परंपरा - पटाखा युद्ध:नैनवां में ढाई घंटे चला पटाखा युद्ध, युवक जख्मी

बूंदी21 दिन पहले
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नैनवां. शहर में पटाखा युद्ध के दौरान मोर्चा संभालते योद्धा। - Dainik Bhaskar
नैनवां. शहर में पटाखा युद्ध के दौरान मोर्चा संभालते योद्धा।
  • रात 8 से 10 बजे तक पूरे परवान पर रहा पटाखा युद्ध, फिर पुलिस ने आकर कराया बंद

नैनवां शहर में शुक्रवार को बैलों की दीपावली की रात 40 वर्षों से चली आ रही पटाखा युद्ध की परंपरा इस बार भी जारी रही। रात को ढाई घंटे चले पटाखा युद्ध के दौरान एक युवक जख्मी हो गया। जिसने अपने स्तर पर अपना उपचार करवाया।उल्लेखनीय है कि नैनवां में पटाखा युद्ध का आगाज 1980 से हुआ है, जो अब तक चला आ रहा है। विशेष बात यह है कि इसकी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जाती है।

दीपावली के दूसरे दिन शाम को 7.30 बजे युवकों की टोलियों ने मैन बाजार में झंडे की गली के दोनों रास्तों, प्याऊ वाली गली, शीतला गली, मालदेव चौक व गढ़चौक में हाथों में पटाखे लेकर मोर्चाबंदी करना शुरू कर दिया और एक दूसरे के ऊपर पटाखे जलाकर फेंकना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे पटाखा युद्ध गति पकड़ने लगा और रात 8 से 10 बजे तक पूरे परवान पर रहा। पटाखा युद्ध शुरू होते ही बाजार में दुकानें बंद हो गई। पूरे बाजार में बारूद की गंध व धुआं फैल गया। पटाखा युद्ध में जलने की परवाह किए बगैर युवकों ने उत्साह के साथ अपनी भागीदारी निभाई। रात 10 बजे पुलिस ने आकर समझाइश से पटाखा युद्ध को बंद करवा दिया। पटाखा युद्ध के कारण लोग बाजार में आ जा नहीं सके।

यह थी शुरुआती परंपरा 40 वर्ष पूर्व किसान खेती में कृषि उपकरणों की जगह फसलों की बुवाई में बैलों का उपयोग करते थे। किसान दीपावली के दूसरे दिन बैलों की दीपावली मनाते थे। शाम को अपने-अपने घरों पर बैलों की पूजा करवाकर चारभुजा मंदिर पर बैलों को धुकाने लाते थे। तब बैलों पर लोग पटाखे चलाकर फेंकते थे। जिससे बैल चमकते थे और ग्रामीण इसका लुत्फ उठाते थे, लेकिन खेती में कृषि उपकरणों के विकास के कारण बैलों का उपयोग खत्म होने से यह परंपरा लुप्तप्रायः हो गई है।

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