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कोरोना कितना दर्दनाक है, देखिये:जोधपुर के अस्पतालों में जगह नहीं बची, मरीज गिड़गिड़ा रहे, समय पर ऑक्सीजन नहीं मिलने से तड़पते हुए युवक की निकल गई जान

जोधपुर14 दिन पहले
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एमडीएम अस्पताल में चोटिला से लाए गए इस युवक को ऑक्सीजन मिल पाती, उससे पहले ही जान चली गई। - Dainik Bhaskar
एमडीएम अस्पताल में चोटिला से लाए गए इस युवक को ऑक्सीजन मिल पाती, उससे पहले ही जान चली गई।
  • मरीजों की भीड़ को संभाल नहीं पा रहे है अस्पताल

जोधपुर में पूरी तरह से बेकाबू हो चुके कोरोना संक्रमण के कारण अस्पतालों की व्यवस्थाएं पूरी तरह से गड़बड़ा गई है। सभी अस्पताल मरीजों से पूरी तरह से भर चुके हैं। नए मरीजों को भर्ती करने के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां पहुंचने वाले नए मरीजों को ओपीडी में घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। शहर के एमडीएम अस्पताल में रविवार को पहुंचे एक युवक ऑक्सीजन के लिए तड़पता रहा। परिजन वहां के डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों से गुहार लगाते रहे। लेकिन उनके पास भी कोई व्यवस्था नहीं थी और वे बेबस नजर आए। थोड़ी देर में वहां एक बेंच पर लेटे युवक की प्राण वायु के अभाव में सांसें थम गई।

चोटिला गांव के पप्पूसिंह को उसके परिजन लेकर एमडीएम अस्पताल पहुंचे। एमडीएम अस्पताल में भर्ती होने के लिए मरीजों की कतार लगी रहती है। ऐसे में उसके साथ आया छोटा भाई पर्ची बनवाने की कतार में जा लगा। दूसरी तरफ वहां एक बेंच पर लेटे पप्पूसिंह की तबीयत बिगड़ती रही। इस दौरान छोटा भाई लगातार प्रयास करता रहा कि किसी भी तरह उसे ऑक्सीजन मिल सके। लेकिन सभी ऑक्सीजन युक्त स्ट्रेचर पर मरीज लेटे हुए थे। ऐसे में पप्पूसिंह को समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल पाई। छोटे भाई ने काफी प्रयास किए। उसने अपने मिलने वालों को फोन कर गिड़गिड़ाते हुए मदद मांगी। कोई कुछ मदद कर पाता उससे पहले पप्पूसिंह की सांसें थम गई।

भर्ती होने को करनी पड़ती है जद्दोजहद

कमोबेश ऐसे ही हालात महात्मा गांधी अस्पताल के है। मरीजों को भर्ती होने के लिए कई परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है। ऑक्सीजन लेवल काफी कम होते ही परिजन मरीज को लेकर अस्पताल भागते है। वहां का नजारा देख उनके होश उड़ जाते है। पहले से बड़ी संख्या में लोग इलाज के इंतजार में भैटे नजर आ जाते है। ओपीडी में ऑक्सीजन सिलेंडर युक्त कुछेक ही स्ट्रेचर होते है। इन पर मरीज को लेटा कर आते ही ऑक्सीजन दी जाती है। किस्मत वाले को वहां पहुंचते ही कोई स्ट्रेचर खाली मिल पाता है। अन्यथा उखड़ती सांसों के बीच बेबस निगाह से उसे इंतजार करना पड़ता है। स्ट्रेचर पर लेटे मरीजों को वार्ड में कोई बेड खाली होने पर ही शिफ्ट किया जा सकता है। ऐसे में कई स्ट्रेचर घंटों तक खाली नहीं हो पाते। इस दौरान ऑक्सीजन के इंतजार में तड़प रहे मरीजों के परिजनों की स्थिति और भी खराब हो जाती है। वे डॉक्टरों से गुहार लगाते रहते है और बेबस डॉक्टर उनकी मदद करने की स्थिति में भी नहीं रहते। इन हालात के बारे में डॉक्टरों का कहना है कि वे भरसक प्रयास कर रहे है कि सभी को इलाज मिले, लेकिन हमारी भी एक सीमा है।

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