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विजयादशमी पर रावण की ससुराल में शोक:दशानन की बारात में आए कुछ लोग जोधपुर में ही बस गए थे, खुद को बताते हैं लंकापति का वंशज, नहीं मनाते दशहरा

जोधपुरएक महीने पहले
जोधपुर में स्थापित रावण की प्रतिमा। खुद को रावण का वंशज बताने वाले लोग नियमित रूप से रावण की पूजा करते हैं। दशहरा पर शोक मनाते हैँ।
  • इन लोगों ने रावण का मंदिर बनवा रखा है और नियमित रूप से उसकी पूजा भी करते हैं
  • जोधपुर में इस गौत्र के करीब 100, जबकि जिले के ही फलोदी इलाके में 60 परिवार रहते हैं

विजयादशमी पर जहां पूरा देश असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक इस दिन खुशी मनाएगा, वहीं जोधपुर में खुद को रावण का वंशज मानने वाले कुछ परिवार शोक मनाएंगे। ऐसी मान्यता है कि मंदोदरी के साथ रावण का विवाह जोधपुर में हुआ था। उस समय बारात में आए इन लोगों के पूर्वज यहीं पर बस गए थे। इन लोगों ने रावण का मंदिर भी बनवा रखा है और नियमित रूप से रावण की पूजा भी करते हैं।

मंदिर के मुख्य पुजारी कमलेश दवे का कहना है कि रावण दहन भले ही न हो, लेकिन इस दिन हम शोक मनाते आए हैं और इस बार भी ऐसा ही होगा। शाम को हम लोग स्नान कर अपनी जनेऊ बदलने के बाद रावण की विधिवत पूजा-अर्चना कर भोग चढ़ाएंगे।

मेहरानगढ़ फोर्ट में है रावण का मंदिर

जोधपुर के मेहरानगढ़ फोर्ट की तलहटी में रावण और मंदोदरी का मंदिर है। गोधा गौत्र के ब्राह्मणों ने यह मंदिर बनवाया है। इस मंदिर में रावण और मंदोदरी की अलग-अलग विशाल प्रतिमाएं स्थापित हैं। दोनों को शिव पूजन करते हुए दर्शाया गया है।

पुजारी कमलेश कुमार का दावा है कि उनके पूर्वज रावण के विवाह के समय यहां आकर बस गए थे। पहले रावण की तस्वीर की पूजा करते थे, लेकिन 2008 में इस मंदिर का निर्माण कराया गया। हम लोग रावण की पूजा कर उनके अच्छे गुणों को लेने का प्रयास करते हैं। जोधपुर में इस गौत्र के करीब 100 और जिले के फलोदी में 60 परिवार निवास करते हैं।

उन्होंने बताया कि रावण महान संगीतज्ञ होने के साथ ही वेदों के ज्ञाता थे। ऐसे में कई संगीतज्ञ व वेद का अध्ययन करने वाले छात्र रावण का आशीर्वाद लेने इस मंदिर में आते हैं।

जोधपुर में रावण के मंदिर में स्थापित उसकी पत्नी मंदोदरी की प्रतिमा।
जोधपुर में रावण के मंदिर में स्थापित उसकी पत्नी मंदोदरी की प्रतिमा।

यह है लोक मान्यता
ऐसा कहा जाता है कि असुरों के राजा मयासुर का दिल हेमा नाम की एक अप्सरा पर आ गया था। हेमा को प्रसन्न करने के लिए उसने जोधपुर शहर के निकट मंडोर का निर्माण किया। मयासुर और हेमा के घर एक बहुत सुंदर पुत्री का जन्म हुआ। इसका नाम मंदोदरी रखा गया। एक बार मयासुर का देवताओं के राजा इन्द्र के साथ विवाद हो गया और उसे मंडोर छोड़कर भागना पड़ा।

उसके जाने के बाद मंडूक ऋषि ने मंदोदरी की देखभाल की। अप्सरा की बेटी होने के कारण मंदोदरी बहुत सुंदर थी। ऐसी रूपवती कन्या के लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा था। आखिरकार उनकी खोज उस समय के सबसे बलशाली और पराक्रमी होने के साथ विद्वान राजा रावण पर जाकर पूरी हुई। उन्होंने रावण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। मंदोदरी को देखते ही रावण उस पर मोहित हो गया और शादी के लिए तैयार हो गया।

रावण अपनी बारात लेकर शादी करने के लिए मंडोर पहुंचा। मंडोर की पहाड़ी पर अभी भी एक स्थान को लोग रावण की चंवरी (ऐसा स्थान जहां वर-वधू फेरे लेते हैं) कहते हैं। बाद में मंडोर को राठौड़ राजवंश ने मारवाड़ की राजधानी बनाया और सदियों तक शासन किया। 1459 में राठौड़ राजवंश ने जोधपुर की स्थापना के बाद अपनी राजधानी को बदल दिया। आज भी मंडोर में विशाल गार्डन आकर्षण का केंद्र है।

इनपुट: एल देव दांगिड़

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