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700 साल पुरानी परंपरा:50 किलो वजनी देशी फुटबॉल से आज खेलेंगे मैच, इसमें रोमांच वर्ल्डकप जैसा

नमाना2 दिन पहलेलेखक: शिवराज
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नमाना (बूंदी) | बरूंधन गांव में तैयार 50 किलो का दड़ा। संक्रांति पर इस खेल की परंपरा 700 साल से कायम है।
  • हाड़ा वंशजों के गांव बरूंधन में होता है यह अनूठा खेल, खिलाड़ी होंगे कई गांवों के लोग

बूंदी जिले में बरूंधन ऐसा गांव है, जहां मकर सक्रांति पर पतंगबाजी का नहीं, एक अनूठे खेल का क्रेज है। गांव में अनूठा फुटबॉल मैच होगा। इसमें फुटबॉल (दड़ा) का वजन ही 50 किलो से ज्यादा होगा। हर साल फुटबॉल का वजन बढ़ता है। यह शायद विश्व का सबसे भारी फुटबॉल होगा, जिससे लोग खेलते हैं। यह परंपरा 700 साल से चली आ रही है। इसमें खिलाड़ी पूरा गांव होता है। इसमें खास नियम नहीं होते, पर दर्शकों और खिलाड़ियों में जोश वर्ल्ड कप फुटबॉल मैच से कम नहीं होता।

हाड़ा वंशजों के गांव बरूंधन में 700 साल से अधिक पुरानी परंपरा दड़ा महोत्सव इस बार भी होगा। भगवान लक्ष्मीनारायण मंदिर के आंगन को साक्षी मानते हुए सैकड़ों खिलाड़ी, पसीने से लथपथ, गुत्थम-गुत्था होकर 50 किलो से ज्यादा वजनी दड़े (फुटबाॅल) को धकेलने पर भिड़ जाते हैं। हर साल दड़े का वजन बढ़ाया जाता है।

एक पारी में हाड़ा वंशज व मोहल्ले के लोग और दूसरी पारी में आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों के प्रमुख लोग शामिल होते हैं। इस बार दोपहर 12 बजे खेल शुरू होगा। परंपरा के अनुसार कस्बे के एकमात्र हाड़ा परिवार के श्यामसिंह हाड़ा दड़े की विधिवत पूजा-अर्चना कर अन्य रस्में अदा करेंगे। इसके बाद मैच शुरू होगा। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता जाता है, दर्शकों और खिलाड़ियों का भी जोश भी बढ़ता जाता है। धक्कम-धक्का-खींचतान बढ़ने लगती है।
जानिए; फुटबाॅल (दड़ा) का वजन हर साल ऐसे बढ़ता है
दड़े (फुटबाॅल) के अंदर पत्थरनुमा ठोकरया भैरूजी की मूर्ति है। ठोकरया भैरूजी का यह पत्थर 700 साल पहले का बताया जाता है। जबसे यह दड़ा महोत्सव शुरू हुआ, इसे ठोकरया भैरूजी इसलिए कहा जाता है कि दड़ा ठोकरें मारकर खेला जाता है। अंदर ठोकरया भैरूजी की प्रतिमा और उसके ऊपर टाट और रस्सियों से दड़ा बुना जाता है। हर साल दड़े के ऊपर ही नई टाट और रस्सियां गूंथ दी जाती हैं, पर पुरानी नहीं हटाई जाती। इस तरह होते-होते इसका वजह 50 किलो के करीब हो चुका है।

‘दड़ा महोत्सव’ परंपरा के पीछे यह है कहानी
दड़ा (फुटबाॅल) का खेल रियासतकाल में राजा राव हम्मीर सिंह के समय 1375 ई. से शुरू हुआ था। यह ऐसा खेल है, जिसे आधुनिक फुटबॉल का जनक कहा जा सकता है। हर वर्ष मकर संक्रांति पर ‘दड़ा महोत्सव’ पर यह खेला जाता है। इसका आयोजन पूरे भारत में सिर्फ आंवा या बरूंधन गांव में होता है। इस खेल में 25-30 किलो की गेंद बनाई जाती है, जिसे ‘दड़ा’ नाम दिया गया। इस खेल को करीब 100 व्यक्ति एक साथ खेल सकते हैं। इस खेल में 2 टीमें होती है, जिसमें 12 गांव अलग-अलग टीम में बंटते हैं।

एक टीम लक्ष्मीनाथ की और एक टीम अंदरगणेश जी की होती है। इस खेल को देखने के लिए भारी संख्या में भीड़ एकत्रित होती है। छतों पर औरतों की भीड़ लग जाती है। महिलाएं पुरुषों को गीतों के माध्यम से फब्तियां कसती है, जिससे पुरुषों में जोश आ जाता है। खेल को लोग इतने दमखम के साथ खेलते हैं कि उनके कपड़े-जूतों का भी पता भी नहीं रहता। खेल के अंत में दड़ा जिस ओर जाता है, उसका ये संकेत होता है कि गांव में इस वर्ष भर में अकाल होगा या सुकाल।

खास बात: न फिक्स नाप का गोल पोस्ट, न कोई गोल कीपर
दड़े का खेल रियासतकाल से शुरू हुआ था, तब से यह परंपरा लगातार चली आ रही है। बरूंधन में निवास करने वाले 60 परिवारों में से एकमात्र हाड़ा वंशज के श्यामसिंह हाड़ा इस खेल को जीवित रखे हुए हैं। इस खेल की खास बात यह है कि इसमें न तो कोई फिक्स नाप का गोल पोस्ट होता है और न फुटबॉल खेल की तरह कोई गोल कीपर एवं रेफरी होता है। फिर भी इसमें भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होती।

खेल के दौरान कोई खिलाड़ी गिर जाता है तो खेल रोककर उसे उठाया जाता है, फिर से खेल शुरू किया जाता है। खेल से पहले खिलाड़ी मूंछों पर ताव लगाकर प्रदर्शन करते हैं। इस खेल में कोई नियम नहीं, बस दोनों टीम दड़े को एक-दूसरे की तरफ पैरों से धकेलने का प्रयास करती रहती है। इस दौरान छतें दर्शकों से भर जाती हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में छतों पर मौजूद महिलाएं खिलाड़ियों का जोश बढ़ाती हैं।

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