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प्रेरणास्पद:पिता के अंतिम सफर की साक्षी बनी बेटियां, निभाया फर्ज

लाखेरी12 दिन पहले
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लाखेरी. छोटी उम्र में ही बड़ी जिम्मेदारी... मनीषा और स्वाति नामक बालिकाओं ने अपने-अपने पिता की अंतिम विदाई की विधिवत रस्म निभाई। - Dainik Bhaskar
लाखेरी. छोटी उम्र में ही बड़ी जिम्मेदारी... मनीषा और स्वाति नामक बालिकाओं ने अपने-अपने पिता की अंतिम विदाई की विधिवत रस्म निभाई।
  • लाखेरी में बदलाव व संघर्ष के जज्बे को बयां करते दो उदाहरण

शहर में फैल रहे कोरोना संक्रमण के दौर में बेटियों के जज्बे व संघर्ष के दो उदाहरण ने समाज के बदलाव की अलग तस्वीर प्रस्तुत की है। दोनों उदाहरण में बेटियां अपने घर की संबल बनी हैं। अपने पिता के अंतिम सफर की साक्षी बनी हैं और बेटी होने का फर्ज भी निभाया है। इसमें मनीषा का उदाहरण तो उसके संघर्ष व जज्बे की बड़ी मिसाल है। विपरीत हालात के बीच शहर में दो मौत होने पर जब अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी दोनों जगहों पर बेटियां पिता के अंतिम सफर में आगे-आगे साथ चल पड़ी। मनीषा ने तो शवयात्रा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

ऐसी लाेकमान्यता है कि शवयात्रा में सबसे छोटा पुत्र हांड़ी लेकर आगे-आगे चलता है, लेकिन गणेशपुरा के गजानंद के तो बेटा व बेटी मनीषा ही है तो यह रस्म भी उसे ही निभानी पड़ी। वहीं, शहर में कप्तान के नाम से प्रसिद्ध रविकांत शर्मा के निधन पर उनकी बेटी स्वाति ने मुखाग्नि देकर अपना फर्ज निभाया।शर्मा कामगार संघ के अध्यक्ष रहने के साथ क्रिकेट के बेहतरीन खिलाड़ी रहे थे। वे रणजी प्लेयर होने के साथ सामाजिक व राजनीति गतिविधियाें से जुड़े रहे। कम उम्र में भी दाेनाें बेटियां अपने घराें में पारिवारिक सदस्याें काे सांत्वना देने अाैर देखरेख का जिम्मा उठाने का भराेसा देती रही।

कम उम्र में संघर्ष की मिसाल बनी मनीषा

मनीषा की उम्र भले ही कम हो, लेकिन उसका संघर्ष उसे बड़ा बना देता है। गणेशपुरा के गजानंद के औलाद नहीं थी तो जन्म के समय ही मनीषा को गोद लिया। जब मनीषा के खेलने-कूदने के दिन थे, तब उस पर घर की जिम्मेदारी आ गई। माता-पिता बीमारी से पीड़ित हो गए तो वह चारा बेचकर परिवार के काम में साथ देने लगी। ठेले पर मां को बैठाकर वह बस स्टैंड पर चारा बेचने निकल पड़ती। ऐसे संघर्ष के दौर में भी उसके चेहरे पर परिस्थिति को लेकर कोई शिकन नहीं रही। मनीषा एक बार तो वह सन्न रह गई। फिर भी बीमार मां में उम्मीद की किरण देखते हुए वह अंतिम सफर की साक्षी बनी।

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