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समस्या:टोडिया योजना बंद करने से ऊंटपालक परेशान

बड़ाखेड़ा10 महीने पहले
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  • कई परिवाराें की मुख्य आजीविका का साधन होता है केवल पशुपालन

टोडिया योजना को बंद करने से ऊंटपालकों के लिए परिवार चलना-ऊंटों को पालना मुश्किल हो रहा है। इसके चलते ऊंटपालकों को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।  राज्य सरकार ने ऊंट को राज्य पशु तो घोषित कर दिया, लेकिन ऊंटपालकों को अपनी योजना की बेड़ियों में जकड़ लिया। ऊंटपालक अपने घर से बाहर जंगल में जीवन यापन करता है। सरकार की टोडिया योजना में मादा ऊंटनी के बच्चे के जन्म पर तीन किस्तों का भुगतान किया जाता था। राज्य पशुगणना 2012 के अनुसार राज्य में ये 3 लाख 25 हजार हैं। ऊंटनी के बच्चे को पशुपालक टोडिया कहते हैं।

टोडिया योजना में बच्चा पैदा होने पर पशुपालकों को 10 हजार रुपए की आर्थिक मदद दी जाती थी। इससे पशुपालकों को ऊंट की विक्रय पर रोक लगने के बाद मदद के तौर सरकार ने अपनी पहल रखी थी और योजना पूरे राज्य में लागू की थी।

पर्यटन में विशेष पहचान
रेबारी समाज के प्रदेश महामंत्री दुलीचंद रेबारपुरा ने बताया कि विदेशी सैलानियों को ऊंट की सवारी करना बहुत पसंद है। कैमल सफारी के माध्यम से कई पशुपालकों की आजीविका चल रही है। बूंदी, चित्ताैड़गढ़, जैसलमेर, सवाईमाधोपुर, बीकानेर में पशुपालक ऊंट को संजाकर रखते हैं। राजस्थान में रेबारी समाज जो अपनी पहचान व पारिवारिक रोजगार का साधन मानता था, वह आज इससे दूर होता नजर आ रहा है। 

^जिले में रेबारी समाज की मुख्य आजीविका का साधन केवल पशुपालन है। ऊंट उनके परिवार का पालन पोषण का आधार है, लेकिन सरकार ने टोडिया योजना को बंद कर दिया है। इससे ऊंटपालकों के लिए परिवार चलाना-ऊंट पालना भारी पड़ रहा है। -लक्ष्मण रेबारी, जिलाध्यक्ष, रेबारी समाज

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