5 करामाती पीरों के साथ राजस्थान आए थे गुरुनानक देव:लोकदेवता रामदेव को दी थी 'रामसापीर' की उपाधि, हाथ से कुआं खोदकर निकाला था पानी

जोधपुर2 महीने पहले

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी 1510 में राजस्थान आए थे। यहां उन्होंने बीकानेर, अजमेर के पुष्कर, चित्तौड़गढ़, जैसलमेर के पोकरण, जोधपुर और माउंटआबू क्षेत्रों में जाकर प्रवचन दिए थे। उनकी यह यात्रा सुल्तानपुर लोधी से शुरू हुई थी। यात्रा के दौरान उन्होंने कई जगहों पर अपने शिष्यों को साथ पड़ाव डाला था। उनकी यात्रा का वर्णन कई ऐतिहासिक ग्रन्थों और किंवदंतियों में मिलता है।

राजस्थान के लोकदेवता को दी थी 'रामसापीर' की उपाधि
गुरु नानक देव जी जब राजस्थान की यात्रा पर आए तब उनके साथ ईरान से पांच करामाती पीर भी आए थे। ये पीर पोकरण के अवतारी देवता बाबा रामदेव की ख्याति व चमत्कारों से प्रभावित होकर उनकी परीक्षा लेने आए थे। उन दिनों गुरु नानक देव जी ने बाला-मरदाना के साथ पोकरण में डेरा डाला था। वहीं पर बाबा रामदेव से उनकी भेंट हुई थी। पांचों पीरों ने जब बाबा रामदेव की परीक्षा ली तो वे उनके चमत्कारों से हतप्रभ रह गए। तब गुरु नानक देव जी ने पीरों से कहा कि बाबा तो पीरों के भी पीर हैं और पांचों पीर उनके मुरीद बन गए। बाद में गुरु नानक ने बाबा रामदेव को 'रामसापीर' की उपाधि से नवाजा था।

पोकरण में स्थित दमदमा साहिब गुरुद्वारा।
पोकरण में स्थित दमदमा साहिब गुरुद्वारा।

पोकरण में हाथ से खोद दिया था कुआं
गुरुनानक देव पोकरण में जिस स्थान पर ठहरे थे, तब वहां दूर-दूर तक रेत के टीले व चारों तरफ मरुस्थल था। वहीं आज रेलवे स्टेशन के समीप ऐतिहासिक दमदमा साहिब गुरुद्वारा है। गुरुद्वारे के सेवादार नक्षत्र सिंह बताते हैं गुरुद्वारे के पास ही गुरुनानक देव जी का पवित्र कुआं भी है। इसके बारे में कहा जाता है कि मरदाना की प्यास बुझाने के लिए गुरु नानक देव जी ने रेत में हाथ मारकर पानी निकाला था। शिष्यों की भूख शांत करने के लिए उन्होंने कड़वी ककड़ियों को भी मीठा कर दिया था। कुएं में आज भी पानी भरा हुआ है।

ऐतिहासिक कुआं जहां मरदाना ने अपनी प्यास बुझाई थी।
ऐतिहासिक कुआं जहां मरदाना ने अपनी प्यास बुझाई थी।

यात्रा के दौरान गुरुनानक देव जोधपुर पहुंचे। यहां कई दिन ठहरकर पुष्कर की ओर निकले थे। इससे पहले भटिंडा से होते हुए सिरसा के रास्ते वे बीकानेर पहुंचे। यहां से जालापट्‌टी, जैसलमेर, पोकरण से जोधपुर और फिर पुष्कर से आबू पर्वत की ओर गए। उनकी यात्रा का विवरण 9 साल तक शोध करने वाले सिक्ख समाज के सेवादार चरणजीत सिंह छाबड़ा के पास मौजूद है। उन्होंने बताया कि उन्हें 1937 की एक पुस्तक और नक्शों में जो विवरण मिला उसके आधार पर व पुरातत्व विभाग, बीकानेर और लाडनूं से भी मिले संकेत के आधार पर पुख्ता हुआ था कि गुरुनानक देव राजस्थान आए थे।

सेवादार चरणजीत छाबड़ा बताते हैं कि सुल्तानपुर लोधी की यात्रा के विवरण में जोधपुर का नाम लिखा होने से वह चौंक गए। तब उन्होंने नक्शा देखा तो पंजाबी में जोधपुर लिखा था। तब उन्होंने पूरा पता लगाने की ठानी और इस तलाश में निकले की जोधपुर में वे कहां रुके थे। इस पर उन्होंने मेहरानगढ म्युजियम ट्रस्ट के अधीन चल रहे इंटेक की लाइब्रेरी से पुराने दस्तावेज निकलवाने की कोशिश की तब पता चला सभी विवरण सूरी वंश के शेरशाह सूरी ने नष्ट करवा दिए थे। इसके बाद भी उनकी खोज नहीं रुकी और बीकानेर जाकर पता किया तो वहां जैन मंदिर में दस्तावेजों में विवरण मिला।

सेवादार चरणजीत छाबड़ा।
सेवादार चरणजीत छाबड़ा।

छाबड़ा ने अपनी खोज व ऐतिहासिक ग्रंथ, पुस्तक और जानकारियों से दावा किया गया है। छाबड़ा ने दावा किया है कि गुरुनानक देव ने अपनी यात्रा में चांदपोल में भक्तों को प्रवचन भी दिया। इस दौरान गुरु ग्रंथ साहिब की हस्तलिखित प्रति भी रखी गई थी। जिसे बाद में एक पंजाबी साधु अपने साथ ले गए। यह जानकारी उस समय के संत उत्तम सिंह ने जोधपुर के ज्ञानी लाभ सिंह को 1937 में एक पुस्तक में दी थी। वहीं सुल्तानपुर लोधी से यात्रा के विवरण में भी जोधपुर का उल्लेख नक्शे में किया गया है। इसके अलावा पुरातत्व विभाग लाडनूं से भी इसकी जानकारी मिली है।

इन तीन लोगों ने की थी गुरुनानक देव की सेवा

  • जोधपुर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज के श्यामादास।
  • रामसर के एक ठाकुर नाम अज्ञात।
  • शेरगढ़ परगना के भक्त सुथरा शाह।

भेदभाव खत्म करने के लिए की थी यात्रा
श्री गुरुनानक देव ने 24 साल में दो उप महाद्वीपों के 60 प्रमुख शहरों की पैदल यात्रा की। उनकी यात्राओं का मकसद समाज में मौजूद ऊंच-नीच, जात-पात, अंधविश्वास आदि को खत्म कर आपसी सद्भाव, समानता कायम करना था। वे जहां भी गए एक परमात्मा की बात की और सभी को उसी की संतान बताया। उनकी यह यात्राएं आज भी कई मसलों को हल करने का रास्ता बन सकती हैं। खास बात ये है कि गुरुजी इन यात्राओं के दौरान रास्ते में पड़ने वाली हर रियासत के राजा या बादशाह से मिले और उन्हें ये बातें समझाईं।

  • पहली यात्रा : गुरुजी अपनी पहली यात्रा के दौरान पंजाब से हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल, सिक्किम, भूटान, ढाका, असम, नागालैंड, त्रिपुरा, चटगांव से होते हुए बर्मा (म्यांमार) पहुंचे थे। वहां से वे ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और हरियाणा होते हुए वापस आए थे।
  • दूसरी यात्रा : दूसरी यात्रा में गुरुनानक पश्चिमी पंजाब (पाक), सिंध, समुद्री तट के इलाके घूमते हुए गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु के तटीय इलाकों से होते हुए श्रीलंका पहुंचे और फिर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मप्र, राजस्थान, हरियाणा होते हुए वापस आए।
  • तीसरी यात्रा : तीसरी यात्रा में गुरुजी हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत (सुमेर पर्वत का इलाका) होते हुए लेह-लद्दाख, कश्मीर, अफगानिस्तान (काबूल), पश्चिमी पंजाब होते हुए वापस आए थे।
  • चौथी यात्रा : गुरुनानक देव अपनी चौथी यात्रा में मुल्तान, सिंध, बलोचिस्तान, जैदा, मक्का पहुंचे और मदीना, बगदाद, खुरमाबाद, ईरान (यहां उनके साथी भाई मरदाना का निधन हो गया था), इसफाहान, काबुल, पश्चिमी पंजाब से होते हुए करतारपुर साहिब वापस लौटे थे।