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18 साल बाद मदेरणा परिवार का जिला प्रमुख:प्रदेश की राजनीति में 50 साल से वजूद रखने वाला मदेरणा परिवार फिर चर्चा में, तब पिता-पुत्र थे पॉवर में, अब मां और बेटी

जोधपुर18 दिन पहलेलेखक: नरेश कुमार
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प्रदेश की राजनीति में 50 साल तक ‘राज’ करने वाला मदेरणा परिवार। - Dainik Bhaskar
प्रदेश की राजनीति में 50 साल तक ‘राज’ करने वाला मदेरणा परिवार।

प्रदेश व जोधपुर की राजनीति में 50 साल से भी ज्यादा समय तक वजूद रखने वाला मदेरणा परिवार फिर से चर्चा में है। वर्ष 2003 के बाद जिला प्रमुख पद पर फिर से मदेरणा परिवार काबिज हो गया है। प्रदेश की राजनीति में 50 साल तक ‘राज’ करने वाला मदेरणा परिवार दिग्गज कांग्रेसी परसराम मदेरणा के राजनीति छोड़ने के बाद से ही चर्चा में तो रहा, लेकिन पावर कम हुआ।

दस साल पहले परसराम के पुत्र महिपाल मदेरणा को भंवरी मामले में आरोपी बनने के बाद मंत्री पद से बर्खास्त किया गया था। इसके करीब तीन साल बाद परसराम मदेरणा का निधन हो गया। इसके बाद हालात यह हो गए कि इस परिवार से ना तो कोई विधायक बना और ना ही जिला प्रमुख बना। हालांकि इस दौरान लीला मदेरणा को विधानसभा चुनाव में टिकट मिला, लेकिन हार का सामना करना पड़ा।

ढाई साल पहले दिव्या मदेरणा ने ओसियां से चुनाव जीता और ढाई साल बाद अब लीला मदेरणा जोधपुर की जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं तो मदेरणा परिवार एक बार फिर से पावर में आ गया। करीब 18 साल पहले पिता परसराम पावर में थे तो उनका बेटा महिपाल जिला प्रमुख थे। अब बेटी दिव्या विधायक हैं तो मां लीला जिला प्रमुख बन गई हैं।

भंवरी मामले में बैकफुट के बाद 7 दशक की राजनीति फिर चमकी

68 साल से राजनीति में है परिवार
मदेरणा परिवार से सबसे पहले स्व. परसराम मदेरणा वर्ष 1953 में चाड़ी गांव से सरपंच चुने गए। इसके बाद वर्ष 1957 से 1998 तक लगातार विधायक रहे। इसमें वर्ष 1985-90 आठवीं विधानसभा के सदस्य नहीं रहे। इस बीच 1982 से वर्ष 2003 उनका बेटा महिपाल जिला प्रमुख रहे। अब उनकी पोती विधायक हैं।

23 साल पहले पिता-पुत्र दोनों थे पावर में
वर्ष 1980 में परसराम विधायक व मंत्री थे और तो उनके बेटे वर्ष 1982 में पहली बार जिला प्रमुख बने थे। इसके बाद यह स्थिति वर्ष 2003 तक चली। यानी दोनों पावर में रहे। वर्ष 2003 के बाद परसराम ने चुनाव लड़ना छोड़ दिया था और उनके बेटे ने विधानसभा का चुनाव जीता।

भंवरी अपहरण मामले में उलझे तो पॉवर छूटा
वर्ष 2003 में महिपाल विधायक चुने गए, जब वर्ष 2008 में कांग्रेस सत्ता में आई तो महिपाल जलदाय मंत्री बने। वे करीब तीन साल तक मंत्री रहे, इसके बाद वे एएनएम भंवरी अपहरण व हत्या के मामले में फंस गए और सीबीआई ने उन्हें आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। इससे उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और इधर, वर्ष 2004 में उनकी पत्नी लीला मदेरणा ने जिला परिषद सदस्य का चुनाव तो जीता, लेकिन वे जिला प्रमुख नहीं बन पाईं। इस तरह मदेरणा परिवार पूरी तरह हाशिये पर चला गया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी लीला को हार झेलनी पड़ी थी।

अब मां-बेटी पावर में
राजनीति में हाशिये पर चले जाने के बावजूद मदेरणा परिवार ने लोगों से कनेक्टिविटी नहीं छोड़ी, इस वजह से वर्ष 2018 में महिपाल की बेटी दिव्या को विधानसभा का टिकट मिला और जीत हासिल की। उनकी मां लीला भी अपेक्स बैंक की चेयरमैन भी चुनी गईं और अब जिला प्रमुख पद पर लीला के चुने जाने पर मदेरणा परिवार की 23 साल पहले वाली स्थिति वापस आ गई है।

गहलोत से नजदीकियां और सुधरे संबंधों से बदले हालात

  • वर्ष 1998 में अशोक गहलोत के सीएम बनते ही मदेरणा परिवार खासा नाराज हो गया था। इसके बाद कई बार महिपाल ने खुले मंचों पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी। यह तल्खी वर्ष 2008 तक जारी रही। वर्ष 2007-08 में दोनों के बीच संबंध सुधरने लगे और वर्ष 2008 में कांग्रेस के सत्ता में आते ही महिपाल को कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
  • भंवरी मामले में महिपाल के आरोपी बनने के बावजूद गहलोत ने ओसियां से लीला को 2013 में कांग्रेस से टिकट दिलाया।
  • 2018 में दिव्या को टिकट मिला और मदेरणा परिवार की गहलोत के प्रति कड़वाहट और दूर हुई। इसी का परिणाम है कि जिला प्रमुख बनने की बारी आई तो गहलोत के खास माने जाने वाले बद्रीराम जाखड़ की बेटी मुन्नी देवी की तुलना में लीला मदेरणा को तरजीह दी गई।

लीला-दिव्या से नाराज नेहा चौधरी बोलीं- गुमराह क्यों करते हो, हमने ऐसा क्या गुनाह किया?

नाम वापसी के लिए कांग्रेस की मुन्नी गोदारा और नेहा चौधरी नाम वापसी के लिए पहुंची, लेकिन समय निकल चुका था।
नाम वापसी के लिए कांग्रेस की मुन्नी गोदारा और नेहा चौधरी नाम वापसी के लिए पहुंची, लेकिन समय निकल चुका था।

जोधपुर| जिला प्रमुख के चुनाव में कांग्रेस की हड़बड़ाहट वाली हालत रही, नामांकन प्रक्रिया पूरी होने तक यह स्पष्ट नहीं था कि कांग्रेस का जिला प्रमुख प्रत्याशी कौन है? इसलिए एक-दो नहीं, बल्कि 4 महिला उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किए। नेहा चौधरी तो नामांकन का समय पूरा होने के महज दो-तीन मिनट पहले आई और फॉर्म दाखिल किया। जब उन्हें नामांकन वापस लेने का कहा तो वे बिफर गईं।

उन्होंने लीला मदेरणा व विधायक दिव्या मदेरणा से कड़ी नाराजगी जताई। नेहा ने लीला से कहा कि- उन पर स्वार्थी व अहसानफरामोश होने का झूठा आरोप लगाया जा रहा है। जब उनसे फॉर्म भरने को कहा गया, तब वे फॉर्म भरने आई थी। मैं आपके ऊपर नहीं हो सकती हूं। मैं तो आपकी बच्ची हूं। बस मुझे गुमराह नहीं करना था, बात इतनी सी है।

इस पर लीला ने पूछा कि ऐसा किसने फॉर्म भरने को कहा। वे उन्हें व मुन्नीदेवी को फॉर्म वापस लेने जाने के लिए गाड़ी में बैठने का कहती हैं और फिर वे सब एकसाथ कलेक्ट्रेट के लिए रवाना होते हैं। इससे पहले नेहा ने दिव्या मदेरणा से भी नाराजगी जताई और कहा कि ऐसा उन्होंने क्या गुनाह किया। इस दौरान किसी के द्वारा वीडियो बनाने पर दिव्या उसे टोकती भी है और बाद में वे वहां से चली जाती हैं।

प्रभारी भी चिंतित रहे, जब मुन्नी-नेहा नामांकन वापस लेने नहीं आई| जब जिला प्रमुख के लिए लीला मदेरणा का नाम तय हो गया था तो प्रभारी प्रशांत बैरवा मुन्नीदेवी व नेहा चौधरी का इंतजार कर रहे थे। लेकिन निर्धारित समय तक वे नहीं पहुंची तो चिंतित हो गए।

उन्होंने पत्रकारों को स्पष्टीकरण भी दिया कि कांग्रेस एकजुट है और ट्रैफिक में फंसे होने की वजह से वे नहीं पहुंच पाई। इस पर वे कुछ देर के लिए बाहर गए। करीब 4 मिनट बाद, यानि 1 बजकर 4 मिनट पर नेहा चौधरी तो 1 बजकर 6 मिनट पर मुन्नी देवी आईं। वे दोनों नामांकन वापस लेने के लिए आरओ के पास गई। उन्होंने समयावधि खत्म होने के कारण इनकार कर दिया।

बस से लाए सभी सदस्यों को
क्रॉस वोटिंग या वोट देने से कोई वंचित न रह जाए, इसलिए सभी सदस्यों को बस द्वारा कलेक्ट्रेट लाया गया। मतदान के बाद भी सभी सदस्यों को वहीं रोका गया।

ग्रामीण राजनीति में भी जुटना पड़ा शहरी नेताओं को
रविवार तक जिला प्रमुख के चुनाव को ग्रामीण राजनीति का हिस्सा बताते हुए खुद को दूर बताने वाले शहरी क्षेत्र के नेता भी सहमति बनाने में जुटे हुए थे। इनमें शहर विधायक मनीषा पंवार, बाल संरक्षण आयोग अध्यक्ष संगीता बेनिवाल, पूर्व जेडीए चेयरमैन राजेंद्रसिंह सोलंकी सहित कई और नेता शामिल थे।

21 और लीला मदेरणा का अनूठा नाता
जिला प्रमुख चुनी गई लीला मदेरणा और 21 नंबर का अनूठा नाता देखने को मिला। जिला प्रमुख चुनाव में लीला को 21 वोट मिले और चुनाव का साल भी 21 है। लीला के सामने कांग्रेस के तीन प्रत्याशी थी, कांग्रेस सिंबल लेकर वह प्रतिद्वंद्वियों पर भी 21 ही रही। इसके अलावा 10 साल जेल में रहने के बाद उनके पति को भी वर्ष 21 में ही जमानत मिली।

इसलिए खारिज नहीं हुआ नामांकन और निर्दलीय बनीं
मुन्नीदेवी व नेहा चौधरी ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में नामांकन भरा था। जब नियत समय पर यह दोनों फॉर्म वापस नहीं ले सकी तो उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार घोषित किया गया। जिला प्रमुख के चुनाव में सिंबल नहीं मिलने पर उस उम्मीदवार को निर्दलीय उम्मीदवार घोषित कर दिया जाता है। जबकि जिला परिषद या अन्य चुनाव में सिंबल नहीं मिलने पर प्रत्याशी का नामांकन ही खारिज हो जाता है।