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  • 8 Inches Of Rain Less Than Average; If The Channel Link Was Made In Time, The Overflow Water From The Gagarin Dam Would Come Into The Chawli Dam

चंवली बांध 2 मीटर खाली:औसत से 8 इंच बारिश कम; चैनल लिंक समय पर बन जाता तो गागरीन बांध से ओवरफ्लो हुआ पानी आता चंवली बांध में

झालावाड़4 दिन पहले
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  • कुल भराव क्षमता 9.37 मीटर, 7.57 मी. ही पानी आ पाया, पिपलाद बांध भी नहीं भर पाया

इस बार औसत से आठ इंच बारिश कम हुई है। इसका सबसे बड़ा असर यहां चंवली बांध पर पड़ा है। चंवली बांध अब भी दो फीट खाली है। ऐसे में आने वाले समय में सिंचाई से लेकर पेयजल तक के लिए लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि गागरीन बांध पूरा भर चुका है। यह काफी समय से ओवरफ्लो है, जबकि गागरीन बांध के ओवरफ्लो पानी को ही चंवली तक पहुंचाने की योजना थी, लेकिन अब तक इसका काम पूरा नहीं हो पाया है। इसके चलते जहां एक ओर चंवली बांध खाली पड़ा है, वहीं गागरीन से पानी व्यर्थ बह रहा है।इस बार कम बारिश का असर सबसे बड़े पैमाने पर चंवली बांध में ही देखने को मिला है। यदि पिछले साल को छोड़ दें तो यह बांध करीब 4 सालों से खाली रह रहा है। चंवली बांध की कुल भराव क्षमता 9.37 मीटर है, जबकि अभी तक इसमें 7.57 मीटर ही पानी आ पाया है। हर साल इस बांध से सिंचाई के लिए किसानों को परेशानी होती है। पीने का पानी भी बड़ी मुश्किलों से मिल पाता है।

इसलिए जरूरत थी चैनल लिंक की

सरकार ने गागरीन-चंवली लिंक चैनल प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। इसका मकसद था कि गागरीन के ओवरफ्लो पानी को चंवली तक लाया जाए, ताकि गागरीन में पानी व्यर्थ नहीं बहे और चंवली में पानी की कमी नहीं हो। जून 2018 में इसका काम शुरू किया गया। 15 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले गागरीन-चंवली चैनल लिंक के कार्य को जुलाई 2019 में पूरा किया जाना था, लेकिन अब तक यह अधूरा ही है। इसी का नतीजा है कि गागरीन से इस बरसात में करीब 62 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी व्यर्थ बह गया। यदि चैनल लिंक का काम समय रहते पूरा हो जाता तो इस बरसात में इतनी बड़ी मात्रा में पानी ओवरफ्लो होकर व्यर्थ नहीं बहता। यह पानी चंवली के काम आता।

फसलों पर असर : अब लगने लगा रोग, रबी की फसलें भी होंगी प्रभावित

कम बारिश और तापमान में तेजी का असर फसलों पर पड़ने लगा है। इस बार उड़द सहित अन्य फसलें रोग की चपेट में आ गई हैं। इसी तरह रबी की फसलें भी प्रभावित होंगी। पानी की कमी को देखते हुए रबी में गेहूं का रकबा सरसों और चने में डायवर्ट होगा। जानकारों का कहना है कि रबी की बुवाई में अब किसान कम पानी वाली फसलों की अधिक बुवाई करेंगे। वर्तमान में खरीफ की फसलों में पीला मोजेक सहित अन्य रोग लगने से किसान दुखी हैं। यहां पिड़ावा क्षेत्र और आसपास के गांवों में फसलें रोगों की चपेट में आई हैं। इसी तरह के हालात बकानी सहित अन्य क्षेत्रों के भी हैं। अभी तापमान भी काफी अधिक चल रहा है। ऐसे में रबी की बुवाई जहां सितंबर के आखिरी सप्ताह में होने लग जाती है, वह अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक पहुंचेगी। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अर्जुन वर्मा का कहना है कि इस बार तापमान में काफी अधिकता है। इसके चलते बुवाई में देरी होगी।

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