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  • On The Foundation Worship Everyone Should Take A Pledge That To Defeat The Epidemic Like Corona, It Will Be Safe And Take Care Of Others As Well.

राम मंदिर के भूमि पूजन पर भास्कर खास:नींव पूजन पर सभी संकल्प लें कि कोरोना जैसी महामारी को हराने के लिए सुरक्षित रहेंगे और दूसरों की भी देखभाल करेंगे

कोटा2 महीने पहले
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वो घड़ी आ गई जिसके लिए हमारी कई पीढ़ियां गुजर गईं और हम सौभाग्यशाली हैं कि ये पीढ़ी उस घड़ी का साक्षात्कार करने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का भूमि पूजन करेंगे। इस समारोह पर पूरी दुनिया की नजर टिकी होगी। प्रधानमंत्री इस समारोह से पहले हनुमानगढ़ी जाएंगे। वे वहां हनुमानजी के दर्शन करेंगे, उनकी अनुमति लेंगे और फिर नींव पूजन करेंगे। इससे श्रीराम भक्ति का बहुत बड़ा संदेश मिलता है। इस समय कोरोना महामारी पूरे देश में फैली हुई है। इसी कारण बहुत अधिक संख्या में लोग इस समारोह के लिए अयोध्या नहीं जा पा रहे हैं, लेकिन मैं आपको अयोध्या ले चलता हूं। आज से 6 साल पहले 2014 में 7 से 13 सितंबर तक अयोध्या में मेरी हनुमानजी के विषय में कथा थी। हनुमानजी के 7 रिश्ते हैं। इस पर मुझे 7 दिन प्रवचन देना था। महाराष्ट्र से आए लोगों ने ये कथा करवाई थी। 12 सितंबर 2014 को दोपहर 12 बजे मैंने रामललाजी के दर्शन किए थे। सकल जगत के पालनहार राजाधिराज रामचंद्र जी महाराज जिस स्थिति में वहां थे, वाे देखकर किसी भी भक्त को जो पीड़ा होती है, वो मुझे भी हुई थी। मैं तो हनुमानजी का छोटा सा भक्त हूं और मेरा मानना है कि हनुमानजी बातचीत के देवता हैं। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसी अनेक चौपाइयां और दोहे लिखे हैं जिनमें आज की स्थिति पर हमें बहुत बड़ा संदेश मिलता है, संबल मिलता है। महामारी के इस दौर में अगर आपके जीवन में कोई कठिनाई आई हो तो इन चौपाइयों को मंत्र के रूप में याद करिएगा। राममंदिर के निर्माण की जो नींव पूजा हो रही है ये रामचरितमानस लिखकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने उस समय किया था। और इसीलिए रामचरितमानस की पंक्तियां भारतीय संस्कृति की आचार संहित बन गई। और आज के समय में तो ये पंक्तियां हमारे लिए प्रभावकारी मंत्र हैं। परहित सरस धर्म नहि भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई।। अर्थात दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को दुख पहुंचाने के समान कोई पाप नहीं है। श्रीराम ने अपने भाई भरत को समझाते हुए कहा था कि हे भाई हमें ये बात समझनी ही होगी कि सबसे बड़ा धर्म है कि दूसरों की भलाई करना। एक बहुत बड़ा वर्ग इस समय संकट में है। आप थोड़े भी समर्थ हैं तो उनकी मदद कीजिए याद रखिए दूसरों को दुख पहुंचाएंगे तो ये भगवान की नजर में सबसे बड़ा पाप होगा।

काेराेनाकाल में रामचरितमानस की ये चाैपाइयां देती हैं धैर्य की सीख

निज प्रभु मय देखहिं जगत। केहि संग करयं विरोध।।
अर्थात : जाे लाेग जगत को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं फिर किससे बैर करें।

शि वजी ने अपनी पत्नी पार्वती जी से ये बात बोली थी और सच है। इस दौर में हो सकता है कोरोना को लेकर कुछ लोग लापरवाही करें और उससे आपका नुकसान हो, लेकिन आवेश में मत आइएगा। इस पंक्ति को याद करिए जो लोग इस संसार में भगवान को देखते हैं वो किसी से बैर नहीं करते। किसी ने मूर्खता की है तो आप उसे क्षमा करिए। उसे सिखाइए कि सावधानी रखें। बैर न करें।

धरी न काहू धीर सबके मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महूं।।

अर्थात : किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिए। श्री रघुनाथजी ने जिनकी रक्षा की केवल वे ही उस समय बचे रहे।
का मदेव के प्रसंग में ये पंक्तियां आई हैं। काम ने अपना ऐसा प्रभाव दिखाया कि कोई नहीं बचा, लेकिन वो बच गए जिनकी भगवान ने रक्षा की। इस समय कोरोना ने ऐसा ही प्रभाव दिखाया है। न कोई बड़ा बचा न छोटा। सब चपेट में हैं। फिर क्या किया जाए। इस पंक्ति से सीखा जाए भगवान जिनकी रक्षा करेंगे वही बच जाएंगे। इसलिए भगवान में भरोसा बनाए रखिए। भगवान सतर्कता का नाम है, संयम का नाम है।

कुपथ मार्ग रुच व्याकुल रोगी। बेद न देहिं सुनहुं मुनि रोगी।।

अर्थात : हे योगी मुनि सुनिए रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य मांगे तो वैद्य उसे नहीं देता। ये बात भगवान विष्णु ने नारद से बोली थी नारद मोह प्रसंग में। हम इसको अपने जीवन से यूं जोड़ें कि हमारे डॉक्टर इस रोग का निदान जानते हैं। इसलिए अगर कोरोना वॉरियर्स हमारे साथ सख्ती करें, हमें समझाएं, हमें इलाज बताएं तो उनपर भरोसा रखिए।

परसासीस सरोरह पानी। कर मुद्रिका दीनि जन जानी।।

अर्थात : उन्होंने उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर अपनी अंगूठी उतारकर दी। ये पंक्ति उस समय की है जब श्रीरामजी ने सीताजी की खोज में जा रहे वानरों में हनुमानजी को रोका और अपना हाथ उनपर फिराया और उनको अपनी अंगूठी दी। रामजी ऐसी अंगूठी सब भक्तों को दे रहे हैं। आज इस कोरोनाकाल में इस मुद्रिका के प्रतीक के रूप में मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और हैंडवॉश पर भरोसा करना चाहिए।

उलटि पलटि लंका सब जारि। कूदि परा पुनि सिंधु म झारी।।

अर्थात : हनुमानजी ने उलट-पलट कर लंका जला दी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े।

ये पंक्तियां उस समय की हैं जब हनुमानजी ने लंका जलाई थी। रावण के कहने पर राक्षसों ने हनुमानजी को घेर लिया था और उनकी पूंछ में आग लगाई थी, लेकिन विपरीत स्थिति को उन्होंने अवसर में बदला। ये पंक्तियां आपदा को अवसर में बदलने की सीख देती हैं। हम हनुमानजी से सीखें कि कोरोना से लड़ने के लिए शतप्रतिशत प्रयास करना पड़ेगा। अपने आपको सुरक्षित रखें। सावधान रहें।

मंगलभवन अमंगल हारी। द्रवहुं सो दशरथ अजिर बिहारी।।

अर्थात : अमंगल को हरने वाले बालरूप श्रीरामचंद जी मुझपर कृपा करें।

ज ब पार्वतीजी ने शंकर जी से रामकथा पूछी तो रामजी को याद करके शंकर जी ध्यान में डूब गए। जब ध्यान से बाहर आए तो बालरूप की वंदना में ये पंक्ति कही। इस पंक्ति को उस समय याद करें जब हमें ये भय लगे कि कोरोना का आक्रमण हमारे घर में हो सकता है। तो हम श्रीरामजी से प्रार्थना करें कि जैसे आप दशरथ के आंगन में खेले हमारे आंगन में उतरिए। हमारा परिवार सुरक्षित रहे।

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कौशलपुर राजा।।

अर्थात : अयोध्या के राजा श्रीराम को हृदय में रखकर सब काम कीजिए।

ह नुमानजी जब लंका में गए तो सुरक्षा अधिकारी लंकिनी मिली थी। हनुमानजी ने उसके सिर पर मुक्का मारा तो उसने हनुमानजी से क्षमा मांगी और कहा कि आप लंका में प्रवेश कीजिए। जब भी घर से निकलें या कहीं भी प्रवेश करें इसे जरूर याद करिए। अयोध्या पुरी के राजा को हृदय में रखते हुए सब काम करिए। परिश्रम, सतर्कता और भगवान की कृपा बनी रहे तो हम कोरोना रूपी महामारी से बचे रहेंगे।

काहु न कोऊ सुख-दुख कर दाता। निज कृत करब भोग सबु भ्राता।।

अर्थात : किसी को सुख-दुख देने वाला कोई नहीं है। सब कर्मों का फल भोगते हैं।

ल क्ष्मण जी ने निषाद को समझाते हुए कहा था कि इस संसार में कोई सुख दुख आए तो अपने ही कर्मों का परिणाम मानना। आज यदि कोविड-19 के कारण हमारे जीवन में परेशानी आई है तो एक मूल्यांकन ये भी करिए कि कहीं न कहीं हमारा कोई योगदान जरूर रहा होगा। तो इससे थोड़ा धैर्य बढ़ेगा और आत्मविश्वास जागेगा। इन्हीं दो चीजों की मदद से हम महामारी को हरा पाएंगे। जेहि सायक मारा मैं बालि। तेहि सर हतों मूढ़ कह काली।। अर्थात : जिस बाण से मैंने बालि को मारा था उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूंगा। यानी अच्छे परिणाम के लिए कुछ काम कल पर छोड़ना उचित रहता है।

लक्ष्मण जी ने एक बात बोली थी-कल क्यों मारेंगे। यहां काली शब्द का अर्थ है कल और भगवान कहते हैं-कुछ निर्णय कल तक छोड़ने ही पड़ते हैं। कल काल का प्रतीक है और वो कल आज आ गया। भगवान श्रीराम ने कल कहके हमें बताया था कि अवसर लाना पड़ता है। अनुकूल समय को अपने जीवन में लाने के लिए प्रयास करना पड़ता है। आज हम सबकी वो खोज पूरी हो रही है, जिसमें अनेक लोगों ने अपना योगदान और बलिदान दिया है। हनुमानजी तो लंका गए थे, आइए हम सब अयोध्या चलते हैं और ये जो घटना हो रही है इससे एक सबक लें कि ये आंदोलन और ये नींव पूजन पूरी दुनिया को हमारे देश से दिया गया संदेश है कि अच्छे काम पूरे अवश्य होते हैं। इस महामारी के दौर में राम मंदिर की नींव पूजा हमें आश्वस्त कर रही है कि इस बीमारी से डरना मत। हमारी आत्मा का मंदिर जिसपर महामारी का ढांचा बन गया है, ये ढांचा हटेगा और वापस उस आत्मा के मंदिर पर पहुंचेंगे, जिसके लिए हम भारतीय इस देह को लेकर पैदा हुए हैं। बीमारी आई है तो जाएगी भी।

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