कोटा में मगरमच्छ की पूजा का रिवाज:रोजड़ी गांव में बंगाली समाज ने की 23 फीट लंबे मगरमच्छ की पूजा, सालों से निभा रहे परंपरा

कोटा6 दिन पहले
कोटा में मगरमच्छ की पूजा की गई।

देशभर में शुक्रवार को मकर संक्रांति का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। अलग-अलग परंपराओं के रंग से सजे इस त्यौहार को देश में अलग-अलग रीति रिवाजों से मनाया जाता है। पतंगबाजी, सूर्य देव की आराधना और दान पुण्य कर जहां लोग मकर संक्रांति का पर्व मनाते हैं। वहीं कोटा के नयागांव रोजड़ी गांव के लोग मगरमच्छ की पूजा अर्चना कर अपनी परंपरा का निर्वाह करते हैं। यहां रहने वाले बंगाली समाज के लोग इस दिन मगरमच्छ की प्रतिमा बनाते हैं और विधि विधान से उसकी पूजा की जाती है। मगरमच्छ को मगरमच्छ का वाहन माना जाता है। ऐसे में मकरध्वज के रूप में मगरमच्छ की पूजा का विधान वर्षों से चला आ रहा है।

शुक्रवार को भी रोजड़ी में रहने वाले बंगाली समाज के लोगों ने 23 फीट लंबा मिट्टी का मगरमच्छ बनाया। फिर उसकी पूजा अर्चना कर परिक्रमा कर एक दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दी। मगरमच्छ की पूजा करने के लिए अलग-अलग कथाएं प्रचलित है। बंगाली समाज के लोगों का मानना है कि धरती पर मात्र मगरमच्छ ही एक ऐसा जीव है जो पानी और धरती दोनों पर समान रूप से रह सकता है।

बंगाल में यह कहानी है प्रसिद्ध

बंगाली समाज के लोगों ने बताया कि इससे जुड़ी हुई एक धारणा यह है कि एक व्यक्ति मिट्टी का मगरमच्छ बनाकर तांत्रिक के पास विद्या सीखने गया था। जब वह मकर संक्रांति पर घर लौटा तो उसके परिवार ने उससे पूछा कि उसने क्या सीखा। इस पर वह अपने परिवार को नदी के तट पर ले गया और वहां पर मिट्टी का मगरमच्छ बनाया और मंत्र बोलकर उसे जीवित किया। इसके बाद मगरमच्छ जीवित होकर नदी में चला गया। इसके बाद से ही लोग मकर संक्रांति पर मगरमच्छ की पूजा करते हैं। बंगाली समाज के लोगों ने बताया कि इसके अलावा गंगा जी का वाहक होने की वजह से भी मगरमच्छ को पूजा जाता है।

समाज और परिवार की खुशहाली की कामना

समाज के लोगों ने पूजन कर समाज और परिवार की खुशहाली की कामना की। इसके बाद एक दूसरे को प्रसाद भी बांटा। साथ ही सामूहिक भोजन का आयोजन भी किया।