जायकाऐसी मिठाई जिस पर लगता है कंपनी का ठप्पा:10 दिन तक खराब नहीं होती, स्वाद ऐसा कि अंग्रेज भी दीवाने

जोधपुर4 महीने पहलेलेखक: पूर्णिमा बाेहरा

सोने और चांदी के सिक्कों पर आपने कई तरह की ब्रांडिंग देखी होगी। उन पर किसी खास कंपनी का ठप्पा या मुहर लगी रहती है। लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि एक मिठाई पर भी ऐसा ही स्टैम्प लगता है। ये हैं जोधपुर के मिश्रीलाल के केसर पेड़े, जिनके हर पीस पर एक स्पेशल स्टैम्प लगती है। घंटाघर चौक पर अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही इस दुकान का हर जायका निराला है। राजस्थानी जायका की इस कड़ी आज बात उन पेड़ों की, जिसके शौकीन विदेशों में भी हैं....

जोधपुर के किसी भी कोने पर खड़े होकर पूछेंगे कि स्टैम्प वाले पेड़े कहां मिलते हैं। बताने वाले सीधा इशारा करेंगे घंटाघर चौक चले जाइए। दूर-दूर से दुकान ढूंढते हुए हर रोज लोगों की भीड़ मिश्रीलाल की दुकान पर पहुंचती है और पेड़े की डिमांड करती है।

मावा और केसर से बने सुनहरे रंग के यह स्टैम्प लगे पेड़े दिखने में जितने सुंदर हैं, खाने में उतने ही लाजवाब। इसकी शुरुआत कैसे हुई, स्टैम्प लगाने का राज क्या है? यह जानने के लिए राजस्थानी जायका की टीम पहुंची उस दुकान पर जिसकी शुरुआत 1927 में हुई।

तीसरी पीढ़ी के संदीप अरोड़ा ने बताया कि यह दुकान उनके दादा मिश्रीलाल ने शुरू की थी। आजादी से पहले पूरा मारवाड़ ब्रिटिश हुकूमत के अंडर में था। खाने-पीने की चीजें बेचने के लिए फीस देकर अंग्रेज अफसरों से लाइसेंस लेना पड़ता था।

तब 1927 में मिश्रीलाल अरोड़ा ने फूड लाइसेंस लेकर इस दुकान से घी की कचौरी, रबड़ी और कोफ्ता बेचना शुरू किया। इसके साथ-साथ इंग्लैंड से कई फ्लेवर का सोडा मंगवाकर भी बेचना शुरू किया। साल 1960 में पिता राधेश्याम ने भी बिजनेस में हाथ बंटाना शुरू किया और माखनिया लस्सी की भी शुरुआत की।

ऐसे हुई पेड़ों की शुरुआत
संदीप बताते हैं कि साल 1975 में दादा मिश्रीलाल को ही पेड़े का आइडिया आया था। कई प्रयोग करने के बाद उन्होंने मावा में केसर एड कर सुनहरी रंग के पेड़े बनाने की शुरुआत की। उनकी यह जिद्द भी थी कि हर पेड़ा मिश्रीलाल के नाम के साथ बिके।

इसलिए उन्होंने पेड़े पर लगाने के लिए उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से एक खास स्टैम्प भी बनवाई। आज भी जब नई मुहर की जरूरत पड़ती है तो अलीगढ़ से ही मंगवाई जाती है। मिश्रीलाल की रेसिपी से ही आज भी पेड़ा बनता आ रहा है। एक-एक पेड़े पर हमारी पुश्तैनी पहचान का ठप्पा यानी स्टैम्प लगाई जाती है।

बदलते ट्रेंड में दुकान पर ऑनलाइन ऑर्डर भी आने लगे हैं। नॉर्थ और ईस्ट के कई स्टेट से डिमांड ज्यादा आती है। वह पार्सल कर वहां पेड़े भेजते हैं। टूरिस्ट सीजन में विदेशी मेहमानों की भीड़ रहती है।

विदेशी सैलानियों में भी पेड़े फेमस होने से इसकी डिमांड बढ़ी है। संदीप ने बताया कि यह पेड़ा सिर्फ दूध से बनने के कारण व्रत में भी खाया जा सकता है। ऐसे में फैस्टिवल सीजन में लोग एक्स्ट्रा डिमांड कर पेड़े बनवाते हैं।

10 घंटे में तैयार होते हैं स्टैम्प वाले पेड़े
यह पेड़े शुद्ध मावे से बनाए जाते हैं। मावा भी दुकान पर ही तैयार होता है। पहले मावा कारीगर तैयार करते थे। लेकिन अब ज्यादातर काम मशीनों से होता है। भट्टी पर सिकाई के बाद मशीनों से ही मैश किया जाता है।

बनाने में करीब 10 घंटे लगते हैं। तैयार होने के बाद स्टैम्प लगाने का काम कारीगर ही करते हैं। मौजूदा समय में 12 से ज्यादा कारीगर की टीम काम कर रही है।

डेली तैयार होते हैं 100 किलो पेड़े, करोड़ों में कारोबार
संदीप बताते हैं कि जिस छोटी सी दुकान से मिश्रीलाल ने शुरुआत की थी, उसे आज एक होटल में तब्दील कर दिया है। माखनिया लस्सी, घी की कचौरी और पेड़े तीनों ही उनके ब्रांड बन चुके हैं।

कारीगर रोज 10 घंटे की मेहनत से 100 किलो पेड़े तैयार करते हैं। मिलावट नहीं होने की वजह से ये पेड़े 10 दिन तक खराब नहीं होते। एक किलो पेड़े की कीमत 480 रुपए है। सालाना कारोबार 1 करोड़ रुपए से ज्यादा का है।

राजस्थानी जायका के बाकी ऐपिसोड यहां देखें:-

जायकाकभी सुना है घेवर, गुलकंद, गुलाब जामुन वाला केक:MBA गोल्ड मेडलिस्ट ने शुरू किया ऐसा बिजनेस, सालाना 40 करोड़ का कारोबार

शाही समोसा जिसे चटनी नहीं, ब्रेड में दबाकर खाते हैं : स्वाद ऐसा कि विदेशों तक डिमांड, छोटी सी दुकान से करोड़ों का कारोबार

इस राजस्थानी नाश्ते के अंबानी-तेंदुलकर भी मुरीद : कढ़ी-कचौरी खाने वालों की लगती हैं लाइन, 50 करोड़ का सालाना कारोबार

कोटा के कड़क 'कड़के', 120 साल पुराना स्वाद:सरकारी नौकरी छोड़ लगाया ठेला; अमेरिका-जापान से भी आ रहे ऑर्डर

दूध-पनीर से बनी मधुमक्खी के छत्ते जैसी मिठाई : चॉकलेट, रोज, केसर समेत कई फ्लेवर; एक करोड़ से ज्यादा का कारोबार