शाही समोसा जिसे चटनी नहीं, ब्रेड में दबाकर खाते हैं:स्वाद ऐसा कि विदेशों तक डिमांड, छोटी सी दुकान से करोड़ों का कारोबार

जोधपुर5 महीने पहलेलेखक: पूर्णिमा बोहरा

कचौरी और मिर्ची बड़ा के शौकीनों का शहर है जोधपुर। यहां सुबह की शुरुआत ही इसी नाश्ते से होती है। हालांकि एक जायका और भी है, जिसने जोधपुर वालों के दिल में खास जगह बनाई है। यह है दादा-पोते के हाथों से तैयार होने वाला शाही समोसा।

घंटाघर चौराहे पर अगर आपको किसी दुकान के बाहर लंबी लाइन दिखे तो समझ जाइएगा, यही है अरोड़ा साहब की शाही समोसा शॉप। जहां समोसा चटनी के साथ नहीं ब्रेड की स्लाइस में दबाकर खाना पसंद करते हैं। तो चलिए राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको रूबरू करवाते हैं रॉयल यानी 'शाही' समोसा के बारे में....

एक वक्त था जब जोधपुर के लोगों को मिर्ची बड़ा और कचौरी के आगे समोसा खिलाना बड़ी चुनौती का काम था। इस चुनौती को स्वीकारा आनंद प्रकाश अरोड़ा ने। साल 1984 में अरोड़ा ने एक छोटी सी दुकान के बाहर थड़ी लगाकर समोसा बेचना शुरू किया। कई दिन तक ग्राहकों के लिए तरसना पड़ा।

शहर वालों में समोसे का क्रेज जगाने के लिए खुद के हाथों से पंपलेट तैयार कर प्रमुख चौराहों पर पब्लिसिटी की। जिसे देखकर कुछ ग्राहकी होने लगी। एक बार जिसने भी स्वाद चखा वो दीवाना बनता चला गया। माउथ पब्लिसिटी ने ऐसा कमाल दिखाया कि शॉप के बाहर ग्राहकों की लाइन लगने लगी।

आनंद प्रकाश बताते हैं कि 1984 से पहले घास मंडी में मंदिर के पास एक छोटा सा ठेला लगाकर कोफ्ता बेचा करते थे। तब उन्हें समोसे का आइडिया आया था। सबसे पहले बात आई कि नाम क्या रखा जाए। इस काम में उन्होंने कई दोस्तों की मदद ली। दोस्तों ने 10-12 नाम सुझाए। समोसे की रेसिपी में ड्राई फ्रूट्स थे इसलिए नाम फाइनल हुआ, शाही समोसा। जो आज जोधपुर ही नहीं दुनिया के कई देशों में लोगों की जुबान पर है। इसके लिए कई प्रयोग किए गए। अलग-अलग मसालों के कॉम्बिनेशन से समोसे तैयार कर लोगों से रिव्यू लिए, तब जाकर फाइनल टेस्ट तक पहुंचे।

दादा की साइंस और पोते का मैनेजमेंट
आनंद प्रकाश ने बेटे का निधन होने के बाद अपने पोते दीपांशु अरोड़ा को समोसे में मसालों की साइंस सिखाई। आज दादा की देखरेख और पोते के मैनेजमेंट में रोज हजारों शाही समोसे तैयार होते हैं। कई कस्टमर्स ऐसे हैं जो सालों से इनके यहां समोसा खा रहे हैं। आनंद प्रकाश के मुताबिक आज भी कभी मसालों में थोड़ी सी गड़बड़ी अगर किसी को लगती है तो लोग उनके घर आ जाते हैं। कस्टमर से उनका रिश्ता इतना गहराई से कायम हुआ है।

दुबई जाते हैं पैकेट
बाजार से साबुत मसाला लाते हैं। जिसे खुद ही पीस कर तैयार करते हैं। इससे मसालों की महक बनी रहती है। बेहतर क्वालिटी का रिफाइंड मूंगफली तेल यूज करते हैं। शाही समोसे 24 घंटे खराब नहीं होते हैं। जोधपुर से बाहर भी अच्छी खासी डिमांड रहती है। लोग स्पेशल पैकिंग के जरिए दुबई, मुंबई, दिल्ली व बेंगलुरु तक ले जाते हैं।

दीपांशु अरोड़ा ने बताया कि 1984 में उनके पास छोटी सी दुकान थी, लेकिन अब आस-पास की चार दुकानें खरीद ली हैं। कभी 25 पैसे में समोसा बेचते थे, आज एक की कीमत 22 रुपए है। डेली 15 से 17 हजार समोसे बिक जाते हैं। मंथली टर्न ऑवर 18 से 20 लाख के बीच रहता है। वहीं सालाना कारोबार 2.5 करोड़ के करीब है। दुकान पर 20 लोगों का स्टाफ काम कर रहा है।

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