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  • Muni Sudha Sagar Said Even Though He Gave Food To His Loved Ones, He Went To Employment, But He Has To Live For Them; Protocol Of Positivity Will Have To Be Followed

कोरोना ने सबकुछ खत्म कर दिया, विश्व इससे कैसे उभरे?:मुनि सुधा सागर बोले - भले अपनों काे खाे दिया, राेजगार चला गया, पर उनके लिए जीना है जाे माैजूद हैं; सकारात्मकता का प्रोटोकॉल मानना होगा

काेटा23 दिन पहले
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यह पहली बार है जब समाज को संस्कारों और जीवन जीने की सीख देने वाले राष्ट्रसंत का शिक्षा के सर्वोच्च पद पर आसीन कुलपति ने इस तरह से विशेष इंटरव्यू किया हो।  - Dainik Bhaskar
यह पहली बार है जब समाज को संस्कारों और जीवन जीने की सीख देने वाले राष्ट्रसंत का शिक्षा के सर्वोच्च पद पर आसीन कुलपति ने इस तरह से विशेष इंटरव्यू किया हो। 
  • भास्कर ने पहली बार किसी राष्ट्रसंत का शिक्षा के सर्वोच्च पद पर आसीन कुलपति से करवाया इंटरव्यू

विशेष इंटरव्यू - प्राे. डॉ. आरएल गोदारा वाइस चांसलर, वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा

निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधा सागर महाराज का सात साल बाद ससंघ कोटा में मंगल प्रवेश हुआ है। मुनि सुधा सागर वे राष्ट्र संत हैं, जो समाज को जीवन जीने की सीख देते हैं। नई पीढ़ी में संस्कारों के बीज बोते हैं। मुनि के कोटा आगमन पर भास्कर ने वर्धमान महावीर खुला विवि कोटा के वाइस चांसलर प्राे. डॉ. आरएल गोदारा से उनका विशेष साक्षात्कार करवाया। मुनिश्री ने शिक्षा, संस्कार व कोरोना सहित कई विषयों पर विचार रखे। यह पहली बार है जब समाज को संस्कारों और जीवन जीने की सीख देने वाले राष्ट्रसंत का शिक्षा के सर्वोच्च पद पर आसीन कुलपति ने इस तरह से विशेष इंटरव्यू किया हो।

मुनि बोले- शून्य पर पहुंचकर फिर शिखर पर जाना ही जीवन का मूल मंत्र, संस्कार तो परिवार से ही आएंगे

कोरोना ने पूरे विश्व के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। कैसे मुकाबला कर सकते हैं?
प्रकृति अपना बैलेंस बनाती है। हम प्रकृति की संतान हैं। यदि यह मानवकृत आपदा नहीं है तो हम काैन हाेते हैं, अच्छा बुरा कहने वाले, जाे कुछ किया है प्रकृति ने किया है। हां, वह हमारे लिए बुरा हाे सकता है। जीवन में भी प्रोटोकॉल फॉलो करने पड़ते हैं।
इस त्रासदी से परिवार बिखर गए। अर्थव्यवस्था डूब गई। दुनिया अवसाद में आ गई। कैसे उभरें?
मैं तो हूं ना। भले सबकुछ चला गया। अपनों को खो दिया। रोजगार गया। धंधा चौपट हुआ। धन गया, फिर भी मैं तो हूं ना। उनके लिए जीना है, जो मौजूद हैं। फिर शून्य से शुरुआत करनी है। यही जीवन का मूल मंत्र है।

आज के एजुकेशन सिस्टम में संस्कारों की भूमिका आखिर कैसे तय की जानी चाहिए?
आप क्या समझते हैं। संस्कार कहीं से असेंबल हो जाएंगे? बिल्कुल नहीं। संस्कार आपके परिवार से आएंगे। आत्मा का जाे शरीर है वह ज्ञान के नाम से ही जाना जाता है। आत्मा की पहचान ज्ञान से ही हाेती है। जैन दर्शन के अनुसार जीव का असाधारण लक्षण है ज्ञान दर्शन। इसमें ज्ञान व दर्शन दाेनाें हाेते हैं, वही मनुष्य है। वरना ताे वह जानवर हाेता है।

बोले-ज्ञान को समझना चाहते हैं, तो सुनिए-

ज्ञान दाे प्रकार का हाेता है एक ताे वह जिसमें ज्ञान ताे हाेता है, लेकिन उसका दुरुपयाेग करता है। रावण के पास राम जी से ज्यादा ज्ञान था। पर जाे रावण के पास ज्ञान था, वह विपरीत था। आज भी विश्व में महाशक्ति बनने की होड़ है। जबकि विश्व को सत्य, अहिंसा, दया व धर्म से ही जीता जा सकता है।

सियासत को आपकी क्या सीख है?
इस विषय पर न ही बोलूं तो ठीक है। वैसे राज के आगे भी नीति शब्द जुड़ा है। नीति और धर्म में बहुत अंतर है। राम ने लक्ष्मण से कहा कि मेरे पास भगवान होने का ज्ञान तो है लेकिन संसार का ज्ञान मेरे पास नहीं है। मेरे पास धर्म का ज्ञान है। रावण के पास नीति का ज्ञान है।

कॉर्डिनेशन : पंकज मित्तल