जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला:किशोर को जमानत देने के लिए जरुरी नहीं कि शिकायतकर्ता को भी सुना जाए, जमानत के मामले में इस तरह की बाधाएं नहीं होनी चाहिए

जोधपुरएक वर्ष पहले
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राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय एक्ट (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) के तहत आरोपी की जमानत याचिका पर यह आवश्यक नहीं है कि शिकायतकर्ता को भी सुना जाए। न्यायाधीश संदीप मेहता ने डूंगरपुर के एक पंद्रह वर्षीय किशोर की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता को भी सुनने की याचिका पर यह फैसला दिया। अपने फैसले में उन्होंने कहा कि इस एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है कि शिकायतकर्ता को भी सुना जाए। इसके साथ ही उन्होंने किशोर को जमानत प्रदान कर दी।

डकैती के एक मामले में अभिरक्षा में लिए गए एक पंद्रह वर्षीय किशोर को डूंगरपुर के बाल सुधार गृह में रखा हुआ है। उसकी जमानत याचिका को जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट के मजिस्ट्रेट व बच्चों से जुड़े मामलों के कोर्ट (सेशन कोर्ट) जमानत याचिका खारिज कर चुके थे। ऐसे में उसके पिता की तरफ से हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की गई। सरकारी वकील ने हाईकोर्ट में जमानत याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि इस मामले में पहले शिकायकर्ता को सुना जाए। न्यायाधीश संदीप मेहता ने दोनों पक्ष के तर्क सुनने के बाद कहा कि कई बार ऐसा देखा गया है कि किसी मामले में एक साथ आरोपी होते हुए वयस्क व्यक्ति को जमानत मिल जाती है, लेकिन बाल सुधार गृह में रहने वाले किशोरों को जमानत के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। क्योंकि पहले शिकायतकर्ता के पास नोटिस जाता है। फिर वह अपना जवाब पेश करता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है। जबकि एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है कि शिकायकर्ता को सुना जाए। उन्होंने कहा कि जमानत के मामले में इस तरह की बाधाएं नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कुछ शर्त के साथ किशोर को जमानत प्रदान कर दी।

कौन होता है जुवेनाइल

जुवेनाइल उनको मानते है, जिनकी आयु 18 साल से कम हो। भारत में भारतीय दंड अधनियम के तहत एक बच्चे को किसी भी अपराध के जुर्म में सजा तब तक नहीं दी जाती है, जब तक उस बच्चे कि उम्र कम से कम 7 वर्ष न हुआ हो। अगस्त 2014 में भाजपा सरकार ने लोकसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल को रखा था, और नए संशोधन बिल में उम्र की सीमा को घटाकर 18 वर्ष से 16 वर्ष कर दिया गया है।

आज किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 इस बात को स्पष्ट करता है, कि वो बच्चे जो कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं, उनके देखरेख और रखरखाव की जरूरत होती है, और उन बच्चों के साथ किस तरह से पेश आया जाए। नए नियम के अनुसार 16 वर्ष से अधिक उम्र के किशोर अपराधियों को वयस्क मानने का प्रावधान है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, गंभीर अपराधों में लिप्त पाए जाने वाले बाल अपराधियों को जेल की सजा दी जा सकती है। जबकि उन्हें उम्र कैद या फांसी की सजा नहीं होगी।

अगर किसी आरोपी की आयु 18 वर्ष से कम हो, तो उस आरोपी का मुकदमा अदालत के स्थान पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में चलता है। आरोपी पाए जाने पर किशोर को अधिकतम तीन वर्ष के लिए किशोर सुधार गृह भेजा जाता है। कानून में परिवर्तन के बाद रैगिंग जैसे अपराध करते हुए पाए जाने पर 16 वर्ष से अधिक वाले आरोपी को तीन वर्ष की सजा और 10,000 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

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