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कोरोना का कहर:17 दिन में पिता और पुत्र की माैत, परिवार में कमाने वाला कोई नहीं, अब घर चलाने का संकट

काेटा18 दिन पहले
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  • भास्कर ऐसे दो परिवारों की पीड़ा बता रहा है, जिन्होंने परिवार में कमाने वाले खो दिए और केवल महिलाएं व बच्चे रह गए

महावीर नगर सेकंड में रहने वाले रिटायर्ड बैंककर्मी दिवंगत छीतरलाल भार्गव का कोविड-19 के दंश से पूरा वंश ही खत्म हाे गया। काेविड-19 से इस परिवार की दाे पीढ़ियां खत्म हाे गई। दिवंगत भार्गव के बड़े बेटे की जुलाई में जयपुर में माैत हाे गई थी। 17 दिन में इस परिवार में पिता और इकलाैते छाेटे बेटे की भी माैत हाे गई है। अब परिवार में सिर्फ महिलाएं हैं। 58 साल की बुजुर्ग सास रमा भार्गव के साथ उनकी दाे बहुएं मीनू, पूजा और एक इकलाैती पाैती है।

इस परिवार में कमाने वाले काेई नहीं बचा है। इस परिवार के बहनाेई जेएल भार्गव बताते हैं कि दिवंगत छीतरलाल भार्गव का खुशाह परिवार है। उनके दो लड़के थे। दाेनाें इंजीनियर थे। दाेनाें जाॅब करते थे। बड़े बेटे सुनील कुमार भार्गव की 11 महीने पहले 30 जुलाई जयपुर में मृत्यु हाे चुकी है।

छाेटे बेटेअनिल कुमार भार्गव की 8 मई काे काेविड- 19 से प्राइवेट अस्पताल में मृत्यु हाे गई। छाेटे बेटे काे दिवंगत छीतरलाल भार्गव यहां संभालते थे। लेकिन, 8 मई काे अचानक उनकी तबीयत खराब हाे गई। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया। अस्पताल में 17 दिन इलाज के बाद उनकी भी मृत्यु हाे गई।

हंसते-खेलते परिवार की कोरोना नेे छीनी खुशियां
परिवार की दर्द भरी कहानी बताने वाले बहनाेई जेएल भार्गव की आखाें से आंसू छलक पड़े। उन्हाेंने बताया कि इस परिवार के साथ भगवान ने क्या किया जाे 11 महीने में दाे पीढ़ियाें काे अपने पास बुलवा लिया है। अब जाे हिम्मत बची है उसमें परिवार काे ढाढ़स बंधा रहे हैं। लेकिन, अब ढ़ाढस भी खत्म हाेता जा रहा है। दाेनाें पिता-पुत्र काे अस्पताल में भर्ती कराया थे । लेकिन, इस परिवार में 17 दिन में पूरे परिवार में कमाने वाले काेई नहीं बचा है। देखते-देखते दाे पीढ़ियां खत्म हाे गई है। जिसके बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, वैसी परिस्थिति सामने आ गई। इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था।

दो दिन में पिता-पुत्र की मौत, सारा पैसा इलाज में खर्च हुआ, अब परिवार पर आर्थिक संकट
केशवपुरा में पिता-पुत्र की माैत हाे गई है। अब परिवार में बचें है 80 साल की मां, सास-बहू और दाे मासूम बच्चे। जब बेटे की तबीयत बिगड़ी ताे परिवार वालाें ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने का प्रयास किया, लेकिन वहां से जवाब मिला कि बेड नहीं है। ऐसे में उन्हें मजबूरन प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उसके बाद पिता के लिए वेेंटिलेटर की जरमरत पड़ी ताे सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पताल नाप लिए, लेकिन किसी की मदद से एक निजी अस्पताल मंे जगह मिली, लेकिन तब तक बहुत देर हाे चुकी थी। अब परिवार चलाने का संकट हाे गया है।

केशवपुरा निवासी ओमप्रकाश बघेरवाल एसबीआई में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और पिछले साल ही उनका रिटायमेंट हुआ था। उनके बेटे बृजेश की 26 अप्रैल काे काेराेना के लक्षण दिखाई दिए ताे वे पारीक अस्पताल में दिखाया। वहां सीटी स्केन करवाई ताे इंफेक्शन नजर अाया। वहां डाॅक्टराें ने भर्ती कराने के लिए कहा। लेकिन वहां काेई बेड नहीं था। बृजेश की बहन सीमा का कहना है कि उसके बाद तीन दिन तक सरकारी सहित अधिकतर प्राइवेट अस्पताल में पता किया, लेकिन कहीं बेड नहीं मिले। उन्हें मेवाड़ अस्पताल में भर्ती कराया।

उनके ऑक्सीजन लगने लगी। पिता बेटे की चिंता में टेंशन में रहने लगे और वे भी 4 मई काे संक्रमित हाे गए। इसके बाद 60 साल की मां पति और बेटे की सेवा में अस्पताल मे संघर्ष करती रहीं। 8 मई काे वहां पिता केि लिए बाेला गया कि उन्हें वेंटीलेटर की जरूरत हाेगी। उन्हें शिफ्ट करना पड़ेगा। उसके बाद सभी अस्पतालाें में पता कराया, लेकिन नहीं बेड नहीं था। बड़ी मुश्किल से मिलने वालाें के प्रयास से जायसवाल अस्पताल में पिता काे वेंटीलेटर वाला बेड मिला।

लेकिन पिता बेटे की इतनी चिंता कर गए कि वे सदमे से उबर ही नहीं पाए। 9 मई काे उनकी माैत हाे गई। इधर बेटे बृजेश की हालात में भी सुधार नहीं हाे रहा था। अंत मैं 10 मई काे दुखांे का पहाड़ टूट पड़ा और बेटे बृजेश काे भी काेराेना ने परिवार से छीन लिया। अब परिवार में रह गए 80 साल की मां, पत्नी कलावती, बहू दीपिका और दाे मासूम पाेते 7 साल का कुनाल और 4 साल का उदित। इनकाे ताे यह भी नहीं पता कि उनके सिर से पिता का साया चला गया है।

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