मथुराधीश जी डेढ़ साल बाद देंगे दर्शन:कोटा के आराध्य शाम 5 बजे संध्या आरती में देंगे दर्शन, पास के आधार पर 100 लोगों को ही एंट्री, वैक्सीन की दोनों डोज भी जरूरी

कोटाएक महीने पहले
डेढ़ साल के इंतजार के बाद आज से श्रीमथुराधीश प्रभु मंदिर के पट खुलेंगे।

डेढ़ साल के इंतजार के बाद आज से श्रीमथुराधीश प्रभु मंदिर के पट खुलेंगे। भक्त आज से मथुराधीश भगवान के दर्शन कर सकेंगे। भक्तों को शाम 5 बजे संध्या भोग आरती के दर्शन कराए जाएंगे। इसके लिए श्रीबड़े मथुरेशजी टेंपल बोर्ड की ओर से पास की व्यवस्था जारी की गई है। पहले दिन 100 पासधारी भक्त ही भगवान के दर्शन कर सकेंगे।

मंदिर में दर्शन के लिए रेलिंग और बैरिकेडिंग अंदर तक लगवाई गई है।
मंदिर में दर्शन के लिए रेलिंग और बैरिकेडिंग अंदर तक लगवाई गई है।

मंदिर में दर्शन के लिए रेलिंग और बैरिकेडिंग अंदर तक लगवाई गई है। एक बार में केवल 5 लोगों को मंदिर में प्रवेश कराया जाएगा। पास लेने वाले दर्शनार्थियों को भी कोविड प्रोटोकॉल का पालन करना होगा। इसके लिए मंदिर प्रबंधन को भी ट्रेनिंग दी गई है। प्रारंभिक तौर पर मंदिर में अभी एक समय ही दर्शन शुरू किए जा रहे हैं। भक्तों को आधार कार्ड व वैक्सीन दोनों डोज के सर्टिफिकेट के आधार पर ही पास जारी किए जा रहे हैं। मंदिर प्रबंधन के अनुसार अभी केवल 100 लोगों को ही दर्शन के लिए एंट्री मिलेगी।

कोटा के आराध्य हैं मथुराधीश जी
मथुराधीश जी कोटा शहरवासियों के आराध्य हैं। कोरोना की वजह से डेढ़ साल से भक्तों के लिए दर्शन बंद थे। अभी केवल 100 लोगों को अनुमति दी गई है। हालांकि सामान्य दिनों में रोज 2 हजार, रविवार और अवकाश वाले दिनों में 3 से 4 हजार, उत्सव पर्वों पर 10 से 12 हजार व पूरे सालभर में लगभग 12 से 15 लाख भक्त प्रभु के दर्शन करते हैं। मंदिर में मंगला आरती, ग्वाल, राज भोग आरती, उत्थापन, शयन के दर्शन होते हैं। शयन के दर्शन रामनवमी से बंद रहते हैं। कार्तिक बदी अष्टमी में खुलने लग जाते हैं। यहां के विभिन्न उत्सवों में अन्नकूट, जन्माष्टमी, जलझूलनी एकादशी, फागोत्सव, होली, दीपावली आदि प्रमुख त्योहार में भक्तों का सैलाब होता है।

वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ और तीर्थ है
वल्लभ संप्रदाय में भगवान श्रीकृष्ण के सप्त स्वरूपों की सेवा की जाती है। पाटनपोल स्थित श्री मथुराधीश मंदिर वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ और तीर्थ है। इसके अनुयायी देश विदेश में मौजूद हैं। संवत 1795 में कोटा के महाराज दुर्जनशाल ने प्रभु को कोटा लाए थे। कोटा नगर में पाटनपोल द्वार के पास प्रभु का रथ रुक गया तो तत्कालीन आचार्य गोस्वामी श्री गोपीनाथ महाराज ने आज्ञा दी कि प्रभु की यहीं विराजने की इच्छा है। तब कोटा राज्य के दीवान द्वारकादास राय ने अपनी हवेली को गोस्वामी जी के सुपुर्द कर दिया था। गोस्वामी जी ने उसी हवेली में कुछ फेरबदल कराकर प्रभु को विराजमान किया। तब से अभी तक प्रभु इसी हवेली में विराजमान हैं। यहां वल्लभ कुल सम्प्रदाय की रीत के अनुसार सेवा होती है। इससे पहले ठाकुर जी की प्रतिमा को महाराव दुर्जनसाल बूंदी से लेकर आए थे।

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