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धान के लिए भूजल का दोहन:गणेशपुरा के 2000 बीघा में ही 400 बोरिंग, क्योंकि सरकार किसानों को नहीं देती नहरों से पानी

बूंदीएक महीने पहलेलेखक: दिनेश शर्मा
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गणेशपुरा गांव में बोरिंग की चल रही खुदाई। इलाका क्रिटिकल जोन में शुमार है। (फोटो-कौशल सैनी) - Dainik Bhaskar
गणेशपुरा गांव में बोरिंग की चल रही खुदाई। इलाका क्रिटिकल जोन में शुमार है। (फोटो-कौशल सैनी)
  • 1991-92 से ही बंद है नहरों का पानी, किसानों की पीड़ा- चंबल में छोड़ देते हैं अतिरिक्त पानी

जिले में धान की फसलवाले इलाके में बोरिंग खुदवाने की होड़ मची हुई है। किसानों का कहना है कि यदि सरकार बांधों से ओवरफ्लो पानी चंबल में छोड़ने की बजाए नहरों में दे दे तो फायदा हो। बोरिंग खुदवाने पर एक से सवा लाख रुपए का खर्च पड़ता है। इसके अलावा एक बीघा धान की फसल में पानी देने पर पांच हजार रुपए का डीजल खर्च पड़ता है। बिजली बिल अलग है।

धान के लिए सरकार नहरी पानी मिलने देने लगे तो किसान बोरिंग नहीं कराएंगे, इससे भूजल का दोहन भी रुकेगा। वर्ष-1991-92 से ही धान के लिए नहरों से पानी छोड़ना बंद है। डार्क जोन हिंडौली, नैनवां ब्लॉक में नहरें न के बराबर हैं। ऐसे में वहां पानी की कमी के कारण बोरिंगों की जरूरत समझी जा सकती है, मगर सेफ और क्रिटिकल जोन में भी बोरिंगों की भरमार होने लगी है। क्रिटिकल जोन बूंदी ब्लॉक में भी बोरिंगों की तादाद बढ़ने लगी है।

बूंदी ब्लॉक के गणपतपुरा, माटुंदा, जावटीकलां व खुर्द, गणेशपुरा, गोवर्धनपुरा, आंेकारपुरा, झरबालापुरा, नंदपुरा सहित नहरी इलाके की ही बात करें तो औसतन 5 बीघा में एक बोरिंग है। अकेले गणेशपुरा के 2000 बीघा पर 400 बोरिंग हो चुके हैं। यह एक गांव की स्थिति है। बाकी गांवों में भी यही हालात हैं। भूजल का दोहन तेजी से बढ़ रहा है। नहरी पानी गेहूं की फसल के लिए ही छोड़ा जाता है।

हालात...पहले 200 फीट पर पानी मिल जाता था, अब 800 फीट पर मिल रहा

गणेशपुरा के एक किसान ने 40 बीघा में धान की फसल करने के लिए 7 बोरिंग खुदवा रखे हैं। किसान मांगीलाल मीणा बताते हैं कि सन 1987 में गांव में महज तीन बोरिंग थे, तब जमीन में 200 फीट पर फुल पानी मिल जाता था। बरसात भी पहले ज्यादा होती थी और नहरें भी 12 महीने में 10 महीने चलती थी।

वर्ष 1991-92 के बाद नहरों से धान की फसल को पानी देना बंद कर दिया गया। कभी-कभार बहुत जरूरत या किसान आंदोलन पर सोयाबीन के लिए नहर से एकाध बार पानी दे दिया जाता है। ऐसे में बारिश कम होने या नहीं होने पर किसान फसलों को बचाने के लिए बोरिंग खुदवाते हैं। स्थिति यह है कि 1000-1500 बीघा जमीन में 200 से अधिक बोरिंग हो चुके हैं। जहां पहले 200 फीट खुदाई पर पानी आ जाता था, अब 600 से 800 फीट खुदाई पर पानी आ रहा है।

किसान भी मजबूर- धान में लगता है ज्यादा पानी, इसलिए अधिक खुदवाते हैं बोरिंग

किसान मजबूर हो गए हैं, क्योंकि जमीन ऐसी हो गई है जिसमें सोयाबीन, मक्का, उड़द भी नहीं होते। सीपेज होने से ये फसलें नष्ट हो जाती हैं। ऐसे में अब किसान इन फसलों की बजाए ज्यादा पानी खपतवाले धान की बुआई पर ज्यादा जोर दे रहे हैं और बोरिंगों के सहारे धान पैदा करने लगे हैं। बोरिंग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि पहले लाइट भी अच्छी मिलती थी।

अब 6 घंटे ही लाइट मिलती है, इसलिए किसान ज्यादा बोरिंग लगाने लगे हैं। किसान श्योजीलाल मीणा बताते हैं कि गांव में पहला बोरिंग 150 से 160 फीट पर था। अब 600 से 700 नीचे पानी निकल रहा है। गांव के ही सोनूकुमार और गोलूकुमार बताते हैं कि 40 बीघा में 7 बोरिंग लगे हैं। इनसे ही धान को बचाया जाता है अभी 75 बीघा में धान की रोपाई के लिए 15 बोरिंगों से खेतों को पानी से भरा है।

नहरों की कैपेसिटी कम, टूटने का खतरा

जो प्रोजेक्ट जिस प्रोविजन के लिए बनाए जाते हैं, उसी के लिए पानी दिया जाता है। डैम रबी की फसल को पानी देने के लिए ही बने हैं, इसलिए धान की फसल के लिए पानी नहीं दिया जा सकता। दूसरी वजह यह कि नहरों की कैपेसिटी इतनी नहीं कि बैराज का ओवरफ्लो पानी झेल सके। नहरें टूटने का खतरा रहता है।

कोटा बैराज का एक गेट खोलने पर 39 हजार क्यूसेक पानी एक साथ रिलीज होता है, जबकि दाईं और बाईं नहर की कुल कैपेसिटी ही 8100 क्यूसेक है। साथ ही डैम से जो अतिरिक्त पानी चंबल में छोड़ा जाता है, उससे बिजली भी बनती है।
-एडी अंसारी, एसई, राणाप्रताप सागर व जवाहर सागर डैम कोटा

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