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डीएलबी डायरेक्टर के आदेश की अनदेखी:एपीओ आरओ को बचाने पहले चुनाव आचार संहिता का बहाना फिर अतिरिक्त चार्ज और अब स्टाफ की कमी बताकर रोका

जोधपुर2 महीने पहले
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  • अनियमितता के आरोपी को निगम में रखने के लिए अफसरों के रोज नए पैंतरे
  • एआरओ के कोरोना पॉजिटिव होने के बाद आयुक्त ने आरओ को सौंपी अतिरिक्त जिम्मेदारी
  • एआरओ जन्म-मृत्यु व मैरिज पंजीयन में देरी को लेकर आरओ की हो पहले भी चुकी हैं शिकायतें

नगर निगम उत्तर के राजस्व अधिकारी (आरओ) स्वरूपसिंह सिसोदिया के एपीओ होने के बावजूद निगम अफसर रिलीव नहीं करने को लेकर रोजाना नए पैंतरे चला रहे हैं। स्वायत्त शासन विभाग ने गत 1 अक्टूबर को सिसोदिया को एपीओ कर उनका मुख्यालय निदेशालय में कर दिया था, इसके बावजूद उन्हें रिलीव करने की बजाय रोजाना कोई नया बहाना बनाकर उन्हें निगम में रखने की कवायद चल रही है। 20 दिन पूर्व डीएलबी डायरेक्टर दीपक नंदी ने सिसोदिया के रिलीव नहीं होने के मामले को गंभीरता से लेकर उन्हें नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा था।

सिसोदिया निगम चुनाव आचार संहिता लागू होने के सात दिन पहले एपीओ हुए थे, लेकिन निगम अफसरों ने चुनाव आचार संहिता का हवाला देकर रिलीव ही नहीं किया, फिर निगम में अफसरों की कमी का हवाला देकर बचाया, लेकिन इस बार डीएलबी डायरेक्टर के आदेशों की अनदेखी करते हुए बचाने का नया पैंतरा चलाया। आयुक्त रोहिताश्वसिंह तोमर ने सिसोदिया को एआरओ तोहिष बारासा के कोराेना पॉजिटिव होने के बाद उनको आवंटित जन्म-मृत्यु व मैरिज पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने का अतिरिक्त कामकाज भी सौंपकर रिलीव होने से बचा लिया, लेकिन अब तोहिष के ड्यूटी जॉइन करने के बावजूद उन्हें राजस्व अधिकारी का कामकाज सौंप दिया।

सिसाेदिया जहां भी रहे अनियमितताओं के आराेपों से नहीं बच पाए

आरओ (चतुर्थ) सिसाेदिया जब निगम में आए ताे उनकी कार्यप्रणाली की तारीफ भी हुई, लेकिन मात्र छह माह बाद उनकी कार्यप्रणाली में बदलाव आता रहा, फरियादियाें काे भी उनके व्यवहार से शिकायतें रहने लगीं। सिसोदिया के उपायुक्त (मुख्यालय) रहते निगम में सफाई कर्मचारी भर्ती घोटाला हुआ। 300 से ज्यादा आवेदकों का मूल वर्ग ही बदल दिया।

इसके चलते इन अभ्यर्थियों की नियुक्तियां ही निरस्त कर दी गईं। फिर कहा गया कि सॉफ्टवेयर में एंट्री करते समय ऐसा हुआ। तब निकायों के अफसरों व कर्मचारियों की लापरवाही का खमियाजा 300 से ज्यादा अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ा था। हालांकि तब माहाैल शांत करने के लिए डीएलबी के तत्कालीन निदेशक ने कहा था कि अगर सॉफ्टवेयर में एंट्री के दौरान हुई लापरवाही में अफसरों व कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, लेकिन बाद में यह मामला आगे भी नहीं बढ़ पाया।

बाहरी निकायों से आए बाबूओं का किया नियम विरुद्ध स्थायीकरण
एक साल पूर्व निगम में पीपाड़ सहित अन्य निकायाें से आए कुल पांच कनिष्ठ लिपिकाें (प्राेबेशन) काे निगम अफसराें काे अंधेरे में रखकर नियम विरुद्ध स्थायीकरण (फिक्शेसन) कर दिया था। पीपाड़ से आए एक बाबू ने तो अपने प्रोबेशन पीरियड समाप्त होने के 22 दिनों में ही आयुक्त एसके आेला से नियम विरुद्ध स्थायीकरण आदेश निकलवा लिया था, लेकिन उसे निरस्त करने में खुद ओला को दो माह का समय लग गया था। इस बीच बाबू ने तत्कालीन उपायुक्त (मुख्यालय) सिसोदिया से साठगांठ कर स्थायीकरण की कार्रवाई खुद की पर्सनल पत्रावली पर चलाने की बजाय नोटशीट चलाकर पूरी करवा ली थी।

यह काम भी स्थायीकरण संस्थापन शाखा के बजाय खुद बाबू ने ही कर दिया। कुछ माह पूर्व उन्होंने कर्मचारी नेता हरबंश कल्ला पर भी एक ठेका कर्मचारी को धमकाते हुए राजकार्य में बाधा का झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मामले की भी शिकायत मुख्यमंत्री तक हुई थी। बाद में निगम की जांच में कर्मचारी नेता के खिलाफ मामला झूठा होने की पुष्टि हुई थी।

15 दिन में पेंडेंसी चार गुणा कर दी सिसोदिया ने
सिसोदिया को पूर्व में जब जन्म-मृत्यु व मैरिज पंजीयन के रजिस्ट्रार का कामकाज दिया तो आवेदकों को एक-दो दिन में मिलने वाले सर्टिफिकेट 10 से 15 दिन में मिलने लगे। हाल ही एआरआे तोहिष बारासा के काेरोना पॉजिटिव आने के बाद उन्हें एक बार फिर जन्म-मृत्यु पंजीयन के रजिस्ट्रार का काम सौंपा तो एक पखवाड़े में लंबित मामलों की संख्या 1500 के पार पहुंच गई।

फरियादियों की लगातार शिकायतों के बाद महापौर उत्तर कुंती देवड़ा व दक्षिण महापौर वनिता सेठ को भी जीरो पेंडेंसी की बात कहनी पड़ी। साथ ही कहा कि कोई भी निगम में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र या विवाह पंजीयन प्रमाण पत्र लेने के लिए आए तो उन्हें उसी दिन प्रमाण पत्र जारी करें। आयुक्त रोहिताश्व सिंह तोमर की कड़ी नाराजगी के बाद आरओ ने रात में काम करते हुए लंबित प्रकरण निपटाए।

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