सोमवती अमावस्या:सोमवती अमावस्या 30 को, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व

करौलीएक महीने पहले
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  • सोमवार का दिन शिव-पार्वती की आराधना को समर्पित

30 मई को साल की आखिरी सोमवती अमावस्या होगी। इसी दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्रार्थना के साथ वट सावित्री पूजन करेंगी। शनि जयंती भी इसी दिन मनाई जाएगी। अनेक श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करने जाएंगे, जबकि दान-पुण्य का सिलसिला भी सुबह से शाम तक चलता रहेगा। राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जती ने बताया कि इस दिन बहुत से लोग पितरों के निमित्त तर्पण भी करेंगे। संयोगवश इस दिन सुबह 6.39 से रात 12.30 तक सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। भगवान शिव व शनिदेव के मंदिरों में पूजा आराधना के लिए खासी भीड़ रहेगी। इसके पूर्व सोमवती अमावस्या 31 जनवरी को थी।

उन्होंने बताया कि सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। यह व्रत करवाचौथ के समान ही फलदायी माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय जीवन की कामना के लिए उपवास रखती हैं। इसलिए सोमवती अमावस्या का हिंदू धर्म में एक बहुत ही खास महत्व होता है। इस बार 30 मई को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की सोमवती अमावस्या कृतिका नक्षत्र में शुरू होकर रोहिणी नक्षत्र तक रहेगी। यह साल की दूसरी और आखिरी सोमवती अमावस्या है। अमावस्या तिथि 29 मई रविवार को दोपहर 2.56 बजे शुरू होकर अगले दिन सोमवार को शाम 5.05 बजे तक रहेगी। सोमवार का दिन शिव-पार्वती की आराधना को समर्पित रहता है। वहीं अमावस्या तिथि पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान व श्राद्ध आदि कर्म के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला सभी दुखों से मुक्त होता है राज्याचार्य पंडित प्रकाश चंद जती ने बताया कि वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक उत्तर भारत में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में इन्हीं तिथियों मं। वट सावित्री व्रत दक्षिण भारत में मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत को उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा समेत कई जगहों पर मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जितनी उम्र बरगद के पेड़ की होती है, सुहागिनें भी बरगद के पेड़ की उम्र के बराबर अपने पति की उम्र मांगती हैं। हिंदू धर्म में बरगद का वृक्ष पूजनीय माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा इस दिन जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें। महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होता है। बरगद के पेड़ ने सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि सावित्री ने अपने पति के जीवन के लिए बरगद के पेड़ के नीचे निर्जल व्रत रखकर तपस्या की थी और वट के वृक्ष ने सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा,ताकि जंगली जानवर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सकें। इसलिए तभी से इसे वट सावित्री व्रत कहा जाने लगा। इस दिन वट वृक्ष को जल से सींचकर उसमें हल्दी कुमकुम लगाकर कच्चा सूत लपेटते हुए उसकी 11, 21, 108 बार परिक्रमा की जाती है। साथ ही 11, 21 और 108 की संख्या में ही वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं। उन्होंने बताया कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों पर शिव का वास होता है।

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