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सरकारी अनुदान के सहारे नगर निगम:22 साल से अनुदान पर चल रहा निगम, नतीजा- विकास कार्याें के लिए लेना पड़ेगा सरकारी सहारा

काेटाएक महीने पहले
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1998 में पूरे प्रदेश की करीब 300 कराेड़ रुपए की चुंगी वसूली जाती थी

अगले महीने काेटा के दाेनाें नगर निगमाें का बाेर्ड बन जाएगा। प्रदेश सरकार ने पिछले साल इस दावे के साथ दाे निगम बनाए थे कि इससे शहर में विकास कार्य बेहतर तरीके से हाेंगे। दैनिक भास्कर ने इस दावे की पड़ताल की ताे सामने आया कि दाेनाें निगमाें के सामने सबसे बड़ी दिक्कत बजट की आएगी क्याेंकि 22 साल से निगम सरकारी अनुदान के सहारे चल रहा है। इस बीच निगम ने खुद के आय के स्रोत विकसित नहीं किए।

राज्य सरकार का अनुदान निगम कर्मियाें की सैलरी के लिए भी पूरा नहीं पड़ता। इस बार दोनों निगमों को 117-117 करोड़ का सरकारी अनुदान मिलेगा। इसमें से दक्षिण में 90 और उत्तर में 88 करोड़ वेतन में ही खर्च हो जाएंगे। इसका नतीजा ये होगा कि छोटे-मोटे काम तो हो जाएंगे लेकिन बड़े विकास कार्यों के लिए सरकार का ही सहारा लेना पड़ेगा।

वर्ष 1998 से पहले काेटा सहित प्रदेश के सभी नगर निकायों को चुंगी से इतनी आमदनी हो जाती थी कि सारे खर्चे निकालने के बावजूद धर्मादा विभाग के तहत शहर में हाेने वाले सामाजिक कार्याें पर खर्च तक उठाया जाता था। 22 साल पहले सरकार ने चुंगी वसूली खत्म कर दी थी। स्थिति संभालने के लिए चुंगी पुनर्भरण के नाम से अनुदान की बैसाखी थमाई। इस दौरान निगमों को अपनी आय के स्रोत भी विकसित करने थे। काेटा निगम काे अनुदान की ऐसी आदत पड़ी कि आज 22 साल बाद भी ये अपने पैराें पर खड़ा नहीं हाे सका।

इन्वेस्टिगेशन : यूडी टैक्स, मैरिज गार्डन व होटल-मैस से हर साल मिल सकते हैं 45 करोड़

नगर निगम काे चुंगी खत्म हाेने के बाद अपनी आय के नए साेर्स विकसित करने थे। यूआईटी बनने के बाद से निगम के पास केवल यूडी टैक्स, हाॅस्टल, हाेटल, मैस का रजिस्ट्रेशन, माेबाइल टाॅवर, मैरिज गार्डन का रजिस्ट्रेशन का काम ही बचा है। हालांकि इनसे भी नगर निगम काे अच्छी आय हाे सकती थी, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही और राजनीतिक कारणों से यहां भी निगम नाकाम रहा। यही कारण है कि निगम की वास्तविक आय आज भी 70 कराेड़ रुपए से आगे नहीं बढ़ पाई। ये है निगम की आय की स्थिति-
1.यूडी टैक्स
यूडी टैक्स से माेटी आय हाे सकती है, उसके बावजूद निगम पिछले 15 वर्षाें में यह सर्वे नहीं करवा पाया कि यूडी टैक्स देने वाले मकान, दुकान, शाेरूम, उद्याेग कितने हैं। अाज भी 2005 के सर्वे के अनुसार ही यूडी टैक्स के नाेटिस भेजे जा रहे हैं, जबकि इस दौरान मल्टी स्टाेरी से लेकर शाेरूम, मकान आदि कई गुना बढ़ गए हैं। जाे लिस्ट निगम के पास है, उनसे भी ठीक से वसूली नहीं की जाती है। हर वर्ष बजट में 15 कराेड़ रुपए की अनुमानित आय दर्शायी जाती है और अंत में मिलता 5 कराेड़ रुपए ही हैं।

2.मैरिज गार्डन से आय
इससे भी बुरा हाल मैरिज गार्डन एवं वैवाहिक स्थलाें के रजिस्ट्रेशन से होने वाली आमदनी का है। ये बायलाॅज लागू किए करीब 10 साल हाे गए, लेकिन इससे भी नाम मात्र का पैसा ही आता है। निगम के सर्वे के अनुसार शहर में 150 मैरिज गार्डन हैं, जिनका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। आज तक 5 से ज्यादा मैरिज गार्डन ने रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया। रजिस्ट्रेशन हाेने पर हर साल अनुमति शुल्क जमा करवाना हाेगा। इससे प्रति वर्ष करीब 10 कराेड़ की आय हाे सकती है जाे अभी 8 से 10 लाख रुपए ही है।

3.हाेटल, मैस, रेस्टाेरेंट से आय
हाेटल, मैस व रेस्टाेरेंट का भी रजिस्ट्रेशन निगम में करवाना जरूरी है। इनसे भी 20 कराेड़ रुपए की आय हाे सकती है। अभी निगम काे इससे काेई आय नहीं हो रही है। निगम के पास शहर की पाॅश काॅलाेनियाें में प्लॉट हैं, जिनकी नीलामी पिछले कई वर्षाें से नहीं कर पा रही है। इसके अलावा निगम की काफी जमीनें बेकार पड़ी हैं, लेकिन उनका रिकॉर्ड ही नहीं है। निगम की 300 दुकानें भी हैं, जिनका किराया 5-500 रुपए आता है, जबकि उनकी बाजार दर 10 हजार से कम नहीं है। इनसे 3 करोड़ मिल सकते हैं।

1998 में प्रदेश सरकार ने बंद कर दी थी चुंगी

वर्ष 1998 से पहले शहराें में जाे भी माल आता था, उस पर नगर निकाय द्वारा चुंगी ली जाती थी। वर्ष 1998 में पूरे प्रदेश की करीब 300 कराेड़ रुपए की चुंगी वसूली जाती थी। व्यापारियाें द्वारा इस चुंगी का विराेध किया जाता था। उस समय प्रदेश के सीएम भैंराेंसिंह शेखावत कुछ समय के लिए बाहर गए हुए थे और कार्यभार उप मुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा के हाथाें में था। व्यापारियाें की मांग पर उन्हाेंने एक झटके से चुंगी काे खत्म करने की घाेषणा कर दी। आंदोनल के बाद चुंगी पुनर्भरण की व्यवस्था शुरू हुई।

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