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गहलोत को केरल की कमान के मायने:आलाकमान ने फिर उन पर विश्वास जताया, फ्रंट सीट के लिए पायलट को अभी करना होगा और इंतजार

जोधपुर2 महीने पहलेलेखक: सुनील चौधरी
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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। - Dainik Bhaskar
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत।

कांग्रेस आलाकमान ने केरल में इस साल मई में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव की कमान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंप उनके प्रति अपने विश्वास को खुलकर जाहिर कर दिया है। वहीं उम्मीद के विपरीत सचिन पायलट को कोई भी जिम्मेदारी नहीं सौंप साफ संकेत दे दिया कि बगावत को पार्टी नेतृत्व भूला नहीं है और उन्हें फिलहाल इंतजार करना होगा। इन दोनों फैसलों के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं कि गहलोत को राजस्थान से दूर करने की कवायद शुरू हो चुकी है। लेकिन गहलोत के लिए राजस्थान को छोड़ दिल्ली जाना दूर की कौड़ी लग रहा है।

इस कारण सौंपी गहलोत को कमान
केरल में कांग्रेस का मजबूत आधार है। साथ ही वहां उसके कई स्थानीय दलों के साथ गठबंधन रहा है। केरल में मुख्य मुकाबला वामदलों के गठबंधन से होता रहा है। साथ ही केरल में परिपाटी रही है कि 5 साल में अमूमन सत्ता बदल जाती है। ऐसे में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस केरल में अच्छी संभावना देख रही है। इसके लिए पार्टी को एक ऐसे नेता की दरकार थी जो स्थानीय दलों के गठबंधन को न केवल आगे ले जा सके बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार कर सके। उनकी खोज जमीन से जुड़े गहलोत जैसे नेता पर जाकर पूरी हुई।

गहलोत का यह मजबूत पक्ष भी बना कारण
गुजरात विधानसभा के साल 2017 में संपन्न चुनाव में कांग्रेस की बागडोर गहलोत के हाथ में थी। उन्होंने वहां पार्टी में नई जान फूंक दी। अपनी बेहतरीन रणनीति के दम पर न केवल उन्होंने नए लोगों को जोड़ा बल्कि कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया। यही कारण रहा कि पार्टी चुनाव जीतने की स्थिति में पहुंच गई। यह दीगर बात है कि अपने गृह राज्य में आसन्न नजर आ रही हार से बचने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी ने चुनाव से पहले अपनी पूरी ताकत झोंक दी। चुनाव से दो दिन पहले उनके अथक प्रयास से समीकरण थोड़ा बदले और भाजपा बड़ी मुश्किल से सरकार बनाने में कामयाब अवश्य हो गई, लेकिन उसकी सीटें 100 के भीतर सिकुड़ गई। गहलोत के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

क्या गहलोत से छूट रहा है राजस्थान?
सचिन पायलट की राजस्थान में बगावत के बाद ये यह सवाल लगातार हवा में तैर रहा है कि गहलोत दिल्ली जाएंगे? पायलट को किसी राज्य की जिम्मेदारी नहीं दिए जाने से उनके समर्थक दावा कर रहे हैं कि गहलोत दिल्ली जाएंगे और पायलट राजस्थान संभालेंगे। लेकिन ऐसा होता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। गहलोत के अलावा भूपेश बघेल दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्हें किसी राज्य की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही गहलोत को पार्टी का महासचिव न बनाकर सिर्फ सीनियर ऑब्जर्वर बनाया गया है। इस भूमिका में उन्हें केरल में अधिक समय देने के बजाय पार्टी नेताओं के साथ बैठ सिर्फ रणनीति तैयार करनी होगी। गहलोत की रणनीति पर अन्य नेता आगे बढ़ेंगे। साथ ही वे अन्य दलों के साथ समझौते व सीटों के तालमेल से लेकर पार्टी प्रत्याशी तय करने की भूमिका में रहेंगे।

खाली हाथ रह गए सचिन
कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल, केरल व असम सहित कुछ राज्यों के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख अपने नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपी हैं। इनमें सचिन का नाम कहीं नहीं है। पहले ऐसा माना जा रहा था कि पार्टी सचिन को पश्चिम बंगाल या असम में महत्वपूर्ण भूमिका सौंप सकती है। लेकिन पार्टी ने उन्हें पूरी तरह से दरकिनार कर दिया। इससे पार्टी आला कमान यह संकेत देने में सफल रहा कि पार्टी से बगावत करने वालों को तव्वजो नहीं मिलेगी।

नतीजों से तय होगा गहलोत का भविष्य
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों से गहलोत का भविष्य निर्भर करेगा। यदि वे कांग्रेस को वहां बेहतर नतीजे देने में सफल रहे तो पार्टी उन्हें दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका सौंप सकती है। फिलहाल तो ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।

राजस्थान छोड़ने के इच्छुक नहीं है गहलोत
गहलोत खुद दिल्ली के बजाय राजस्थान की राजनीति में स्वयं को बेहद सहज महसूस करते हैं। व्यक्तिगत बातचीत में वे साफ कह चुके हैं कि मैं हमेशा राजस्थान में ही रहना चाहता हूं। मेरा मन यही पर बसता है। ऐसे में मेरे लिए राजस्थान छोड़ना अकल्पनीय है। प्रदेश में कांग्रेस में विपक्ष में रहने के दौरान वे हर बार राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए। उस समय भी लोगों ने मान लिया कि गहलोत अब दिल्ली ही रहेंगे। लेकिन चुनावी वर्ष में गहलोत फिर से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो जाते हैं और चुनाव अभियान शुरू होने तक पूरी बागडोर अपने हाथ में थामते रहे हैं। ऐसे में पार्टी के लिए गहलोत को राजस्थान से अलग कर पाना बेहद मुश्किल है।

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