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भास्कर पड़ताल:जिला अस्पताल में दो-दो रैन बसेरे, दोनों पर ताले, मरीजों के तीमारदार पेड़ तले या बेंच पर रात गुजारने को मजबूर

बूंदी11 दिन पहले
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अस्पताल परिसर में नीम के पेड़ के नीचे बैठे मरीजों के परिजन। - Dainik Bhaskar
अस्पताल परिसर में नीम के पेड़ के नीचे बैठे मरीजों के परिजन।
  • दोनों रैन बसेरों में सारी सुविधाएं, आखिर इसको खोला क्यों नहीं जा रहा, परिजनों की परेशानी से किसे सरोकार

जिला अस्पताल परिसर में बने दो रैन बसेरों का ताला खुलता ही नहीं। सर्दी, गर्मी या बरसात में मरीजों के तीमारदारों को लाखों रुपए की बिल्डिंग व अन्य सभी सुविधाएं होने के बाद भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ए ग्रेड वाले जिला अस्पताल के कैंपस में मरीजों के परिजनों को दिन-रात इधर-उधर भटकते हुए समय बिताना पड़ता है। कहने को तो जिला अस्पताल में महिला-पुरुषों को ठहरने के लिए दो रैन बसेरे बने हुए हैं, पर दोनों ही बंद पड़े हैं। रोगियों के साथ आई महिलाएं जनाना अस्पताल के हॉल में फर्श पर लेटी रहती हैं, उनके बीच से होकर लोग आते-जाते रहते हैं।

इधर, दोनों रैन बसेरे बंद होने के कारण उनमें मकड़ियों ने जाले बना लिए हैं तो दूसरी ओर मरीजों के परिजन इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। चोरी का भी खतरा बढ़ रहा है। कई लोगों के साथ अस्पताल परिसर में वारदात हो चुकी है। अगर अस्पताल से बाहर रैन बसेरा ढूंढ़ें तो अस्पताल से डेढ़-दो किमी दूर देवपुरा, लंका गेट से पहले नहीं है।अस्पताल के कर्मचारियों ने बताया कि दोनों ही रैन बसेरे आमजन के कोई काम नहीं आ रहे हैं। इन तीन-चार साल में किसी रोगी के परिजन रैन बसेरे में रुकते नहीं देखा, जबकि अस्पताल के इन रैन बसेरों में बेड, बिस्तर, पंखे, शौचालय सहित तमाम व्यवस्थाएं हैं। बस एक बार साफ-सफाई कर इन्हें चालू ही करना है। इन रैन बसेरों को अलग-अलग संस्थाओं ने गोद भी ले रखा है, जिनको कई बार पत्र भी भिजवाए गए, लेकिन कोई सकारात्मक प्रयास नजर नहीं आए। अस्पताल प्रशासन इनका संचालन नहीं करता। ऐसे में वह भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा।

अस्पताल में भर्ती रोगियों के परिजन रात किसी बेंच पर लेटे नजर आते हैं या कैंटीन में बैठकर टाइम पास करते हैं। जिला अस्पताल में रोज एक हजार के करीब रोगी आते हैं, जिसमें 500 से 600 के बीच आउटडोर रहता है। जनाना अस्पताल की बात करें तो 300 से 400 बच्चे व महिला रोगी आते हैं। दोनों अस्पतालों में जनाना व बच्चा वार्ड, सर्जिकल, मेडिकल व ट्रोमा सहित अन्य वार्डों की बात करें तो 100 से ज्यादा रोगी रोज भर्ती होते हैं। इनके साथ दो से तीन परिजन होते हैं। जनाना अस्पताल में 25 से 30 डिलीवरी हर रोज होती है और आठ से दस बच्चे रोज भर्ती होते हैं। सैकड़ों परिजनों के सामने टाइम गुजारने की परेशानी खड़ी हो जाती है। अस्पताल परिसर में पीएमओ ऑफिस के सामने रैन बसेरे के संचालन की जिम्मेदारी महावीर इंटरनेशनल संस्था ने ले रखी है। उपाध्यक्ष लोकेश सिखवाल का कहना है कि सर्दी के दिनों में ही रैन बसेरे का संचालन करते हैं। अन्य दिनों में इतने लोग नहीं आते, इसी वजह से रैन बसेरे को बंद रखा जाता है। अब अगर रोगियों की संख्या बढ़ रही है तो इसे फिर से साफ-सफाई कराकर चालू करवाया जाएगा।

मरीजों के साथ आए परिजनों की पीड़ा

बूंदी का गोठड़ा के रामस्वरूप ने बताया कि बहू को डिलीवरी के लिए यहां अस्पताल लाए हैं। अस्पताल में एक से ज्यादा अटेंडेंट को रुकने नहीं दिया जाता, ऐसे में नीम तले तिरपाल बिछाकर वक्त काट रहे हैं। यहां चोरी का डर रहता है।खटकड़ की राधाबाई ने बताया कि बेटे को 3 दिन से बुखार है। शनिवार को जिला अस्पताल में भर्ती करवाया। उसके साथ मैं और भाई आए हैं। वार्ड में बेड के पास एक टेबल है, उसी पर लेट कर दो दिन गुजार लिए।

भाई रात को सोने के लिए इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहा, बाद में टेंट की दुकान से किराए के बिस्तर लाकर बाहर नीम के तले सोना पड़ा है।नैनवां के कन्हैयालाल का कहना है कि जब रैन बसेरे बने हुए हैं, उसमें बेड भी लगे हुए हैं, लेकिन ताला ही नहीं खुलता। 2 दिन पहले बेटी को लेकर डिलीवरी कराने के लिए यहां आए थे। जनाना अस्पताल में रात को अंदर वार्डों में नहीं रह सकते। ऐसे में रैन बसेरा तलाशा, पर वहां तो ताला लगा था।

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