अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष:खुश रहने के मायने समझा रही हैं बूंदी की ये बेटियां

बूंदी9 महीने पहले
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  • अपनी प्रतिभा के बलबूते न केवल अपना कॅरियर संवार रही, बल्कि परिवार को भी संबल दे रहीं

कोई परिवार का सहारा है तो कोई लोगों को स्माइल बांट रही हैं। विपरीत हालातों से लड़कर बूंदी की कोई बेटी गोल्ड मेडल जीत रही हैं, तो कोई अपने दम पर अपना कॅरियर संवार रही है...अपने काम और प्रतिभा के बूते ये बेटियां पुरुष प्रधान हमारे समाज को बेटी होने के मायने भी समझा रही हैं। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, ऐसे मौके पर अलग-अलग फील्ड में काम कर रहीं कुछ ऐसी ही महिलाओं, युवतियों की कहानियां, जो खामोशी के साथ बूंदी को ब्यूटीफुल बनाने में जुटी हैं या अपने परिवार का मजबूत पिलर बनी हुई हैं।महिला किसान संतोष शर्मा : इजराइल जाकर सीखा कैसे की जाती है खेतीनैनवां पंचायत समिति की प्रधान रह चुकी मीणों की झोपड़ी, जैतपुर की 64 साल की संतोष शर्मा प्रगतिशील महिला किसान हैं। वे इजराइल का दौरा कर वहां की उन्नत तकनीक से खेती के तौर-तरीके करीब से देख चुकी हैं। आज वे 35 बीघा में बागवानी कर रही हैं। इसमें आंवला, नींबू, अमरूद हैं। इस बार 17 लाख रुपए में ठेका छोड़ा है। पहले थोड़ी बहुत बागवानी ही करती थीं, पर इजराइल से लौटकर उन्होंने बागवानी का विस्तार किया। पूरी नैनवां तहसील में पहली बार ड्रिप सिस्टम उन्होंने ही शुरू किया, तब इलाके के किसान देखने आया करते थे। आसपास के किसानों को भी इजराइल में खेती के तरीके बताए।वे 1995 से 2000 तक नैनवां प्रधान भी रहीं। उन्नत खेती के पुरस्कार भी मिले। उन्हें राज्य सरकार ने प्रगतिशील किसानों के दल में 10 दिन के लिए इजराइल दौरे पर भेजा था। वे बताती हैं कि वहां के किसान खेती को लेकर काफी जिम्मेदार हैं। हमारे यहां किसान खेत में पानी खुला छोड़ देते हैं। रिटायर प्रिंसिपल पति मास्टर सत्यनारायण और वे मिलकर बागवानी करते हैं।

रूपा दोलतानी : लोगों के चेहरों पर लाती हैं मुस्कुराहट

बूंदी की रूपा दोलतानी लोगों को मुस्कुराहट बांटती हैं। कोरोनाकाल में जब परिवारों में झगड़े बढ़ गए, जॉब छिन गए, रिलेशनशिप तक खत्म हो गई, तब सैकड़ों लोगों के चेहरों से गायब हुई मुस्कुराहट रूपा ने वापस लौटाई। रूपा आर्ट ऑफ लिविंग की टीचर हैं, जो ध्यान, योग, प्राणायाम, मेडिटेशन के जरिए लोगों को जीने की कला सिखाती हैं। आज के ऐसे दौर में तनाव से कोई अछूता नहीं, बच्चे और बुजुर्ग तक भारी तनाव में जी रहे हैं। देश में 73% लोग आज स्ट्रेस में जी रहे हैं, वहीं 43% लोग डिप्रेशन का शिकार हैं। ऐसे में रूपा के काम की अहमियत कितनी ज्यादा है, समझी जा सकती है। वे कहती हैं खुशी में हम उछल पड़ते हैं, पर दुख में उतने ही टूट जाते हैं। इसे बैलेंस करना ही आर्ट आफ लिविंग है। स्ट्रेस पार्ट ऑफ लाइफ है, हमें अच्छी से अच्छी एजुकेशन दी गई, कभी किसी ने स्ट्रेस से कैसे निकला जाए, यह नहीं सिखाया। दरअसल, खुश रहने के लिए जिंदगी में कुछ चाहिए ही नहीं होता, न पैसा, पद न पावर या कुछ और। ये हालातों, लोगों पर डिपेंड करती हैं।हम हमेशा भूत और भविष्य में ही उलझे रहते हैं, वर्तमान क्षण में नहीं, जिस मन को लेकर जिंदगीभर चलते रहते हैं, उसी को आखिर तक पहचानते नहीं। पॉजिटिविटी कैसे बनें और कैसे फैलाएं, हम इसे पहचानना सिखाते हैं। रूपा हर संडे लोगों की क्लास लेती हैं,वे 2006 से लोगों को इसी तरह से तनावमुक्त कर स्माइल बांट रही हैं।

माया माहेश्वरी : खुद सिल कर 1000 मास्क बांटे

हिंडौली. कोरोना काल में थूर निवासी माया माहेश्वरी ने मास्क ही बचाव है, थीम पर काम करते हुए महिलाओं को हाथों से सिल कर मास्क बांटे। वे हर रोज घर पर जैसे भी समय मिलता, पुराने कपड़े से मास्क बनाने में जुट जातीं और रोज दो-तीन दर्जन मास्क तैयार कर महिलाओं व अन्य जरूरतमंदों में बांट देती। करीब 1000 मास्क महिलाओं, बच्चों व जरूरतमंदों को उपलब्ध कराए।महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनका सहयोग करते हुए मनोबल बढ़ाने के लिए वे शुरू से ही सक्रिय हैं। महिलाओं को ग्रुप में जोड़ कर उन्हें लोन आदि दिला कर सिलाई मशीनें दिलवाई हैं। मशीन दिलवाने के साथ ही उन्होंने कई महिलाओं को मशीन पर सिलाई सिखाकर आत्मनिर्भर बनाया है। इससे कई महिलाओं को रोजगार मिला।

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