भास्कर पड़ताल:दहन पर कोरोना का ग्रहण; रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण ने बचाए एक करोड़

बूंदीएक वर्ष पहले
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  • जिला मुख्यालय पर रामलीला मंचन से लेकर रावण दहन तक खर्च हो जाते थे 10-12 लाख रुपए, विकास पर हो सकते हैं खर्च

कोरोना के चलते जिलेभर में रावण, मेघनाद, कुंभकरण के पुतलों पर खर्च होने वाली करीब 1 करोड़ रुपए की राशि बच गई। जिले में रामलीला मंचन से लेकर रावण दहन तक पर करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो जाते थे। अकेले जिला मुख्यालय पर ही दशहरा पर्व पर 10 से 12 लाख रुपए का खर्च आता था। इस बार कोरोना के कारण दशहरे के सभी कार्यक्रम निरस्त हो गए। हालांकि इससे बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व विजयादशमी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। आमजन में वही उल्लास रहा। नवमी व दशमी एक ही दिन होने के कारण घरों में कुल देवी की आराधना के साथ विजयादशमी पर किया जाने वाला शस्त्र पूजन हुआ।सालभर में एक बार शारदीय नवरात्र पर दसवें दिन विजयादशमी का पर्व मनाने के साथ रावण परिवार के पुतलों का दहन होता है। नगर निकाय, पंचायतें अपने-अपने स्तर पर इस आयोजन करती है। यहां तक कि छोटे-छोटे गांवों में भी रावण दहन दहन होता है। इस पर लाखों रुपए खर्च हो जाता है। ऊंचे-ऊंचे पुतले कुछ सैंकड़ों में ही जलकर खाक हो जाते हैं। इस बार इस आयोजन पर खर्च होने वाली राशि बच गई।

एक पहलू यह भी... रोजगार से धोना पड़ा हाथ: कोटा के दशहरे की तरह यहां मेला तो नहीं लगता, लेकिन दहन स्थल पर थड़ी, ठेले व छोटी-मोटी स्टॉले अवश्य लगती है। इनमें बच्चों के खिलौने, मिट्‌टी के आइटम, चाट-पकौड़ी, बैलून, चाय-कॉपी, मूंगफली, गजक आदि की करीब 100-150 थड़ी, ठेले लग जाते थे। रावण दहन को देखने के लिए 5-7 हजार लोगों की भीड़ दहन स्थल पर मौजूद रहती थी। दुकानदारों को करीब डेढ़ से दो लाख की आमदनी हो जाती थी, जो इस बार नहीं हो पाई।

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