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कोरोना:ऑक्सीजन क्राइसिस, मरीजों को पेट के बल लेटाकर ऑक्सीजन दी, रोज बचाए 150 सिलेंडर

कोटा4 दिन पहले
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इस तरह दे रहे हैं मरीज को ऑक्सीजन।
  • इस पाेजिशन काे कहते हैं अवेक प्रॉनिंग, पहले राेज 950 सिलेंडर लगते थे, अब यह आंकड़ा 800 पर आया

सीमित संसाधनों में काम करना कोई हमारे डॉक्टरों से सीखे। जिन्होंने न सिर्फ कम संसाधनों में काम किया, बल्कि उसके बेहतर रिजल्ट भी आए। बात कर रहे हैं मेडिकल कॉलेज के एनीस्थिसिया डिपार्टमेंट के डॉक्टरों की उस टीम की, जिसने कोटा में ऑक्सीजन क्राइसिस के बीच ही कुछ ऐसे तरीके काम में लिए, जिनसे मरीजों की ऑक्सीजन डिपेंडेंसी कम हुई और रोज की ऑक्सीजन खपत में भी कमी आ गई। प्रिंसिपल डॉ. विजय सरदाना ने भी इस पूरी टीम को बधाई दी है, क्योंकि वे खुद आईसीयू में भर्ती रहने के दौरान उनकी इस मेहनत के साक्षी रहे हैं।

काेटा में कुछ समय पहले मेडिकल कॉलेज में रोज ऑक्सीजन सिलेंडरों की खपत 950 तक पहुंच गई थी। उस समय एनीस्थिया डिपार्टमेंट के डॉक्टरों की टीम के होश उड़े रहते थे, क्योंकि एक इंटेंसिविस्ट के तौर पर आईसीयू में ऑक्सीजन या वेंटीलेटर मैनेजमेंट का काम इसी विभाग का होता है। इस टीम में कई सदस्य ऐसे भी हैं, जिन्होंने पूरी-पूरी रात पलक तक नहीं झपकी। क्योंकि उन्हें ऑक्सीजन के इंतजाम के साथ-साथ मरीजों की स्थिति पर भी निगाह रखनी होती थी। ‘अवेक प्रॉनिंग’ से कोरोना पेशेंट्स की स्थिति में हुआ सुधार, मरीजों को मोटिवेट भी कर रही टीम

एनीस्थिसिया विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ऊषा दड़िया ने भास्कर को बताया कि हम और रेजीडेंट्स के साथ-साथ डॉ. ममता शर्मा व डॉ. चिरंजी केड़िया उन दिनों रात-दिन इसी चिंता में रहते थे कि ऑक्सीजन रिक्वायरमेंट कैसे कम की जाए? ऑक्सीजन की खपत बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। हमने गाइडलाइंस खंगाली तो सामने आया कि कोविड में “अवेक प्रॉनिंग’ ऐसा तरीका है, जो मरीज के लिए भी फायदेमंद है और इससे ऑक्सीजन की जरूरत भी कम होती है।

इसमें मरीज को कई-कई घंटों तक उल्टा यानी पेट के बल लिटाया जाता है और उसी पाेजिशन में ऑक्सीजन दी जाती है। इससे मरीज की ऑक्सीजन डिपेंडेंसी भी कम होती है और खपत तो स्वाभाविक रूप से घटती ही है। हमने पाया कि जिन मरीजों का सेचुरेशन 85 था, उनका कुछ ही समय में इस पाेजिशन पर 95 आने लगा और बहुत जल्दी उन्हें ऑक्सीजन देने की जरूरत खत्म हाे गई।

डॉ. ऊषा के मुताबिक, इस पूरे काम में सबसे ज्यादा चैलेंजिंग होता है मरीज को मोटिवेट करना। मरीज को ऐसे लगता है कि उसकी ऑक्सीजन घटाई ताे वह दम ताेड़ देगा। सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि मरीज के पास कोई परिजन भी नहीं होता। ऐसे में हमारे डॉक्टरों ने मोटिवेशन किया, मरीजों को समझाया कि उनकी ऑक्सीजन डिपेंडेंसी कम करने के लिए ऐसा किया जा रहा है, उन्हें पाेजिशन समझाई और लेटाने के बाद कई घंटों तक मॉनीटर किया।

शुरुआत में मरीज इसे लेकर कंफर्टेबल नहीं हाेते, क्योंकि कुछ देर के लिए उन्हें बहुत तकलीफ होने लगती है। बाद में वे सामान्य होने लग जाते हैं। कुछ मरीज ऐसे भी होते थे, जो हम ऑक्सीजन फ्लो कम करके जाते और पीछे से खुद ही ऑक्सीजन फ्लो बढ़ा लेते। ऐसे मरीजों को भी कई-कई बार समझाया गया।
हमारी डॉक्टरों की टीम बहुत मेहनत कर रही है। इसकी बदौलत ही सारे मरीजों को ऑक्सीजन मैनेज हो रही है। इस टीम ने तौर-तरीके बदलकर रोज 100 से 150 सिलेंडर तक बचाए हैं। इस वक्त ऑक्सीजन को खर्च के हिसाब से नहीं, बल्कि जीवन के तौर पर आंका जाना चाहिए। इन बचे हुए सिलेंडरों से दूसरे मरीजों की जान बचाने का श्रेय भी इसी टीम को जाना चाहिए।
डॉ. विजय सरदाना, प्रिंसिपल, मेडिकल कॉलेज

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