सैरनी नदी ने बदली डांग की तकदीर:बंदूकें छोड़ दस्यु अब किसान बने, फेफड़े गलाते खनन से युवाओं का पीछा छूटा

करौली3 महीने पहलेलेखक: महेश शर्मा/श्यामराज शर्मा
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करौली में सैरनी नदी किनारे बसे गांवों की अनदेखी खुशनुमा तस्वीर - Dainik Bhaskar
करौली में सैरनी नदी किनारे बसे गांवों की अनदेखी खुशनुमा तस्वीर

करौली में धौलपुर बॉर्डर के आसपास (डांग क्षेत्र) के गांवाें में पहले पीने का पानी तक नहीं था। आजीविका का साधन न था तो लोग बागी बनकर हथियार उठा लेते थे। या मजदूर बन सिलिकोसिस से फेफड़े गलाने वाला खनन करने पर मजबूर होते थे। फिर 10 साल पहले लोगों ने तस्वीर बदलने की ठानी। महाराजपुरा के 47 वर्षीय रणवीर सिंह गुर्जर बताते हैं, अलवर में भी अवैध खनन से जिंदगियां बर्बाद हुई थीं। हमने सुना कि रमन मैग्सेसे अवाॅर्ड विजेता राजेंद्र सिंह (वाटरमैन) ने पानी बचाने के काम किए तो वहां वर्षों से रीते पड़े कुएं-बावड़ियां चल पड़े। हमने उनसे संपर्क साधा। वह आए, महीनों तक हमारे साथ सैरनी नदी के हालात देखे, जो बरसात में तो खूब चलती लेकिन पथरीली भूमि पर मानसून बाद कहीं पानी नहीं ठहरता। फिर 2011-12 में सबसे पहले महाराजपुरा के पास धानी का तालाब बनाया।

गांव के सौ परिवारों ने पहले 2500-2500 और फिर 3500-3500 रुपए चंदा दिया। दो हिस्से राजेंद्र सिंह के तरुण भारत संघ ने लाकर लगाए। इसके बाद 3-4 साल में भूड़खेड़ा में कांछरे का तालाब, मासलपुर के खेड़ा की पहाड़ियों से निकलने वाली नदी की मुख्यधारा के आगे कांजरी का तालाब बनाया। यहां पूरे साल पानी रुकने लगा तो पहले इंजन से सिंचाई शुरू हुई। फिर तो हर गांव में अलख जागी। सबकी भागीदारी के लिए नदी किनारे बसे 36 गांवों के 75 लोगों की ‘सैरनी नदी संसद’ बनाई। यह नदी व गांवों में जल प्रबंधन, विवाद व भविष्य की रूपरेखा तय करती है। हर गांव में बनी 7-8 लोगों की समिति लोकल प्रबंधन देख रही है।

जवानी खनन में खपाई, 50-60 की उम्र तक हर गांव में कई जिंदगियां सिलिकोसिस की भेंट चढ़ी

  1. 52 साल के मुंशी सिंह ने परिवार का पेट पालने के लिए 30 साल तक खनन किया। बोले- 1990 के आसपास पानी सूखने लगा था तो करते भी क्या? फिर पत्थर तोड़ते-तोड़ते फेफड़ों ने जवाब दे दिया। खाट पकड़ ली, सांस लेना दूभर हो गया। अब पानी लौटा है तो परिवार खेती में जुटा है और इलाज ले रहा हूं।
  2. सीता तो 35 साल की उम्र में ही पति रोशनलाल को खो बैठी, जो 10 साल की उम्र से ही खनन में लग गए थे। गनीमत है कि अब 4 बच्चों का गुजारा करने के लिए अब खेती का सहारा मिल गया है।
  3. 50 साल के रमेश का परिवार आसपास के लोगों की जमीन साझे में लेकर काम कर रहा है। रमेश बोले- पानी नहीं था तब खनन के कारण सिलिकोसिस से फेफड़े गल गए। बीमारी में जमीन बिक गई। अब पानी आया तो खेती लायक जमीन नहीं बची। मासलपुर तहसील के 50 लोग ऐसे ही चल बसे।
  • करौली में पानी को लेकर जो काम हुए, उससे लोगों का जीवन और प्रकृति का चेहरा बदला है। 10-12 साल पहले यहां आए तब धरती का चेहरा डरावना था। बिन हरियाली पठारी एरिया में हर ओर हताशा, लोगों में बीमारी और डर का माहौल था। आज लोगों का लोगों के लिए और लोगों द्वारा किया गया नया जीवन है। - राजेंद्र सिंह, तरुण भारत संघ

पहले: खुद पलायन को मजबूर थे अब 1 लाख देकर मजदूर लाए
पहाड़ी-पथरीले एरिया में कभी केवल बरसात के दिनों में बाजरे की फसल हो पाती थी। जैसे ही मानसून के बाद चारा खत्म होने लगता, गांवों के लोग दीपावली के बाद अपने पशुओं के साथ मध्यप्रदेश तक चंबल किनारे-किनारे, तो कुछ यूपी में गंगा-जमुना के आसपास चले जाते। कुछ दूसरे विकल्प की ओर बढ़ते और क्षेत्र में वैध-अवैध माइनिंग में लग जाते।

कोरीपुरा के 125 परिवारों के युवा पहले खानों में मजदूरी करते, खाने के लिए भी गेहूँ दूसरे गांवों से लाते थे। लेकिन इस बार गेहूँ-सरसों की बंपर पैदावार हुई है। कटाई के लिए करौली-गंगापुर शहर तक के मजदूरों को ट्रैक्टर में लाए, प्रतिदिन एक लाख रुपए तक मजदूरी दी। अब इन गांवों से कई ट्रक गेहूँ व सरसों बाजार में बिकने जाती है। क्योंकि पूरे साल पानी रहने लगा है और हर गांव में औसतन 500-700 बीघा जमीन पर हरियाली-खुशियां लौट आई है।

बदलाव की जीती-जागती कहानियां: अब मजबूरी नहीं...खुशहाली

पप्पू: 28 साल की उम्र में बंदूक उठाई थी, अब खेती की बचत से बन रहा घर
पप्पू: 28 साल की उम्र में बंदूक उठाई थी, अब खेती की बचत से बन रहा घर

करौली के भूड़खेड़ा गांव के पप्पू गुर्जर 45 साल के हैं। 28-30 साल के थे तब काम-धंधा नहीं था तो हथियार उठा लिए। बड़े भाई औतारी भी डकैत बन गए थे। अब जिंदगी की राह बदलकर दोनों 3 साल से खेती कर रहे हैं। बोले- जो किया, उसके लिए 3 साल जेल भुगत चुका। गांव में पानी आया तो लौट आया। अब दिनभर खेती करता, रात को चैन की नींद सोता हूं। खेती के बूते ही घर भी बना रहा हूं।

राजवीर: गांव में पानी आया, खबर सुन सरेंडर किया, बंदूक छोड़ हल उठाया
राजवीर: गांव में पानी आया, खबर सुन सरेंडर किया, बंदूक छोड़ हल उठाया

कभी धौलपुर से आकर रुग्गापुरा में बसे राजवीर ने भी बंदूक छोड़ कर हल-फावड़ा उठाया है। 2004 में सरेंडर कर साढ़े सात माह जेल में रहे। अब साल में 2 फसल लेते हैं। बोले- कभी पानी के भी लाले थे तो जो सूझा वही किया। पहले केवल बाजरा होता था, जिससे गुजारा मुश्किल था। अब कुएं-बोरवेल भी चल निकले हैं। मई-जून में भी खेतों में पशुओं का चारा उगा लेते हैं।