जायकाकोटा के कड़क 'कड़के', 120 साल पुराना स्वाद:सरकारी नौकरी छोड़ लगाया ठेला; अमेरिका-जापान से भी आ रहे ऑर्डर

कोटा4 महीने पहलेलेखक: मुकेश सोनी

कोचिंग के लिए मशहूर सिटी कोटा। यहां लोगों के दिन की शुरुआत हींग से बनी कचौरी से होती है, लेकिन जब तक चाय की चुस्की लेते समय कड़कदार कड़के न मिल जाएं, सारा स्वाद अधूरा रहता है। बारिश में तो डिमांड कई गुना बढ़ जाती है। ये हैं कोटा के कड़के। जिसके तीखे और कुरकुरे स्वाद के दीवाने विदेशों में भी हैं।

राजस्थानी जायका की टीम इस बार पहुंची रामपुरा की उन तंग गलियों में जहां गरमा-गरम कड़कों की महक हर किसी का ध्यान खींच लेती है...

शहर में खाने के शौकीन हींग कचौरी को 'कोटा की रानी' कहकर बुलाते हैं, तो कड़कों को 'कोटा का राजा' कहा जाता है। बेसन के मोटे कड़क सेव को यहां कड़के नाम से जाना जाता है। जिसकी शुरुआत करीब 120 साल पहले सन 1902 में बाल जी सैनी ने की थी।

उनके 72 साल के पोते मोहन सैनी आज भी सुबह 6 बजे भट्टी जलाकर कड़के के पाये तैयार करने में जुट जाते हैं। 7 बजते ही दुकान के बाहर ग्राहकों की भीड़ लगती है। दिनभर 12 से 15 घंटे ऐसा स्वाद तैयार करते हैं जो कहीं और नहीं मिलता। बाल जी सैनी की चौथी पीढ़ी भी इसी काम में उनका हाथ बंटाती है।

मोहन सैनी ने बताया कि रियासत काल में उनके दादा ने कड़के नमकीन बनाना शुरू किया था। जिसके बाद उनके पिता बक्क्षा सैनी ने कारवां आगे बढ़ाया। वो खुद 18 साल की उम्र से कड़के नमकीन बना रहे हैं। इस कारण उन्होंने डाक विभाग में मिली सरकारी नौकरी भी जॉइन नहीं की। पैतृक बिजनेस में लग गए। इसी काम की बदौलत बड़े बेटे को डॉक्टर बनाया।

आखिर क्यों है कड़के इतने फेमस

यूं तो शहर में नमकीन की कई वैरायटी मिलती हैं, लेकिन तेज मिर्च मसालों के शौकीनों को कड़के ही पसंद आते हैं। इसमें पिसी हुई लाल मिर्च की बजाय कुटी हुई लाल मिर्च डाली जाती है। कड़के मूंगफली या रिफाइंड में नहीं, बल्कि शुद्ध अलसी के तेल में तैयार होते हैं। इससे कड़के का स्वाद और भी बढ़ जाता है।

मोहन सैनी बताते हैं कि आज तक क्वालिटी से समझौता नहीं किया। शहर के दूसरे कौने में कई दुकानदारों ने कड़के बनाने की कोशिश की, लेकिन ऐसा स्वाद नहीं ला पाए। आज क्रिस्पी और तीखे स्वाद के कारण दूर-दूर से लोग कड़के नमकीन लेने आते हैं।

1 रुपए से 240 रुपए किलो का सफर देखा

मोहन जी बताते हैं 60 सालों में उन्होंने कई बदलाव देखे, लेकिन कड़के नमकीन का टेस्ट में बदलाव नहीं होने दिया। 1960 में कड़के नमकीन एक रुपए किलो बेचा करते थे। उस जमाने में अलसी के तेल का टिन 16 रुपए का आता था। आज कड़के नमकीन 240 रुपए किलो में बेच रहे हैं। अलसी के तेल का टिन 3000 रुपए का आता है। पहले ठेले पर नमकीन बेचा करते थे, अब गली में दुकान लगा रखी है।

अलसी के तेल में फ्राई करके बनाए जाने वाले कड़के नमकीन की खास बात यह है कि इन्हें खाने से पेट खराब नहीं होता। ये हाजमे के लिए बेहतर है। कई दुकानदारों ने कड़के नमकीन बनाने की कोशिश की लेकिन स्वाद नहीं बैठ पाया।

रोज 1000 किलो की बिक्री

मोहन जी बताते है कि वो रोज 30 किलो बेसन के कड़के बनाते हैं। उनके भाई का बेटा भी 30 किलो के कड़के बनाता है। रामपुरा इलाके में और भी दुकाने हैं जहां कड़के बनाए जाते हैं। शहर में करीब 1000 किलो के आस-पास कड़के की खपत रोज होती है। फेस्टिवल सीजन में ब्रिक्री और भी बढ़ जाती है।

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