यहां सालभर लगा रहता है रावण परिवार का दरबार:झालरापाटन में सीमेंट-कंक्रीट से बने आकर्षक पुतले, बच्चों को बुरी नजर से बचाने शीश झुकाते हैं लोग

झालावाड़2 महीने पहले
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दशहरा मैदान में बने रावण और उसके परिजनों के पुतले। - Dainik Bhaskar
दशहरा मैदान में बने रावण और उसके परिजनों के पुतले।

जिले के झालरापाटन शहर के दशहरा मैदान में रावण का पूरा परिवार दरबार लगाए बैठा है। दशहरा पर सभी शहरों में पुतले बनाकर उनका दहन किया जाता है और फिर वापस दशहरे पर ही रावण बनाया जाता है। लेकिन यहां रावण का पूरा परिवार साल भर जमा रहता है। यह सभी यहां रियासत काल से ही स्थापित है। दशहरा पर यहां भी पुतलों का दहन किया जाता है।

इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि झालावाड़ रियासत के प्रथम महाराज राणा मदन सिंह झाला ने 1840 में झालरापाटन मेला मैदान में रावण के कुनबे का निर्माण कराया था। तब से यहां दशहरा मनाया जाता है। पहले मिट्टी के पुतले की नाभि में एक लाल रंग से भरा कलश रखकर तीर मारा जाता था और रावण वध की परंपरा निभाई जाती थी। इसके बाद 1920 में राणा भवानी सिंह ने रावण के कुनबे का मिट्टी और पत्थर से निर्माण कराया। इसके बाद से ही रावण परिवार के दरबार ने स्थायी रूप ले लिया और यह दरबार साल भर लगा रहता है।

उन्होंने बताया कि समय बीतने के साथ रावण दहन कार्यक्रम की जिम्मेदारी नगर पालिका ने ली। तब से उसने सीमेंट-कंक्रीट से पुतलों को मजबूती दी और हर साल रंग रोगन कर इनको और भी आकर्षक कर दिया जाता है। रावण, मंदोदरी, मारीच, सूर्पनखा, द्वारपाल और जमीन पर लेटे कुंभकर्ण के विशालकाय पुतलों को यहां से गुजरने वाले राहगीर निहारे बिना नहीं रह पाते हैं।

बच्चों को बुरी नजर से बचाता है
झालरापाटन शहर के दशहरा मैदान में लगे रावण दरबार के प्रति स्थानीय नागरिकों की अजीब मान्यताएं भी है। कुछ बुजुर्गों ने बताया कि जब बच्चों को बुरी नजर लग जाती है तो वे लोग दशहरा मैदान के रावण दरबार पहुंचते हैं और वहां बच्चों का शीश नवाते हैं और वहां की मिट्टी सिर पर लगा देते हैं, जिससे बच्चों की बुरी नजर उतर जाती है। इसे अंधविश्वास कहें या मान्यता, लेकिन झालरापाटन शहर का यह रावण दरबार हर किसी के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

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