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  • Seeing The Horticulture Of Bananas In Kerala, Brought 2 Saplings, Produced 500 Plants From Them In 5 Years, Annual Income Increased From 15 Thousand To 2 Lakh

नवाचार के लिए पुरस्कार:केरल में केलों की बागवानी देखकर 2 पौधे ले आया, 5 साल में इनसे 500 पौधे तैयार किए, सालाना आय 15हजार से बढ़कर 2 लाख

करौली2 महीने पहले
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पौधों की जड़ों से ऊपर तने के पास निकलती है सकत। - Dainik Bhaskar
पौधों की जड़ों से ऊपर तने के पास निकलती है सकत।
  • कोंडरी गांव के किसान रामधन का नवाचार, बागवानी के लिए जिला स्तर पर पुरस्कार के लिए चयन, 25 हजार रु. देंगे

विवेक चतुर्वेदी | करौली कोंडरी गांव के किसान मुन्नीलाल को बागवानी में नवाचार के लिए जिला स्तर पर पुरस्कार मिलेगा। केलों की बागवानी से इन्होंने अपनी सालाना आय 12 से 15 हजार रुपए से बढ़ाकर दो लाख रुपए तक कर ली है। रामधन बताते हैं कि साल 2018 में रामेश्वरम की यात्रा से लौट रहे थे। रास्ते में वहां केलों के बाग देखकर इन्हें अपने खेत पर बोने की इच्छा हुई तो रामधन 2 पौधे ले आए। इनकी पौध काटकर वे नए पौधे लगाते गए। पांच साल में ही 450 से 500 पौधे तैयार हो गए हैं। आत्मा परियोजना निदेशक वी.डी. शर्मा के अनुसार बागवानी मिशन में केला उत्पादकों के लिए कोई सब्सिडी नहीं दी जाती। लेकिन मुन्नीलाल के नवाचार को देखते हुए उनका चयन जिला स्तरीय पुरस्कार के लिए किया गया है। उन्हें पर 25 हजार का पुरस्कार मिलेगा।

बागवानी मिशन में केला उत्पादकों को सब्सिडी नहीं मिलती

किसान रामधन का कहना है पहले वे गेहूं, बाजरा और ज्वार की पैदावार करते थे। एक बीघा जमीन में परंपरागत खेती में गेहूं की 8 क्विं. और सरसों-बाजरे की 2-2 क्विं. उपज होती थी। इसमें करीब 3 से 4 हजार की लागत लगती थी और 12 से 15 हजार रुपए की आमदनी होती थी, लेकिन जब से केले का बाग लगाया है, आमदनी बढ़कर 2 लाख रुपए हो गई है। रामधन ने बताया कि उनके बाग में लगे 450 पौधों से फिलहाल करीब 12 हजार किलो केले का उत्पादन हो रहा है। अभी वे गांव में ही केले बेच रहे हैं और सालभर में 20 रु. प्रतिकिलो के हिसाब से उन्हें 2 लाख 40 हजार की आमदनी हो रही है। खेत में 5 गुणा 5 के गड्ढे खोदकर इनमें 11 हजार रु. में एक ट्रॉली खाद डाला गया। इसके बाद अब 5 साल हो चुके हैं। ना तो निराई-गुडाई की है और ना ही खाद डाली है। बस सिंचाई लगातार कर रहे हैं।

गांठ काटकर नए पौधे तैयार करते हैं

किसान रामधन के मुताबिक परंपरागत खेती में ज्यादा खाद, सिंचाई, निराई-गुड़ाई की जरूरत होती है। देखभाल भी ज्यादा करनी पड़ती है। इसके बावजूद मुनाफा काफी कम होता है। जबकि केले की खेती में ज्यादा निराई-गुड़ाई या खाद देने की जरूरत नहीं होती। देखभाल भी बहुत ज्यादा नहीं करनी पड़ती। सिर्फ सिंचाई होनी चाहिए। वो भी इतनी कि खेत में जलभराव ना हो। केले की खेती करने से उनकी आमदनी में बढ़ोतरी हुई है।

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