राजस्थान की ऐसी प्रतिमा, जिसके प्रसाद में चढ़ती है सिगरेट:कार से बैक गियर हटाने वाले राजा से जज-वकील और पुलिस मांगते हैं मन्नत

जोधपुरएक दिन पहलेलेखक: पूर्णिमा बाेहरा
जोधपुर में जुबली कोर्ट यानी कोर्ट का हैरिटेज भवन सर प्रताप द्वारा बनवाया गया था और यहीं सर प्रताप की आदमकद मूर्ती स्थापित है। प्रतिमा पर सिगरेट जलाकर धूप-आरती करते हुए फरियादी।

अगर आप सर प्रताप के बारे में नहीं जानते तो आपको जोधपुर का इतिहास फिर से पढ़ने की दरकार है। यह एक ऐसे राजाओं के राजा की सच्ची दास्तान है, जो खुद कभी राजगद्दी पर नहीं बैठे, अशिक्षित थे लेकिन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को इंप्रेस किया। अपनी कार से बैक गियर निकलवा दिया क्योंकि जिंदगी में पीछे जाना उनका उसूल नहीं था।

जुबली कोर्ट में सर प्रताप की आदमकद प्रतिमा, जज-वकील करते हैं नमन
सर प्रताप जोधपुर राजघराने के एक मात्र व्यक्ति हैं, जिनकी दिन में दो समय आरती होती है। उनकी मूर्ति पर जज, वकील पुलिस सभी नमन करते हैं। मान्यता है कि यहां मांगी जाने वाली हर मन्नत पूरी होती है। प्रसाद में शराब, अफीम, सिगरेट चढ़ती है। यही नहीं, सर प्रताप सिंह पर आरती बनाई गई है, दिन में दो बार आरती गाई भी जाती है।

सर प्रताप, जो ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी रहे और कई युद्धों में भाग लिया।
सर प्रताप, जो ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी रहे और कई युद्धों में भाग लिया।

उनकी प्रतिमा पर सर्दी में कोट पहनाया जाता है। विश्वभर में प्रसिद्ध जोधपुरी कोट की ईजाद सर प्रताप ने ही की थी। जोधपुर में जुबली कोर्ट यानी कोर्ट का हेरिटेज भवन सर प्रताप ने बनवाया था। यहीं सर प्रताप की आदमकद प्रतिमा स्थापित है।

यह आरती यहां दो वक्त गाई जाती है। जज-वकील और पुलिसवाले यहां सिर झुकाते हैं, लोग केस जीतने के लिए फाइल लेकर आते हैं।
यह आरती यहां दो वक्त गाई जाती है। जज-वकील और पुलिसवाले यहां सिर झुकाते हैं, लोग केस जीतने के लिए फाइल लेकर आते हैं।

28 साल से हो रही प्रतिमा की पूजा-अर्चना
जोधपुर के जुबली कोर्ट में स्थापित सर प्रताप की प्रतिमा की पूजा 28 साल से हो रही है। पिछले 28 साल से पुजारी संपत शर्मा यहां पूजा अर्चना कर रहे हैं। मान्यता है कि रात 12 बजे आज भी सर प्रताप सिंह इस प्रतिमा के पास से सफेद घोड़े पर सवार होकर निकलते हैं और पूरे जोधपुर के परकोटे की सुरक्षा का जायजा लेते हैं।

सर प्रताप की प्रतिमा के सामने सिगरेट अगरबत्ती के साथ जलाई जाती है।
सर प्रताप की प्रतिमा के सामने सिगरेट अगरबत्ती के साथ जलाई जाती है।

मूर्ति की पूजा अर्चना करने वाले संपत शर्मा ने बताया कि वे 1994 से यहां पूजा अर्चना कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1994 में किसी व्यक्ति से मैंने 500 रुपए मांगे थे। उसने वह पैसा देने के लिए इस मूर्ति के सामने बुलाया था। सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक संपत उस व्यक्ति का इंतजार करते रहे, लेकिन वह नहीं आया।

उन्होंने बताया कि उन्हें 500 रुपए की सख्त जरूरत थी। इस पर उन्होंने सर प्रताप की मूर्ति के सामने अर्चना की कि वह व्यक्ति नहीं आया तो घर कैसे जाऊंगा। मुझे 500 रुपए की जरूरत थी। इस पर उन्हें एक आवाज सुनाई दी, जो कह रही थी- गेट के पास जाओ।

संपत ने मूर्ति के सामने 500 रुपए मांगे थे।
संपत ने मूर्ति के सामने 500 रुपए मांगे थे।

संपत ने बताया कि जब वे कलेक्ट्रेट के गेट के पास गए तो वहां 500 रुपए पड़े मिले। तब से इस प्रतिमा में उनका विश्वास बन गया। इसके बाद वे रोजाना यहां दर्शन करने आने लगे और आरती करने लगे। सर प्रताप पर आरती रजिस्ट्रार सिद्धार्थ चारण ने लिखी है।

मान्यता यह भी है कि कोर्ट में केस को लेकर आने वाले लोग यहां आकर अर्ज करते हैं और केस जीतने की दरख़्वास्त लगाते हैं।

जुबली कोर्ट परिसर में लगी सर प्रताप की प्रतिमा के आगे सिर झुकाते लोग।
जुबली कोर्ट परिसर में लगी सर प्रताप की प्रतिमा के आगे सिर झुकाते लोग।

क्यों चढ़ाते हैं सिगरेट?
पुजारी संपत के मुताबिक 22 साल पहले राजघराने से जुड़े होने के कारण सर प्रताप सिंह को एक सिगरेट चढ़ाई गई थी। तब से उन्हें सिगरेट चढ़ाने की परंपरा बन गई।

कौन थे किंग्स ऑफ किंग सर प्रताप?
उन्नीस वीं सदी के मध्य जोधपुर के महाराजा हुए तख्त सिंह। उनके यहां 22 अक्टूबर 1845 को दो बेटों के बाद तीसरे बेटे का जन्म हुआ। ये थे प्रताप सिंह। महाराजा तख्त सिंह के निधन के बाद उनके बड़े बेटे जसवंत सिंह गद्दी पर बैठे। जसवंत सिंह के समय उनके प्रधानमंत्री थे फैजुल्लाह, जिनके काम से जसवंत सिंह खुश नहीं थे। तब उन्होंने प्रताप सिंह को शासन और सत्ता में सुधार के लिए जोधपुर बुलाया। जसवंत सिंह ने प्रताप को 1878 में जोधपुर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

प्रधानमंत्री के रूप में प्रताप सिंह ने मारवाड़ पर बढ़े हुए कर्ज को कुछ ही साल में उतार दिया।
प्रधानमंत्री के रूप में प्रताप सिंह ने मारवाड़ पर बढ़े हुए कर्ज को कुछ ही साल में उतार दिया।

नई तकनीक के साथ उन्होंने मारवाड़ के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण काम और नवीन निर्माण कार्य भी करवाए। उन्होंने राजकोष विभाग, पुलिस विभाग, कानून व्यवस्था, अस्पताल, स्कूल, रेलवे आदि अनेक क्षेत्रों में सुधार के साथ-साथ जोधपुर का सौंदर्यीकरण करवाया।

प्रताप सिंह कभी मारवाड़ के राजा नहीं बने, लेकिन हमेशा राजाओं के राजा रहे। मारवाड़ के चार राजाओं के वे संरक्षक रहे। जब भी गद्दी पर बैठने का वक्त आया, तब उन्होंने अपने नाबालिग भाई, तो कभी भतीजों तो कभी पौत्र के हाथ सत्ता सौंप दी और खुद किनारे हो गए।

तस्वीर मारवाड़ के नाबालिग राजा सुमेर सिंह की है। सुमेर सिंह गद्दी पर आसीन हैं। पास में खड़े हैं, उनके संरक्षक सर प्रताप सिंह।
तस्वीर मारवाड़ के नाबालिग राजा सुमेर सिंह की है। सुमेर सिंह गद्दी पर आसीन हैं। पास में खड़े हैं, उनके संरक्षक सर प्रताप सिंह।

प्रताप सिंह मारवाड़ के चार नाबालिग राजाओं जसवंतसिंह द्वितीय, सरदार सिंह, सुमेरसिंह व उम्मेदसिंह के संरक्षक रहे। इस दौरान राजकाज से जुड़े सारे फैसले वे ही लेते थे। हमेशा आगे बढ़ने में विश्वास रखने वाले प्रताप सिंह के बारे में कहा जाता है कि जब वह कोई भी नई कार खरीदते तो सबसे पहले उसका बैक गियर निकलवा देते थे। पीछे लौटना उनके उसूलों के खिलाफ था।

महारानी विक्टोरिया से बात करने के लिए जहाज में सीखी अंग्रेजी
प्रताप सिंह पढ़े लिखे नहीं थे, उनका ज्ञान व्यवहारिक था, किताबी नहीं। 1887 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के शासन काल के 50 वर्ष पूरे हुए तो लंदन से न्योता आया। उस स्वर्ण जयंती समारोह में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह ने अपने प्रतिनिधि के रूप में प्रताप सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि देकर लंदन के लिए रवाना किया।

कहा जाता है कि प्रताप सिंह राजपूत राजाओं में पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मुंबई से यूरोप तक शिप में बैठकर यात्रा की। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी। महारानी विक्टोरिया से बात करने के लिए उन्होंने जहाज में सफर के दौरान ही थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीखी।

जब वे महारानी विक्टोरिया की सेवा में उपस्थित हुए तब उन्होंने अपनी तलवार रानी के पैरों में रख दी और अंग्रेजी तरीके से रानी का हाथ पकड़कर चूम लिया। इसके बाद रानी का हाथ अपनी आंखों पर रख लिया। सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी लोग हैरत में पड़ गए। भरी सभा में सर प्रताप बोले- मैंने अपनी आंखों से रानी के हाथ साफ कर दिए हैं। प्रिंस ऑफ वेल्स प्रताप सिंह से इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें अपना अंगरक्षक घोषित कर दिया।

फ्रांस, फलस्तीन के हैफा व अलप्पो शहर के युद्ध में भाग लिया
प्रताप सिंह ने जोधपुर में सेना का निर्माण किया। इस सेना को जोधपुर रिसाला के नाम से जाना जाता था। यह एक मिलिट्री इन्फेंट्री थी, जिसमें सिपाही से लेकर अफसर तक के लिए खादी पहनना जरूरी था। प्रथम विश्वयुद्ध 1914 में शुरू हुआ तो प्रताप सिंह अपनी फोर्स लेकर इंग्लैंड की ओर से लड़ने के लिए उपस्थित हो गए और फ्रांस, फलस्तीन के हैफा व अलप्पो शहरों में युद्ध में भाग लिया।

जोधपुर रसाला के सैनिकों के साथ सर प्रताप सिंह (बीच में बैठे हुए) साथ में अंग्रेज अधिकारी भी नजर आ रहे हैं।
जोधपुर रसाला के सैनिकों के साथ सर प्रताप सिंह (बीच में बैठे हुए) साथ में अंग्रेज अधिकारी भी नजर आ रहे हैं।

प्रथम विश्वयुद्ध के वक्त उनकी उम्र 70 साल थी और वे सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनकी बहादुरी देख साल 1916 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल बनाया। प्रताप सिंह को प्रथम विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने सर की उपाधि प्रदान की। वे सबसे ज्यादा विदेश यात्राएं करने वाले राजपूत संरक्षक के तौर पर जाने जाते हैं।

सर प्रताप ने अंग्रेजों से अपने पूर्वजों की जागीर ईडर को वापस हासिल किया और उसके राजा बने। सर प्रताप ने वर्ष 1878 में जोधपुर रिसाला की स्थापना की थी और अंग्रेजों की तरफ से दुनिया के कई स्थान पर युद्ध लड़े। उन्होंने दूसरे अफगान युद्ध में भाग लिया और लेफ्टिनेंट कर्नल बनाए गए। काफी समय तक वे ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी रहे। 4 सितंबर 1922 को जोधपुर में उनका निधन हुआ।

जोधपुर में जुबली कोर्ट महारानी विक्टोरिया की सिल्वर जुबली की निशानी
जोधपुर का जुबली कोर्ट (कचहरी भवन) सन 1886 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सिल्वर जुबली की स्मृति में तत्कालीन महाराजा जसवंत सिंह (द्वितीय) और महाराजा सरदार सिंह ने निर्मित कराया था। इसमें छोटे-बड़े 52 कमरे होने से इसे बावन कचहरी भी कहा जाता है। रानी विक्टोरिया के शासन काल के 50 वर्ष पूरे होने पर इसका निर्माण कराया गया था।

जोधपुर का जुबली कोर्ट (कचहरी भवन) सन 1886 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सिल्वर जुबली की स्मृति में तत्कालीन महाराजा जसवंत सिंहजी (सेकेंड) एवं महाराजा सरदार सिंह ने निर्मित कराया। इसमें छोटे-बड़े 52 कमरे होने से इसे बावन कचहरी भी कहा जाता है।
जोधपुर का जुबली कोर्ट (कचहरी भवन) सन 1886 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सिल्वर जुबली की स्मृति में तत्कालीन महाराजा जसवंत सिंहजी (सेकेंड) एवं महाराजा सरदार सिंह ने निर्मित कराया। इसमें छोटे-बड़े 52 कमरे होने से इसे बावन कचहरी भी कहा जाता है।

इसके निर्माण में अंग्रेजी इन्जीनियर डब्लू. होम की सेवाएं ली गई थीं। यह 1886 में बनना आरंभ होकर 1897 में तैयार हुआ था। इस भवन के निर्माण पर उस समय 4 लाख रुपए खर्च हुए थे। वर्तमान में जुबली कोर्ट में जोधपुर संभागीय आयुक्त, जिला कलेक्टर, पुलिस उपायुक्त पुलिस अधीक्षक से लेकर अनेक महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय संचालित हो रहे हैं।

22 अक्टूबर को हुआ था जन्म, ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी बने
महाराजा प्रताप सिंह का जन्म 22 अक्टूबर 1845 में हुआ था। ये महाराजा तख्तसिंह के तीसरे पुत्र थे। ईडर (गुजरात) राज्य के राजा के निधन के बाद प्रतापसिंह वहां के महाराजा बने। साथ ही वे ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी भी थे। खुद तो अधिक शिक्षित नहीं थे, लेकिन मारवाड़ में शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी याद किया जाता है। राजनीति, आखेट, घुड़सवारी, निशानेबाजी में कुशल थे। मारवाड़ के इतिहास में अन्य शासकों की तुलना में सबसे अधिक विदेश यात्राएं करने वाले ये प्रथम शासक थे।

जोधपुर में सर प्रताप सिंह ने समुद्री जहाज जैसा दुर्ग बनवाया था। दुर्ग के चारों तरफ पोलो ग्राउंड बनवाए ताकि ऊपर से ही मैच देख सकें।
जोधपुर में सर प्रताप सिंह ने समुद्री जहाज जैसा दुर्ग बनवाया था। दुर्ग के चारों तरफ पोलो ग्राउंड बनवाए ताकि ऊपर से ही मैच देख सकें।

जोधपुर में जहाज जैसा बनाया शिप हाउस
जोधपुर में उन्होंने अपने लिए शिप हाउस बनाया था, जो हूबहु जहाज जैसा दिखता है। इसके आस-पास पोलो ग्राउंड बनवाए थे ताकि यहां रहकर पोलो देख सके। अभी ये जगह पोलो कॉलोनी के बन चुकी है। अपने राज्य के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले सर प्रतापसिंह जी जीवन के अंतिम पड़ाव में जोधपुर रीजेंट के रूप में अपनी सेवाएं दी। सर प्रताप सिंह को ब्रिटिश कालीन अवार्ड ऑर्डर ऑफ द बाथ मिला था।

तस्वीरों में सर प्रताप सिंह

जोधपुर के सेठ-साहूकारों और नागरिकों के साथ सर प्रताप।
जोधपुर के सेठ-साहूकारों और नागरिकों के साथ सर प्रताप।
सर प्रताप सिंह का पोट्रेट।
सर प्रताप सिंह का पोट्रेट।
शिमला दौरे के दौरान सर प्रताप का एक चित्र।
शिमला दौरे के दौरान सर प्रताप का एक चित्र।
सर प्रताप की युवा अवस्था की तस्वीर।
सर प्रताप की युवा अवस्था की तस्वीर।
ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी के रूप में सर प्रताप।
ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी के रूप में सर प्रताप।

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