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आज शहरवासियों के बिना होगा रावण दहन:दशहरा मेला नहीं लगने के कारण 300 करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित, 750 से अधिक परिवारों पर आर्थिक संकट की छाया

कोटाएक महीने पहले
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काेटा के अंतरराष्ट्रीय दशहरा मेले काे काेराेना का ऐसा ग्रहण लगा कि 127 सालाें का रिकाॅर्ड टूट गया। - Dainik Bhaskar
काेटा के अंतरराष्ट्रीय दशहरा मेले काे काेराेना का ऐसा ग्रहण लगा कि 127 सालाें का रिकाॅर्ड टूट गया।
  • 127 साल में ऐसा पहली बार; लगातार दूसरे साल नहीं लग सका मेला, पुष्कर में मेले की अनुमति, लेकिन कोटा में सरकारी पाबंदी

काेटा के अंतरराष्ट्रीय दशहरा मेले काे काेराेना का ऐसा ग्रहण लगा कि 127 सालाें का रिकाॅर्ड टूट गया। लगातार दूसरे वर्ष भी मेला भी नहीं भरने के कारण यहां पर आने वाले प्रदेश और देश के 750 से अधिक व्यापारियाें काे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। काेटा में लगने वाले 20 दिन के मेले में 300 कराेड़ रुपए से अधिक का काराेबार हाेता है।

राजस्थान में काेराेना का प्रभाव लगभग खत्म हाेने के बाद हाल ही में पुष्कर के मेले काे परमिशन मिली है, लेकिन काेटा के दशहरे मेले के लिए परमिशन नहीं मिलने के कारण व्यापारी मायूस हैं। उनकी पीड़ा यह भी है कि राज्य और केंद्र सरकार ने काेराेना से प्रभावित लाेगाें के लिए कुछ न कुछ घाेषणा की है, लेकिन देशभर के 4830 व्यापारी जाे सालभर देश में घूम-घूमकर मेले में काराेबार करते हैं, उनके लिए किसी प्रकार की घाेषणा अब तक नहीं की गई है।

दशहरा मेले में 500 पक्की दुकानें लगती थी। इनके अलावा 250 से अधिक कच्ची दुकानें लगती थी। इनसे नगर निगम काे 3.50 से 4 कराेड़ रुपए का रेवेन्यू मिलता था। बिजली, जलदाय विभाग काे भी प्रति दुकान से औसत 2 से 3 हजार रुपए की आय हाेती थी। इसके अलावा ट्रांसपाेर्टेशन, फूल, डेकाेरेशन, साउंड सिस्टम आदि के व्यापारियाें काे आय हाेती थी।

बड़ा रावण बनता था ताे रावण के पुतले बनाने वाले फतेहपुर सीकरी के कारीगर नईम का पूरा कुनबा इसी से सालभर की आमदनी पाता था। नईम करीब 30 सदस्याें काे साथ लेकर आते थे, जाे दशहरे मेले में पुतले बनाने के अलावा शहरभर में बनने वाले छाेटे पुतले भी बनाते थे। अब सबकुछ ठप है। दशहरा मेला व्यापार महासंघ के पूर्व अध्यक्ष सुनील वैष्णव बताते हैं कि इस मेले से काेटा ही नहीं बल्कि कई पीढ़ियाें से यहां व्यापार करने आ रहे देशभर के व्यापारियाें काे काफी आस रहती थी, सरकार ने इस परमिशन नहीं देकर सबकुछ खत्म कर दिया।

पहले: 15 से 20 लाख लाेग आते थे मेले में

काेटा का दशहरा मेला देखने के लिए काेटा के अलावा राजस्थान अन्य शहरों के लाेग भी आते थे। दशहरे के दिन जब राणण दहन हाेता था ताे मैदान में 1 से 1.25 लाख लाेग माैजूद रहते थे। पैर रखने के लिए जगह नहीं मिलती थी। दूर तक लाेगाें के केवल सिर ही नजर आते थे। ऐसी ही भीड़ स्टार नाइट, अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, पंजाबी नाइट आदि प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम के दाैरान भी हाेती थी।

आज : खाली मैदान में ही होगा रावण दहन

दाे साल पहले तक नवमी की दाेपहर से लेकर रावण दहन तक शहर में गजब का उल्लास रहता था। पुतलाें काे खड़ा करने का कार्य सुबह से ही शुरू हाे जाता था और रात तक वे खड़े हाे पाते थे। दशहरे के दिन सुबह से ही बच्चाें से लेकर बुजुर्ग तक इन पुतलाें काे देखने के लिए आते थे। आज केवल 25 फीट के रावण और 15-15 फीट के कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलाें का दहन केवल औपचारिक रूप से किया जाएगा ताकि परंपरा कायम रहे।

भारत-पाक युद्ध और इमरजेंसी के दाैरान भी लगा था दशहरा मेला

जब से मेले का शुरुआत हुई तब से ये काेराेनाकाल ही ऐसा देखा जब मेले का आयाेजन नहीं हाे रहा है। नहीं ताे काेई भी विपत्ति आई हाे, दशहरा मेले का आयाेजन जरूर हाेता था। देश में जब इमरजेंसी लगी, ब्लैक आउट हुआ हाे या भीषण बाढ़ आई हाे। मेले का आयाेजन कभी नहीं टला। ब्लैकआउट के दाैरान रात की बजाय दिन में मेला भरता था।

बाढ़ के दाैरान गढ़ पैलेस के सामने मेला भरा था। इस बार न आतिशबाजी हाेगी न गाजे-बाजे वाली भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी हाेगी। आम जनता का प्रवेश निषेध रहेगा। केवल एमएलए, सांसद, महापाैर, उपमहापाैर, पार्षदाें व अधिकारियाें काे ही इसके लिए आमंत्रित किया गया है।

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