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  • There Is A Tradition In Marwar To Immortalize The Goats By Wearing A Kudak In The Ear, Ten Thousand Goats Have Escaped From Being Slaughtered After Achieving Immortality.

जैन समाज ने 250 बकरों को बचाया:कान में कुड़क पहना कर बकरों को अमर करने की मारवाड़ में हैं परम्परा, अमरत्व हासिल कर कटने से बच चुके हैं दस हजार बकरे

जोधपुर2 महीने पहले
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जोधपुर में चोखा गांव में लगने वाली बकरा मंडी से बकरा खरीदते जैन समाज के लोग। - Dainik Bhaskar
जोधपुर में चोखा गांव में लगने वाली बकरा मंडी से बकरा खरीदते जैन समाज के लोग।

मारवाड़ में एक परम्परा है कि बकरों को कटने से बचाने के लिए उसके कान में कुड़क पहना दी जाती है। इसके बाद बकरा अमर हो जाता है यानि अपनी प्राकृतिक मौत ही मरता है। कुड़क पहन अमर हुए बकरों को कोई नहीं काटता। पहले प्रत्येक गांव में एक बकरे को अमर कर दिया जाता था। अब इस परम्परा का निर्वहन जैन समाज कर रहा है। मारवाड़ में स्थित विभिन्न बकरा शालाओं में इस समय करीब दस हजार बकरे कुड़क पहन अमर हो आराम से रह रहे है। जोधपुर के जैन समाज ने इस बार ईद पर कल सुबह तक बीस लाख रुपए खर्च कर 250 बकरों की खरीद कर उन्हें कटने से बचा लिया।

बरसों से खरीद कर रहा है जैन समाज

जैन समाज के लोग बरसों से बकरों को ईद पर कटने से बचाने के लिए उसकी खरीद कर रहे है। इसके लिए मारवाड़ में जोधपुर शहर, पीपाड़, भोपालगढ़, बारनी, खोड़, कुचेरा व जैतारण में बकरा शालाओं का निर्माण किया हुआ है। बकरों की खरीद कर उन्हें इन बकरा शालाओं में भेज दिया जाता है। दुनियाभर में फैले जैन समाज के लोग बकरों की खरीद के लिए लगातार राशि भेजते रहते हैं। न केवल खरीदने के लिए बल्कि इनके रोजमर्रा के खर्च को भी जैन समाज के लोग मिलकर उठाते है।

इस बार 250 बकरों की खरीद

जैन समाज के गौतम कोठारी ने बताया कि ईद पर जोधपुर में चोखा गांव में लगने वाली बकरा मंडी से इस बार हमारी टीम ने बीस लाख रुपए में 250 बकरों की खरीद की। इन बकरों को बकराशालाओं में उपलब्ध स्थान के आधार पर भेज दिया जाता है। प्रत्येक बकरे के साथ तीन हजार रुपए भी उसके खाने-पीने के खर्च के रूप में भेजे जाते है। बकराशालाओं में इनके रहने को माकूल व्यवस्था की हुई है। समय-समय पर इन बकरों की डॉक्टर आकर जांच भी करता है। साथ ही जैन समाज के लोग रोजाना इन बकरों पर निगाह रखते है।

बकरों को अमर करने की परम्परा

मारवाड़ में बकरों को अमर करने की सदियों पुरानी परम्परा रही है। अमर यानि उस बकरे को कोई काट कर नहीं का सकता है। बकरे के कान में पहनी हुई कुड़क उसके अमरत्व प्राप्त करने की निशानी होती है। कुड़क पहने बकरे को चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम, कोई काटने की नहीं सोचता। सभी लोग समान रूप से उसके अमरत्व हासिल करने का सम्मान करते है। ऐसे बकरे अपनी अपनी आयु पूरी कर प्राकृतिक मौत ही मरते है।

भगवान महावीर के संदेश को सार्थक करने का प्रयास

कोठारी के साथ इस पुनीत कार्य में जोधपुर से शालिभद्र सिंधी, पंकज जैन, अमर चंद जैन, मुकेश मूथा, दीपक बोथरा, मूलचंद मूथा, आशीष गुलेच्छा, दीपेश बोहरा और राजेश बाफना जुड़े हुए है। ये लोग भगवान महावीर के संदेश जियो और जीने दो को सार्थक करने का प्रयास कर रहे है। इनका एक ही लक्ष्य है अधिक से अधिक बकरों की खरीद करना ताकि उनका जीवन बचाया जा सके।