रीतमपुर, धार, मध्य प्रदेश के लिए रवाना किया गया है।

ट्रक में सामान लादते लोग
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