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मोक्ष का सफर:पोते ने दादा की अस्थियां चूमीं; बेटी का चेहरा आंसुओं से भीगा, 68 दिन बाद कलशयात्रा हरिद्वार के लिए रवाना

बूंदी9 महीने पहले
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पोता अपने दादाजी की अस्थियों को चूमता हुआ। - Dainik Bhaskar
पोता अपने दादाजी की अस्थियों को चूमता हुआ।
  • हरिद्वार के लिए बसें बंद होने के कारण मृत परिजनों के अस्थिकलश पेड़ों पर, घरों में खूंटियों पर टांगकर, पेड़ के नीचे गाड़कर रखने पड़े
  • अस्थि विसर्जन जरूरी: पं. शिवप्रकाश दाधीच खीण्या बताते हैं कि सनातन धर्म में मान्यता है कि अस्थि विसर्जन से मोक्ष प्राप्ति होती है

ये बेहद भावुक कर देने वाले पल थे, जब 68 दिन बाद गुरुवार को मोक्ष कलशयात्रा बस 16 अस्थिकलश लेकर हरिद्वार के सफर पर रवाना हुई। अपने मृत परिजनों की अंतिम निशानी अब नहीं बची थी। किसी के पिता, किसी के दादा तो किसी की मां की अस्थियां उन कलशों में थीं। पोता अपने दादाजी की अस्थियों को चूम रहा था। बेटी का चेहरा मां की अस्थियों को हरिद्वार रवाना करते वक्त आंसुओं से भीगा था...। लॉकडाउन ने दिवंगत लोगों की आत्मा की शांति के लिए अस्थि विसर्जन-पिंडदान जैसे मृत्यु संस्कारों पर भी विराम लगा दिया। हरिद्वार के लिए बसें बंद होने के कारण मृत परिजनों के अस्थिकलश पेड़ों पर, घरों में खूंटियों पर टांगकर, पेड़ के नीचे गाड़कर रखने पड़े। बस स्टैंड पर विधिवत पूजा-अर्चना के साथ 16 अस्थिकलशों को परिजनों के साथ हरिद्वार रवाना किया गया।

राज्य सरकार ने हरिद्वार के लिए निशुल्क बस सेवा दिलाई। महात्मा गांधी जीवन दर्शन समिति के संयोजक-रोटरी क्लब के मोक्ष कलशयात्रा के प्रोजेक्ट डायरेक्टर राजकुमार माथुर ने पूजा-अर्चना की। रोटरी क्लब अध्यक्ष लक्ष्मीचंद्र गुप्ता द्वारा सभी परिजनों, बस ड्राइवर को माला पहनाकर खाने के पैकेट्स, पानी की बोतलें, मिठाई, बिस्कुट, नमकीन, मास्क दिए। रोटरी क्लब के सहायक प्रांतपाल सुमित गांधी, सचिव नरेश जिंदल, केसी वर्मा, चंद्रप्रकाश सेठी, ऋतुराज दाधीच, घनश्याम जोशी, लोकेश ठाकुर, हासमभाई, राकेश सुवालका, पवन अग्रवाल, सुरेश दाखेड़ा, ओम तंबोली, महावीर जैन, जितेंद्र छाबड़ा मौजूद रहे। रोटरी मुक्तिधाम के लॉकर और परिजनों के पास दिवंगत लोगों के अस्थिकलश काफी समय से रखे हुए थे, जिन्हें हरिद्वार भिजवाने में राज्य सरकार की योजना के अनुसार रोटरी क्लब और महात्मा गांधी जीवन दर्शन समिति ने सहयोग किया। 

अंबेडकर कॉलोनी के बंटी शर्मा 19 अप्रैल को दिवंगत हुए अपने पिता रूपनारायण शर्मा की अस्थियां लेकर बस से रवाना हुए। लॉकडाउन में अस्थिकलश रोटरी क्लब के श्मशानघाट के लॉकर में रखा था। 2 दिन पहले पता लगा कि हरिद्वार बस सेवा के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है। रजिस्ट्रेशन के बाद फोन आने पर सुबह रोटरी क्लब से अस्थियां लेकर आए। बंटी कहते हैं हर वक्त चिंता रहती थी कि कहीं कोई चुरा ना ले जाए। हम दोनों भाई रोज अस्थियों को संभालने जाते थे। अस्थि विसर्जन पर पिताजी को मोक्ष मिल पाएगा।   शिवपुरा के शंभु शर्मा के पिता 12 मार्च को ही दिवंगत हो गए थे, पर हरिद्वार जानेवाले रास्ते पर कोरोना संक्रमण फैला हुआ थो। ऐसे में परिवार ने 12 दिन बाद ही अस्थिविसर्जन तय किया। अस्थियां घर में खूंटी पर रखी थी। 24 मार्च को हरिद्वार जाना तय था कि लॉकडाउन हो गया। 75 दिनों से पिताजी की अस्थियां घर थी। हमें लगता था कि वे हमारे बीच में ही कहीं हैं। अब अस्थियां लेकर घर से विदा हुए तो लगा जैसे पिताजी नहीं रहे। पूरा परिवार गांव से बाहर तक छोड़ने आया। ऐबरा गांव से आए संपत शर्मा ने बताया कि 28 अप्रैल को दादाजी दिवंगत हो गए थे। गांव में भी अस्थियों को सुरक्षित रखने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं थी। ऐसे में घर में ही खूंटी पर अस्थियां टांग रखी हुई थीं। परिजन अस्थियों को देख-देखकर रोते रहते थे। दादाजी मुझे बहुत लाड़ करते थे। मन उदास है, पर राहत है कि अब दादाजी की आत्मा को मोक्ष मिलेगी। 

मान्यता : अस्थि विसर्जन जरूरी: पं. शिवप्रकाश दाधीच खीण्या बताते हैं कि सनातन धर्म में मान्यता है कि अस्थि विसर्जन से मोक्ष प्राप्ति होती है। पुराणों में मानव शरीर की महत्व नाम मात्र का बताया गया है। यदि कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है आत्मा। इंसान की मृत्यु के बाद ऐसा ही एक कर्मकांड अस्थियों के विसर्जन करने का है। मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थियों को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। अंतिम संस्कार का सबसे आखिरी पड़ाव है अस्थि विसर्जन। 
वैज्ञानिक आधार: इंसान की अस्थियों एवं नदी को वैज्ञानिक रूप से भी जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि नदी में प्रवाहित मनुष्य की अस्थियां समय-समय पर अपना आकार बदलती रहती हैं, जो कहीं ना कहीं उस नदी से जुड़े स्थान को उपजाऊ बनाती हैं।

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