राजा ने रानी के लिए अलग बनाया कृष्ण मंदिर:गिरधारी मंदिर में रानी नहीं चढ़ा सकती थी भेंट

जैसलमेर4 महीने पहले
जैसलमेर। गिरधारी जी मंदिर में भगवान कृष्ण।

जैसलमेर के पूर्व महारावल के पैलेस में कृष्ण के दो मंदिर है। एक ही परिसर में दो कृष्ण मंदिर का इतिहास भी बड़ा रोचक है। कहा जाता है कि, गिरधारी जी के मंदिर में महिलाओं को भेंट आदि चढ़ाने का रिवाज नहीं था। एक दिन रानी ने कृष्ण भगवान को फूलों की माला चढ़ाई। यह देखकर राजा को अच्छा नहीं लगा था। तब राजा ने मंदिर से 100 फीट दूर कृष्ण भगवान का एक दूसरा मंदिर बनाया था। जिसके बाद वह मंदिर बांके बिहारी के नाम से जाना जाता है। राजपरिवार की महिलाएं इस मंदिर में ही पूजा-अर्चना कर भगवान को भेंट आदि चढ़ाने लगी थी।

पूर्व महारावल का निवास स्थान मंदिर पैलेस
पूर्व महारावल का निवास स्थान मंदिर पैलेस

250 साल पुराना मंदिर
गिरधारी जी मंदिर के पुजारी जयेश ने बताया कि ये कहानी 250 साल पुरानी पूर्व महारावल मूल सिंह के समय की है। गिरधारी जी के मंदिर में महिलाओं को भेंट चढ़ाने के लिए मना किया हुआ था। इस बात से राजपरिवार की महिलाएं आहत थी। पुजारी ने बताया कि महारानी की ओर से एक दिन फूलों की माला भगवान कृष्ण को भेंट चढ़ाने पर महारावल मूल सिंह ने अलग से मंदिर बनाया। तब से मंदिर पैलेस के अंदर ही गिरधारी जी का मंदिर है। निवास की दीवार के बाहर परिसर में बांके बिहारी का मंदिर बनवाया। हालांकि पूर्व राजपरिवार के सदस्य डॉ. जितेंद्र सिंह इस बात को तथ्यों से बाहर बताते हैं।

बांके बिहारी मंदिर में मौजूद भगवान कृष्ण
बांके बिहारी मंदिर में मौजूद भगवान कृष्ण

कृष्ण के वंशज है यदुवंशी जैसलमेर राजपरिवार
जैसलमेर राजपरिवार यूदुवंशी है। जैसलमेर राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के आरंभ में 1156 ईस्वी के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल के द्वारा किया गया। भाटी मूल रूप से इस प्रदेश के निवासी नहीं थे। ये अपनी जाति की उत्पत्ति मथुरा व द्वारिका के यदुवंशी इतिहास पुरुष कृष्ण से मानती है। कृष्ण के बाद द्वारिका के जलमग्न होने के कारण कुछ बचे हुए यदु लोग जाबुलिस्तान, गजनी, काबुल व लाहौर के आस-पास के क्षेत्रों में फैल गए थे। मध्य एशिया से आने वाले तुर्क आक्रमणकारियों के कारण ये लाहौर होते हुए पंजाब की ओर बढ़ते हुए भटनेर नामक स्थान पर अपना राज्य स्थापित किया। उस समय इस भू-भाग पर स्थानीय जातियों का प्रभाव था। इसलिए ये भटनेर से दुबारा आगे बढ़ते हुए सिंध मुल्तान की ओर बढ़े। अंत में मुमणवाह, मारोठ, तपोट, देरावर आदि स्थानों पर अपने मुकाम करते हुए थार के रेगिस्तान स्थित परमारों के क्षेत्र में लोद्रवा नामक शहर के शासक को पराजित कर यहां अपनी राजधानी स्थापित की थी। बाद में ये लोद्रवा से जैसलमेर आ गए और यहां राज किया।

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