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हाईकोर्ट का आदेश:अब जमानत आदेश में निचली कोर्ट को पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में लिखना होगा

जोधपुर2 महीने पहले
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  • हाईकोर्ट ने नियमित या अग्रिम जमानत मामलों के संबंध में दिया आदेश
  • फायदाः जमानत के मामलों की सुनवाई व निस्तारण में तेजी आएगी

(नरेश आर्य) प्रदेश के अधीनस्थ अदालतों को अब किसी भी आरोपी की नियमित या अग्रिम जमानत खारिज या स्वीकार करते समय अपने आदेश में उसके पूर्व के आपराधिक रिकॉर्ड के होने या नहीं होने के बारे में लिखना होगा। आरोपी का पूर्व में कोई आपराधिक रिकॉर्ड है तो एफआईआर नंबर, केस नंबर, धारा, तारीख, स्टेटस, पूर्व के केस में गिरफ्तारी व रिहाई का उल्लेख करते हुए चार्ट तैयार करना होगा और अधीनस्थ अदालतों को उसे जमानत स्वीकार या खारिज करने के आदेश में शामिल करना होगा।

सभी सरकारी वकीलों को निर्देश दिए हैं कि वे एडवांस में ही प्रत्येक जमानत के मामले में पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी मंगाकर रखेंगे। यह महत्वपूर्ण आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्रसिंह भाटी ने एक जमानत याचिका निस्तारित करते हुए प्रदेश के सभी जिला व सेशन न्यायाधीशों को दिए। साथ ही हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को इस आदेश की पालना सुनिश्चित करवाने के निर्देश देते हुए 5 जनवरी को अगली सुनवाई पर पालना रिपोर्ट मांगी है।

यह था मामला
याचिकाकर्ता जुगल पुत्र पप्पूराम के खिलाफ जोधपुर के सरदारपुरा थाने में आईपीसी की धारा 392/34 के तहत मामला दर्ज है। मामले में वह जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद है। उसकी ओर से अधीनस्थ कोर्ट में जमानत प्रार्थना पत्र पेश किया गया, लेकिन उसे जमानत नहीं मिली। उसने हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की और दलील दी कि उसके पूर्व में कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। जब कोर्ट ने इस संबंध में लोक अभियोजक मोहम्मद जावेद से पूछा तो वे इस तथ्य को खारिज करने की स्थिति में नहीं थे। तब कोर्ट ने तथ्यों व परिस्थितियों को देखते हुए जमानत मंजूर कर ली।

पूर्व रिकाॅर्ड नहीं होने को गंभीरता से लिया
अधीनस्थ कोर्ट द्वारा आरोपी याचिकाकर्ता के जमानत खारिज करने के आदेश में उसके पूर्व में आपराधिक रिकॉर्ड होने या नहीं होने की जानकारी का उल्लेख नहीं होने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया। जस्टिस भाटी ने कहा कि अक्सर देखने में आता है कि अधीनस्थ अदालतें आरोपियों के पूर्व के आपराधिक रिकॉर्ड या जानकारी के बारे में आदेश में नहीं लिखते, जिसकी वजह से जमानत प्रार्थना पत्र निस्तारित करने में देरी होती है। कोई आरोपी के पूर्व में आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उसे मंगाया जाता है और उसे प्राप्त होने में कुछ समय लगता है।

पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड केवल आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी का पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड उसकी जमानत स्वीकार करने या खारिज करने का आधार नहीं है, लेकिन यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट को सीआरपीसी की धारा 437 (1) के तहत उसके पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड की रिपोर्ट को चैक करना चाहिए।

यह होगा फायदा न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया आरोपी सबसे पहले संबंधित अधीनस्थ अदालत में जमानत प्रार्थना पत्र पेश करता है। वहां से जमानत खारिज होने पर वह हाईकोर्ट में जमानत की गुहार लगाता है। हाईकोर्ट द्वारा उसके पूर्व के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी मंगाई जाती है और वह फाइल या अधीनस्थ अदालत के आदेश में नहीं होने पर थाने से मंगाई जाती है।

ऐसे में जमानत प्रार्थना पत्र निस्तारित होने में समय लगता है। अब अधीनस्थ अदालतों के आदेश में यह जानकारी होने पर इस ग्राउंड पर बहस करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। जमानत प्रार्थना पत्र के निस्तारित होने में तेजी आएगी।

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