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देश की इकलौती कचौरी जो बन गई ब्रांड:सबसे महंगी हींग से तैयार होती है कोटा कचौरी, सालाना 110 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार

कोटा6 महीने पहलेलेखक: मुकेश सोनी
उड़द की दाल में हींग व कचौरी दलिया मिर्च डालकर तैयार होने वाली इस कचौरी के जायके का कोई तोड़ नहीं।

हींग की खुशबू में डूबी और एकदम खस्ता। स्वाद ऐसा कि लोग पिज्जा-बर्गर खाना भूल जाएं। ये है कोचिंग सिटी की मशहूर कोटा कचौरी। इसके दीवानों की संख्या लाखों में है। अकेले कोटा शहर में लोग हर रोज 3 लाख से ज्यादा कचौड़ी खा जाते हैं। कोटा की कचौरी का स्वाद लेने से खुद पीएम नरेंद्र मोदी भी अपने को नहीं रोक पाए। उड़द की दाल में हींग व कचौरी दलिया मिर्च डालकर तैयार होने वाली इस कचौरी के जायके का कोई तोड़ नहीं। कैथा की चटनी (हरी) के साथ लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको ले चलते हैं सबसे महंगी हींग के साथ बनने वाली कोटा कचौरी के सफर पर...

कोटा कचौरी बन गया ब्रांड
यूं तो कचौरी के जायके का सफर रियासत काल से शुरू हुआ था, लेकिन उस समय एक-दो दुकानें ही थीं। अच्छी क्वालिटी की हींग और खास मसालों का स्वाद लोगों के मुंह ऐसा लगा कि, देखते ही देखते कोटा कचौरी एक ब्रांड बन गई। कोटा में सबसे पुरानी दुकान रामपुरा इलाके के शास्त्री मार्केट में सुवालाल कचौरी वाले की है। जितेंद्र जैन बताते है कि उनके दादा ने सबसे पहले शास्त्री मार्केट में कोटा कचौरी की दुकान 1960 में खोली थी। आज शहर में 300 से ज्यादा छोटी-बड़ी दुकानें और लगभग इतने ही ठेले हैं, जहां कचौरी बनाई जाती है।

इस जायके का कोई तोड़ नहीं
उड़द दाल, मैदा, बेसन से बनने वाली कचौरी की सबसे खास बात है कि इसमें डाली जाने वाली हींग। यही कचौरी के टेस्ट को जायकेदार बनाती है। मार्केट में 2 हजार से 30 हजार रुपए किलो की हींग मिलती है। कोटा कचौरी में 25 हजार रुपए किलो वाली हींग का इस्तेमाल किया जाता है। मसाले में मिर्च भी अच्छी क्वालिटी की इस्तेमाल की जाती है। इसे कचौरी दलिया कहते है। चंबल का पानी, तेज मसालों को आसानी से डाईजेस्ट करता है।

रोज 3 लाख कचौरी खा जाते हैं लोग
शहर के हर कोने में कचौरी की दुकानें हैं। कई इलाकों में तो नामचीन दुकानें हैं, जिनका खुद का ब्रांड है। टेस्ट और ब्रांड के नाम पर लोग दूर-दूर से कचौरी खाने आते हैं। शहर में औसत रोज 3 लाख कचौरी की खपत होती है। 60 ग्राम वजनी दाल कचौरी 10 रुपए में बिकती है। यानी लोग एक दिन में रोज 30 लाख रुपए का कारोबार होता है। हर महीने करीब 90 लाख कचौरी की खपत के हिसाब से 9 करोड़ रुपए की कचौरी बिकती है। पूरे साल में आंकड़ा 110 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है।

2500 से 3000 लोगों को रोजगार
कचौरी के कारोबार ने शहर में 2500 से 3000 लोगों को रोजगार मिल रहा है। एक दुकान में कम से कम 5 व्यक्ति काम करते हैं। इनमें हलवाई, हेल्पर, काउंटर कर्मी शामिल हैं। शहर में करीब 15 दुकानें तो ऐसी हैं, जिनमें करीब 50 हजार कचौरियां रोज बिकती हैं। एक-एक दुकानदार पर रोज 3-3 हजार कचौरी की सेल होती है। 50 से 60 दुकानों पर रोज 1000 से ज्यादा कचौरियां बिकती हैं। 200 दुकानें ऐसी हैं, जहां 500 से 1000 कचौरी की बिक्री होती है। बाकी दुकानदार, ठेले वाले 200 से 500 कचौरी रोज बेचते हैं।

विदेश में भी टेस्ट के दीवाने
मनोज जैन बताते है कि कोटा में अपने रिश्तेदार के यहां आने वाले लोग कचौरी को पैक करवाकर अपने साथ ले जाते हैं। उनकी दुकान की कचौरी, US, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व दुबई तक लोग लेकर गए हैं। एक बार तो करीब 300 कचौरी एक रिश्तेदार कुरियर के जरिए गुड़गांव लेकर गया। वहां से हवाई जहाज के जरिए US भेजी गई। US में 4 महीने तक कचौरी खाई गई।

ऐसा टेस्ट, दूसरी जगह नहीं
मनोज जैन बताते है कि लोगों ने 'कोटा कचौरी' ब्रांड को दूसरे बड़े शहरों में चलाने का प्रयास किया, लेकिन इतना रिस्पॉन्स नहीं मिला। इसके दो कारण है। पहला हींग की अच्छी क्वालिटी, दूसरा चंबल का पानी। कुछ जगहों पर तो कोटा से पानी के टैंकर ले जाने पड़े थे।

चंबल का पानी, तेज मसालों को आसानी से डाईजेस्ट करता है।
चंबल का पानी, तेज मसालों को आसानी से डाईजेस्ट करता है।

जब संसद में भेजी गई 500 कचौरी

कोटा से सांसद ओम बिरला के स्पीकर बनने के दो-तीन दिन बाद करीब 500 कोटा कचौरी संसद में भेजी गई थी। तब संसद भवन में मौजूद मंत्री व सांसदों ने कोटा कचौरी के स्वाद चखा था। ये सभी कचौरी कोटा के व्यापारी मनोज जैन की दुकान से ही भेजी गई थीं। करीब साढ़े 8 साल पहले पीएम नरेन्द्र मोदी भी कोटा कचौरी का स्वाद चख चुके हैं। तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

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