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ऑक्सीजन की ऑडिट:सामान्य रोगी के भी जिद कर ऑक्सीजन लगवा रहे परिजन, गंभीर की अटक रही सांसें

कोटा14 दिन पहले
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कोविड हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की ऑडिट करते ऑक्सीजन ऑडिट टीम के सदस्य। - Dainik Bhaskar
कोविड हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की ऑडिट करते ऑक्सीजन ऑडिट टीम के सदस्य।
  • भास्कर एक्सक्लूसिव-ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी ने 3 दिन काेविड हाॅस्पिटलाें का जायजा लिया ताे सामने आई हकीकत

ऑक्सीजन की भारी किल्लत के बीच जिला प्रशासन की ओर से बनाई गई ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी ने तीन दिन तक शहर के सभी कोविड हॉस्पिटलों का दौरा किया है। इसमें सामने आया है कि कुछ मरीजों के तीमारदार वार्ड में भर्ती मरीज को अपने स्तर पर बाजार से सिलेंडर लाकर लगा रहे हैं। उन्हें लगता है कि जितनी ज्यादा ऑक्सीजन देंगे, उतना ही मरीज जल्दी रिकवर होगा। जबकि यह स्थिति मरीज के लिए भी ठीक नहीं है। कमेटी ने यह भी पाया कि किसी भी अस्पताल में ऑक्सीजन की प्रॉपर मॉनिटरिंग नहीं हो रही कि किस मरीज को कितने लीटर ऑक्सीजन दी जा रही है।

ऑक्सीजन का स्तर 90 से 92 प्रतिशत आने के बावजूद तीमारदारों की जिद पर रोगी को रेगुलर ऑक्सीजन पर लिया हुआ है। किसी भी हॉस्पिटल में प्रॉनिंग नहीं कराई जा रही, जबकि अर्ली स्टेज में इससे जल्दी लाभ मिलता है और ऑक्सीजन डिपेंडेंसी कम होती है। इन सब तरीकों से ऑक्सीजन बचाकर दूसरे गंभीर मरीजों के काम आ सकती है। कमेटी ने गत रविवार से मंगलवार तक कोविड हॉस्पिटल में मरीजों के रिकॉर्ड भी देखे।

ऑक्सीजन मैनेजमेंट के नोडल अधिकारी एडीएम सिटी आरडी मीणा के निर्देश पर बनी कमेटी में मेडिकल कॉलेज में एनीस्थिसिया विभाग की प्रो. डॉ. ऊषा दड़िया, मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर डॉ. अब्दुल वहीद, बाल अधिकारिता विभाग के असिस्टेंट डायरेक्टर रामराज मीणा व कृषि विभाग के उप निदेशक रणधीर सिंह शामिल रहे। कमेटी ने अपनी प्रारंभिक फाइंडिंग जिला प्रशासन को दे दी है।

एक्सपर्ट |90 से 92% पर हटा दें ऑक्सीजन, यह वक्त 97 से 99 तक आने का इंतजार करने का नहीं
भास्कर ने इस कमेटी में शामिल निश्चेतना विभाग की एक्सपर्ट डॉ. ऊषा दड़िया से बात की। उन्होंने बताया कि मौजूदा स्थिति में हर तरह के संसाधन सीमित हैं, ऑक्सीजन भी..।

ऐसे में हमें यह देखना होगा कि कम संसाधनों में ज्यादा मरीजों को कैसे लाभ मिले। आज की स्थिति में 90 से 92 परसेंट ऑक्सीजन पर रोगी को कृत्रिम ऑक्सीजन देना बंद कर देना चाहिए, 97 से 99 प्रतिशत का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। इससे दो फायदे होंगे-मरीज की ऑक्सीजन डिपेंडेंसी घटेगी और दूसरे मरीजों को ऑक्सीजन मिलेगी। हां, यदि मरीज को फिर से जरूरत है तो कुछ-कुछ देर के लिए ऑक्सीजन दे सकते हैं, लेकिन रेगुलर उसे ऑक्सीजन पर रखना उचित नहीं है।

इसी तरह यदि प्रॉनिंग ठीक से कराई जाए तो बड़ी संख्या में ऑक्सीजन बचाई जा सकती है। यदि किसी का ऑक्सीजन 85 % आ रहा है और वह रातभर प्रोन पाेजिशन में लेट जाए तो रिसर्च कहता है कि उसका सेचुरेशन सुबह 90 % तक आ जाता है। प्रॉनिंग हमें किसी भी अस्पताल में देखने को नहीं मिली।

ऑडिट कमेटी का सुझाव : हर मरीज के टिकट पर अंकित हो कि उसे कितनी ऑक्सीजन दी जा रही

  • मरीज के टिकट पर ऑक्सीजन कितनी दी जानी है, यह अंकित होना चाहिए।
  • प्रत्येक हॉस्पिटल में एक नर्सिंग कार्मिक की ड्यूटी ही यह होनी चाहिए, जो प्रत्येक घंटे रोगी के टिकट पर अंकित ऑक्सीजन ही दी जा रही है, यह सुनिश्चित करें एवं रेगुलर माॅनिटरिंग करें।
  • अस्पतालों में बड़े-बड़े अक्षरों में 90-92 प्रतिशत ऑक्सीजन लेवल रखने के विषय में बड़े पोस्टर लगवाए जाने चाहिए, जिसमें यह संदेश भी अंकित हो कि अधिक ऑक्सीजन देने से मरीज के फेफड़ों की रिकवरी में देरी होती है तथा नुकसान की संभावना बनी रहती है।
  • लोगों की अधिक से अधिक काउंसलिंग की जानी चाहिए एवं कोविड वार्ड के बाहर प्रोन पाेजिशन कैसे करनी चाहिए एवं उसके लाभ के पोस्टर लगाए जा सकते हैं, ताकि मरीज एव परिजन जागरूक हो।
  • हॉस्पिटल में एक मरीज के साथ एक से अधिक सहयोगी ना हो, इसके लिए पास व्यवस्था लागू की जाए।
  • अस्पतालों में ऑक्सीजन का बैकअप भी होना चाहिए एवं अस्पतालों को समय पर ऑक्सीजन उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।
  • एमबीएस हॉस्पिटल में ऑक्सीजन रेगुलेटर उपलब्ध करवाए जाना चाहिए एवं खराब ऑक्सीजन प्वाइंट व रेगुलेटर तुरंत बदले जाएं
  • एसएसबी हॉस्पिटल में लाइन के अलावा कुछ मरीजों ने स्वयं के आक्सीजन सिलेंडर लगा रखे हैं, जो आक्सीजन की अनावश्यक खपत है, इसको रोका जाना चाहिए।
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