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  • Maidas Thanvi, The Signature Vocalist Of The Shilil Abuse, Is No Longer Alive, Keeping The 'Shilil' Tradition Alive For 50 Years, 15 Days After The Arrival Of HeartAttack.

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स्मृति शेष:श्लील गाली गायन के हस्ताक्षर माईदास थानवी नहीं रहे, 50 वर्षों तक ‘श्लील’ परंपरा को जीवंत रखा, हार्टअटैक आने के 15 दिन बाद भी निकाली थी गेर

जोधपुर2 महीने पहले
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श्लील गाली गायन के पर्याय एवं हस्ताक्षर और इस परंपरा को 50 वर्षों से संजोए एवं जीवंत रखने वाले माईदास थानवी (81) नहीं रहे। पिछले कुछ दिनों से बीमार माईदास का सोमवार सुबह निधन हो गया। उनका एक पुत्र एवं तीन पुत्रियों सहित भरा पूरा परिवार है। माईदास ने राजा मानसिंह की गालियों को अपने शब्दों में पिरोकर श्लील गायकी को नए आयाम तक पहुंचाया।

श्लील गाली गायन के प्रति उनका समर्पण इतना था कि घर में मौत के बावजूद माईदास ने होली के त्योहार का कभी शोक नहीं रखा। वे कहते थे कि- मैं होली का राजा हूं और होली के रंगों से तो सभी शोक समाप्त हो जाते हैं। कभी वे श्लील गाली गायन की गेर नहीं निकालते थे तो परकोटे में रहने वाली जनता उनके घर पहुंच जाती थी। आखिर उन्हें गेर निकालनी ही पड़ती थी।
जोश ऐसा - हॉस्पिटल से लौटकर भी निकाली थी गेर
याद है 90 के दशक का एक साल, तब माईदास थानवी को हार्टअटैक आ गया था। 15 दिन बाद होली थी। लोग मायूस हो गए। कहने लगे कि इस बार तो गेर शायद ही निकलेगी, माईदास जो बीमार हो गए हैं। अस्पताल से छुट्टी मिलते ही उन्होंने कहा कि- प्रैक्टिस शुरू करो, गेर तो निकलेगी। महज 4-5 दिन तैयारी कर गेर निकाली।
जज्बा ऐसा - गमी में भी संगीत को सर्वोपरि रखा, सम्मानित हुए
उन्हें मारवाड़ रत्न देने की घोषणा हुई तो शहर में खुशियां थीं। हालांकि मारवाड़ रत्न पुरस्कार मिलने के कुछ दिन पहले उनके नजदीकी रिश्तेदार का देहांत हो गया। इस दौरान 12 दिन चल रहे थे, लेकिन माईदास ने हिम्मत नहीं हारी व मारवाड़ रत्न से सम्मानित हुए।
जादू ऐसा - गीत और एक्शन पर लोग वारी-वारी जाते
माईदास की आवाज में तो दम था ही, इन पर किए जाने वाले एक्शन गीत के बोल को लाइव कर देते थे। उनकी इन अदाओं के गुरु थे स्व. दाऊलाल जोशी मास्टर साब। वो इनकी गालियों की रचना करते थे। इसके साथ ही किस शब्द को एक्शन के साथ कैसे स्पष्ट करना है, इसकी भी ट्रेनिंग देते थे। इससे गीत के बोल से ज्यादा उनके एक्शन लोगों का खूब मनोरंजन करते थे। दाऊलाल जोशी के निधन के बाद ये जिम्मेदारी गुरु गोविंद कल्ला ने संभाली। उनकी मशहूर गालियों में लायो लायो सगीजी..., स्कूटर माथै बैठ सगीजी..., पाच्छा फेर अाया हो... व होली-छाळौड़ी जब आती है तो... शामिल थीं।
जिंदा ऐसे - श्लील गायन की पीढ़ी तैयार कर गए
समाज में उनका विशेष योगदान था। वे सालों से मंडलनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। मंडलनाथ मेले से पहले समाज के एक-एक घर में न्योता देने जाते थे। वहीं गणगौर के मेले में भी माईदास थानवी की झांकी का विशेष इंतजार रहता था। उन जैसे कई युवा गेर गायक माईदास को प्रेरणास्रोत मानकर गाली गायन के मैदान में उतरे हैं।
इधर, थानवी के निधन पर शहर के संगीत रसिकों, लोक कलाकारों, संस्था-संगठनों सहित केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत, श्लील गाली गायन संस्था बेली फ्रेंड्स क्लब के मनोज पुरोहित ने शोक जताया। वहीं राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष रमेश बोराणा ने बताया कि श्लील गाली गायक माईदास थानवी का निधन मारवाड़ के पारंपरिक लोकगायन क्षेत्र व सांस्कृतिक विरासत की अपूरणीय क्षति है।

वे लोकरंग के ऐसे जीवंत कलाकार थे जो सिर्फ होली के अवसर पर गाते थे, लेकिन वर्षपर्यंत श्रोताओं के दिलों में उमंग उत्साह का संचार करते रहते थे। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के कला पुरोधा सम्मान से सम्मानित ऐसे विलक्षण कलाकार को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई।

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