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नहीं रहे कोचिंग के प्रकाशपुंज:कोटा कोचिंग के 'गुरु' वीके बंसल का निधन , 20 हजार से ज्यादा स्टूडेंट को IIT की राह दिखाई, शिक्षक सम्मान से 'पितामह' का देते थे दर्जा

कोटा7 दिन पहले
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कोटा के कोचिंग गुरु वीके बंसल का निधन। - Dainik Bhaskar
कोटा के कोचिंग गुरु वीके बंसल का निधन।

कोटा के कोचिंग गुरु वीके बंसल का आज निधन हो गया। वो कुछ समय से बीमार थे। वीके बंसल ने कोटा कोचिंग की नींव ही नहीं रखी, बल्कि पहला आईआईटियंस और आईआईटी-जेईई का पहला टॉपर देकर सफलताओं की ऐसी इबारत लिखी जो आज भी जारी है। वीके बंसल को बीते दिनों कोविड-19 का संक्रमण हो गया था। तड़के 4 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। इसके बाद कोटा कोचिंग का अध्याय शुरू करने वाले एक युग का अंत हो गया।

वीके बंसल का साल 1949 में उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्म हुआ था। परिवार में उन्हें विनोद के नाम से पुकारते थे
वीके बंसल का साल 1949 में उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्म हुआ था। परिवार में उन्हें विनोद के नाम से पुकारते थे

वीके बंसल का साल 1949 में उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्म हुआ था। परिवार में उन्हें विनोद के नाम से पुकारते थे। 3-4 साल की उम्र में माता पिता के साथ लखनऊ आ गए थे। बचपन में आंख खुली और होश संभाला तो रोज रात को एक लालटेन जलती देखी। कुछ माह बाद उन्होंने पिता से पूछा बाबूजी अपने घर में बिजली क्यों नहीं है। बाबूजी ने कहा बेटे पहले खूब मेहनत से पढ़ो, हमेशा फर्स्ट आओ। लखनऊ यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में एमएससी कर लो। फिर लेक्चरर बनकर पैसा कमाओ, तब घर में बिजली की रोशनी आ पाएगी। बाबूजी की यह बात सुनकर बंसल के मन में मेहनत का जुनून सवार हुआ।

स्कूल में कड़ी मेहनत करने का सिलसिला चलता रहा। 8वीं तक लगातार फर्स्ट पोजीशन मिलने से मन में जोश आ गया। स्कूल में पढ़ते हुए 1963 में पहली बार 372 रुपए की स्कॉलरशिप मिली। बाबूजी ने बेटे की लगन और मेहनत से आए पैसों का उपयोग घर के लिए किया। पढ़ाई के लिए लालटेन हटाकर बिजली की रोशनी ले आए। साल 1964 में बिजली की रोशनी से घर आलोकित हो उठा।

कोटा के जेके सिंथेटिक्स में इंजीनियर के रूप में नए करियर की शुरुआत की। साल 1973 में वीके बंसल शादी के बंधन में बंधे। कोटा से नए पारिवारिक जीवन का शुभारंभ किया
कोटा के जेके सिंथेटिक्स में इंजीनियर के रूप में नए करियर की शुरुआत की। साल 1973 में वीके बंसल शादी के बंधन में बंधे। कोटा से नए पारिवारिक जीवन का शुभारंभ किया

1971 में बीटेक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने औद्योगिक नगरी कोटा के जेके सिंथेटिक्स में इंजीनियर के रूप में नए करियर की शुरुआत की। साल 1973 में बंसल शादी के बंधन में बंधे। कोटा से नए पारिवारिक जीवन का शुभारंभ किया। संघर्षों के बीच सफलता का बीजारोपण करते हुए उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वीके बंसल देश में अकेले ऐसे कोचिंग गुरु थे। जिन्होंने अपने दम पर 20,000 से ज्यादा स्टूडेंट को आईआईटी की राह दिखाई। बच्चों से क्लास में वे मुश्किल से मुश्किल सवालों को भी सहजता से हल करने की कला सिखा देते थे, वो कुशाग्र बुद्धि और असाधारण प्रतिभा के धनी थे। जिन्हें सभी शिक्षक सम्मान से पितामह का दर्जा देते थे।

25 साल की उम्र में डॉक्टर जीडी अग्रवाल ने उनकी शारीरिक बीमारी को लाइलाज मानते हुए सलाह दी कि तुम कुछ ऐसा करो कि जॉब के लिए तुम्हें किसी के पास चलकर नहीं जाना पड़े। लोग तुम्हारे पास आए
25 साल की उम्र में डॉक्टर जीडी अग्रवाल ने उनकी शारीरिक बीमारी को लाइलाज मानते हुए सलाह दी कि तुम कुछ ऐसा करो कि जॉब के लिए तुम्हें किसी के पास चलकर नहीं जाना पड़े। लोग तुम्हारे पास आए

1980-90 के दशक में औद्योगिक मंदी ने शहरवासियों को हिला कर रख दिया था। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक शख्स अपनी मेहनत से पूरे शहर की इकोनॉमी को सहारा देकर नई राह दिखा सकता है। साल 1983 में जेके सिंथेटिक्स के बंद होने से कोटा में औधोगिक मंदी का काला कोहरा छाया हुआ था। छटनी के बाद नौकरी छूटने से हजारों परिवारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया था। ऐसे में शारीरिक बीमारी का सामना कर रहे वीके बंसल को तत्कालीन जनरल मैनेजर एनके गुप्ता ने बुलाकर कहा कि तुम कुछ ऐसा करो कि जॉब के लिए तुम्हें किसी के पास चलकर नहीं जाना पड़े। लोग तुम्हारे पास आए। बस यही वह निर्णायक दौर था। जब इंजीनियर वीके बंसल ने दृढ़ निश्चय के साथ घर बैठकर 12वीं स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का फैसला किया।1984 में पहली बार में आईआईटी-जेईई में एक छात्रा का सलेक्शन हुआ तो उम्मीद की छोटी सी किरण दिखाई दी। बाद में विज्ञान नगर में आकर इस छोटे से पौधे को कड़ी मेहनत से पल्लवित किया। उस समय ट्यूशन को कमजोर बच्चों का टूल माना जाता था। उन्होंने इसे हथियार के रूप में अपनाया। शुरुआत छोटी सी और चुनौती पहाड़ की तरह। परिवार को संभालने की जिम्मेदारी कंधों पर थी। जीवटता से आगे बढ़ते हुए इंजीनियर बंसल बन गए गणित के विशेषज्ञ।

शुरुआत में उन्होंने जेके कॉलोनी के क्वार्टर में डाइनिंग टेबल पर बैठकर दो तीन बच्चों को निशुल्क पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़कर 10 से 12 हो गई तो कार गैराज में बैठकर पहले 12वीं साइंस मैथ्स पढ़ाई और उसके बाद आईआईटी-जेईई की तैयारी कराने लगे। बच्चों का सिलेक्शन होने लगा, तो छात्रों की संख्या बढ़ती गई। जिससे नया हौसला पैदा हुआ। मैथ्स पढ़ाने का ऐसा जुनून था, कि खुद कई घंटों तक मैथ्स के सवालों में खोए रहते थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि वीके बंसल का जीवन संघर्ष की कटीली राह से गुजरा है।

क्लासरूम कोचिंग के इतिहास में विद्यार्थियों की सफलता के लिए सबसे पहले डीपीपी (डेली प्रैक्टिस प्रॉब्लम) जैसे सक्सेसफुल का आविष्कार उन्होंने किया। हर दिन क्लास में सबसे पहले प्रॉब्लम पर चर्चा करते, फिर उसके समाधान के बाद अगले टॉपिक की पढ़ाई होती थी। उनके उपयोगी टूल से औसत छात्र-छात्राएं को भी मेधावी छात्र-छात्राओं की बराबरी पर लाने का मौका मिला।

अमेरिका की प्रसिद्ध वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत के गणितज्ञ शिक्षक की खूबियां जानने के लिए बंसल क्लासेज में आकर केस स्टडी की। वॉल स्ट्रीट और द मिंट जैसे वर्ल्ड क्लास न्यूज़पेपर में भारतीय शिक्षक को कवर पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित कर दुनिया को रूबरू कराया कि कैसे एक शिक्षक ने कोटा को कैपिटल ऑफ कोचिंग के रूप में खड़ा कर दिया। असाधारण प्रतिभा और कर्मशीलता को आधार मानते हुए शिक्षा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए इंडिया टुडे ने 2011 में देश के ऊंचे और असरदार शख्सियतों की सूची में वीके बंसल को चुना।

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