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कायन हाउस:बंधा गोशाला में 2500 गोवंश, खाने के लिए चारा नहीं, भूख से राेज दम ताेड़ रहे हैं 10 से अधिक पशु

कोटाएक महीने पहले
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निगम अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा आमजन से लेकर गोवंश तक को भुगतना पड़ रहा है

नगर निगम में व्यवस्थाएं सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं। निगम अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा आमजन से लेकर गोवंश तक को भुगतना पड़ रहा है। बंधा स्थित गाशाला में निगम की लापरवाही के कारण इस साल समय पर भूसे, चारे व पशु आहार का टेंडर नहीं किया। हर साल नए वित्तीय वर्ष में नए टेंडर हाेते हैं, लेकिन निगम ने समय रहते ध्यान नहीं दिया और टेंडर अटकते-अटकते सितंबर माह हाे गया। अब नए

टेंडर का प्राेसेस चल रहा है। नतीजा ये हाे रहा है कि पिछले 15 दिनाें से गाेवंश काे पशु अाहार नसीब नहीं हुअा, एक माह से उन्हें हरा चारा नहीं मिला और अब ताे भूसे के गाेदाम भी खाली हाे रहे हैं। शहर के दानदाताओं बीच-बीच में वहां हरा चारा और खल-चूरी पहुंचा देते हैं, जिससे कुछ गाेवंश का पेट भर जाता है। हरे चारे की कमी काे देखते हुए रविवार काे भी वहां दानदाताओं ने एक ट्राॅली हरा चारा पहुंचाया।

गाेशाला में वर्तमान में 2500 गाेवंश हैं और औसत हर दिन 10 गाेवंश की मृत्यु हाे रही है। रविवार काे भी 10 गाैवंश ने दम ताेड़ा। इतना ही नहीं मरने के बाद भी उन्हें तत्काल उठवाने की व्यवस्था नहीं है, ऐसे में डाॅग से लेकर चील-काैवे तक उन्हें नाेचते रहते हैं।

चारे के लिए हर साल मार्च में होते हैं टेंडर, इस साल अभी तक भी नहीं हुए, इसलिए आ रही समस्या

नगर निगम ने इस मामले में शुरू से ही लापरवाही बरती। हर साल 31 मार्च काे पुराने टेंडर खत्म हाेते हैं। इसकी जानकारी नगर निगम काे भी है। फिर भी फरवरी में नए टेंडर नहीं करवाए गए। मार्च में टेंडर प्रक्रिया शुरू की और 22 मार्च काे लाॅकडाउन लग गया। टेंडर में फर्में पार्टिसिपेट ही नहीं कर पाई। उसके बाद निगम एक-दाे बार प्रयास किए, लेकिन किसी न किसी कारण से टेंडर सफल नहीं हाे पाए। काेराेना काल में

जब जरूरत के कार्याें की वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही थी ताे निगम ने गाैशाला में पशुओं के भूसे, हरे चारे व पशु आहार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्याें नहीं की। केवल भूसा लेते रहे ओर बाकी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। बारिश में सर्वाधिक हरा चारा आता है, पूरी बारिश निकल गई। केवल वहां पर हरा चरा वाे ही पहुंचा जाे दानदाताओं ने भिजवाया। गाेवंश काे पशु अाहार में भूसे के साथ-साथ मिलाकर खल,

चूरी, चापड़, लावण्य चूर्ण आदि भी दिया जाता है तभी वाे भूसा खाते हैं। सूखा भूसा गाेवंश नहीं खा पाते हैं। उसके बावजूद नगर निगम की तरफ से ऐसी काेई व्यवस्था नहीं की गई कि जब तक टेंडर प्रक्रिया नहीं हाे जाती तब तक के लिए पशुओं भाेजन में काेई कमी नहीं आए।

दानदाताओं के भराेसे चल रहा कायन हाउस

निगम के किशाेरपुरा स्थित कायन हाउस की स्थिति भी दयनीय है। वहां पर भी गाेवंश मरने के बाद दाे-दाे दिन तक उठाए नहीं जाते हैं। शुक्रवार-शनिवार काे भी वहां मृत गाेवंश काे नहीं उठाने के कारण उससे उठती दुर्गंध से आसपास रहने वाले काफी परेशान हुए। इस कायन हाउस की व्यवस्था भी दानदाताओं पर अधिक निर्भर है। कुछ समाजसेवी शहर के ऐसे हैं, जाे लगातार यहां आकर श्रमदान से लेकर हरे चारे

व अन्य व्यवस्थाएं करते रहते हैं, लेकिन निगम बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे।जनप्रतिनिधियाें ने अधिकारियों को बताए हालात, नहीं हुआ सुधार : गाेशाला की स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है। शनिवार काे विधायक मदन दिलावर वहां के दयनीय हालात देखकर व्यथित हुए। उन्हाेंने वहां मृत

गाेवंश के नाेंचे हुए शव, भूसे के खाली गाेदाम भी देखे और पशु आहार व हरे चारा नहीं मिलने की समस्या भी देखी। इससे दाे दिन पहले पूर्व पार्षद बृजेश शर्मा नीटू व ओम गुंजल भी वहां गए थे। उन्हाेंने भी यही समस्याएं देखी और अधिकारियाें तक काे इससे अवगत करवाया। इन सबके बावजूद गाेवंश के लिए पर्याप्त भाेजन की व्यवस्था नहीं हाे पा रही है।

इधर...निगम ऑफिस के सामने से ही कचरा गिराते निकल रहे वाहन

नगर निगम ने शहर में कचरा परिवहन के लिए जाे वाहन लगा रखे हैं और जिस लापरवाही से काम कर रहे हैं उससे शहर में सफाई के बजाय गंदगी फैल रही है। जर्जर डंपर बिना ढके कचरे काे लेकर जा रहे हैं,

जिससे आधा कचरा ताे सड़काें पर ही गिर जाता है और आधा ट्रेंचिंग ग्राउंड पहुंच पाता है। ये सब नगर निगम की आंखाें के सामने हाे रहा है, लेकिन काेई कार्रवाई करने वाला नहीं है। निगम भवन के सामने से ही ये वाहन गुजर रहे हैं। नगर निगम द्वारा कचरा उठाने के लिए गैराज से डंपर लगा रखे हैं और बाकी आउट साेर्स पर ले रखे हैं। इन दाेनाें तरह के डंपर जब कचरा लेकर निकलते हैं ताे इसके पीछे चलने वालाें

की सांसे फूल जाती हैं। कचरा गिरता जाता हैऔर लाेग उससे बचने की काेशिश में इधर-उधर से निकलते हैं। गैराज के जाे डंपर है उनके ताे ढक्कन तक गायब हाे चुके हैं, तिरपाल ताे उन पर कभी ढका ही नहीं। दूसरे जाे ठेकेदार के डंपर है उन पर ढक्कन ताे है, लेकिन तिरपाल अाधा-अधूरा ढका जाता है। चक्कर बचाने के लिए वे क्षमता से अधिक कचरा भर लेते हैं और फिर पूरे रास्ते गिराते हुए जाते हैं।

सभी कचरा परिवहन के वाहन चालकाें पाबंद कर रखा है कि वे बिना तिरपाल गाड़ी लेकर न जाए, गैराज वालाें काे भी तिरपाल दे रखा है। उसके बाद भी जाे तिरपाल यूज नहीं कर रहा है उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - सतीश मीणा, हैल्थ ऑफिसर नगर निगम

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