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बाढ़ से तबाही की दर्दनाक कहानी:ठंडी रोटी खाकर और बारिश का पानी पीकर गुजारा किया; गांव के गांव मलबे में बदले, जो मकान बचे वो भी गिरने की कगार पर

कोटा2 महीने पहलेलेखक: मुकेश सोनी

राजस्थान ने बारिश का ऐसा कहर पहले नहीं देखा। खेत के खेत पानी में डूबे हुए हैं, जगह-जगह कच्चे घर जमींदोज हैं, गांव के गांव उजड़ गए। इटावा उपखंड के बाढ़ प्रभावित इलाकों में बर्बादी का मंजर रोंगटे खड़े करने वाला है। यहां करीब 5 हजार कच्चे मकान टूट गए हैं। जो बचे वो भी टूटने की कगार पर हैं। 5 ग्राम पंचायत ऐसी हैं, जहां ज्यादातर घर मलबे में बदल चुके हैं। घर तबाह होने की वजह से यहां लोगों के सिर पर छत नहीं बची है। घर मे रखा राशन नष्ट हो चुका है। बाढ़ के दौरान घर में ही फंसे लोगों को ठंडी रोटी खाकर और बारिश का पानी पीकर गुजारा करना पड़ा। अब रिश्तेदारों के घर पर शरण लिए हुए हैं। इटावा उपखंड के 30 पंचायत के 174 गांव में फसलें नष्ट हो गई है। कई मवेशी मर गए।

पानी उतरने के बाद उजड़े हुए गांव आज भी तबाही की कहानी कह रहे हैं।
पानी उतरने के बाद उजड़े हुए गांव आज भी तबाही की कहानी कह रहे हैं।

करीब 5 हजार से ज्यादा कच्चे मकान टूटे हैं। इतने ही मकान पानी भरने से टूटने की कगार पर हैं। इटावा में 3 अगस्त की रात को बाढ़ आई थी, लेकिन 8 दिन बाद भी कई गांव में पानी भरा है। कुदरत की मार ने ग्रामीणों की कमर तोड़कर रख दी है। ग्रामीण प्रशासनिक मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

कुदरत की मार ने ग्रामीणों की कमर तोड़कर रख दी है।
कुदरत की मार ने ग्रामीणों की कमर तोड़कर रख दी है।

कुदरत की मार सबसे ज्यादा खातौली, डूंगरली बोरदा, लुहावद, रजोपा, सिनोता ग्राम पंचायत के दर्जनों गांववासियों को झेलनी पड़ी। गांव के अधिकांश मकान जमींदोज हो चुके हैं और मलबे का ढेर बन चुके हैं। जो बचे हैं, उनमें से अधिकतर की हालत अब रहने लायक नहीं है। वो कभी भी टूटकर गिर सकते हैं। सरकारी नुमाइंदे भले ही गांवों में सर्वे कर आर्थिक नुकसान का आकलन कर ले, पर इनके दुख, दर्द, पीड़ा का आकलन कर पाना मुश्किल है।

गांव के अधिकांश मकान जमींदोज हो चुके हैं और मलबे का ढेर बन चुके हैं।
गांव के अधिकांश मकान जमींदोज हो चुके हैं और मलबे का ढेर बन चुके हैं।

बोरदा पंचायत
बोरदा पंचायत में बोरदा व सन्मानपुरा गांव आते है। यहां 850 मकानों में लगभग 3500 की आबादी रहती है। 3 अगस्त से 4 अगस्त की सुबह तक बारिश के जलजले ने सबकुछ तबाह कर दिया। लगभग 200 परिवार बेघर हो गए।

बारिश के कारण मकान गिरने से उसमें रखी धान खराब हो गई।
बारिश के कारण मकान गिरने से उसमें रखी धान खराब हो गई।

छोटे भाई की शादी कैसे करूं?
गांव के मनराज मीणा के घर में माता-पिता, छोटा भाई थे। पत्नी 1 साल के बेटे को लेकर पीहर गई हुई थी। मनराज ने उस रात को आंख तक नहीं झपकाई। रातभर सामान बांधते रहे। मकान में घुटनों तक पानी था। सुबह 6 बजते ही घर छोड़ना पड़ा। पड़ोसी गांव ककरावदा वालों ने मदद की। गांव वाले ट्रैक्टर लेकर आए, उनके रहने व खाने की व्यवस्था की। मकान में करीब 30 क्विंटल चना व 5-6 क्विंटल सोयाबीन रखा था। सब पानी मे गीला हो गया। मनराज को बुआ की लड़की की शादी में मौसाला करने व छोटे भाई की शादी की चिंता सता रही है। छोटे भाई की शादी की बात चल रही थी। बारिश ने फसल व घर में रखा धान तबाह कर दिया। मकान भी टूटने की स्थिति में है। मनराज का कहना है कि भगवान ने बहुत कठिन परीक्षा ली है।

मकान का एक हिस्सा पूरा टूट चुका है। सामान अभी भी दबे हुए है। रहने की जगह नहीं है।
मकान का एक हिस्सा पूरा टूट चुका है। सामान अभी भी दबे हुए है। रहने की जगह नहीं है।

रहने की जगह नहीं बेघर हो गए
बोरदा पंचायत के मनोज मीणा नई बस्ती (ड्रेन कॉलोनी) में रहते है। इस कॉलोनी में 25 मकान थे। जिनमें से कई टूट गए,कुछ टूटने की कगार पर हैं। सभी परिवार यहां से चले गए। परिवार में माता पिता,भाई बहिन समेत 5 लोग है। परिवार खेती पर निर्भर है। 3 अगस्त की रात को मकान टूट गया था। रातों रात परिवार सहित घर से निकले और पीछे वाले मकान में शिफ्ट हुए।

2 दिन बाद दूसरे गांव नीमरा में जाना पड़ा। घर मे डेढ़ ट्रॉली गेंहू व 7-8 क्विंटल चना रखा था। सब खराब हो गया। मकान का एक हिस्सा पूरा टूट चुका है। सामान अभी भी दबा हुआ है। रहने की जगह नहीं है। परिवार के सदस्य रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं। मनोज का कहना है कि अब तो रहने की जगह भी नहीं बची, बेघर हो गए। जाएं तो जाएं कहां?

सात कमरे का मकान अब मलबे के ढेर में तब्दील हो गया है।
सात कमरे का मकान अब मलबे के ढेर में तब्दील हो गया है।

दहलीज का गेट तबाही की कहानी कह रहा
बोरदा के ही लटूरलाल का सात कमरे का मकान था। वो अब मलबे के ढेर में तब्दील हो गया है। बचा है तो केवल दहलीज का गेट, जो अपनी तबाही की कहानी कह रहा है। गांव की महिला सुनीता ने लहसुन की फसल को घर में सहेज कर रखा। सोचा था कि मानसून के बाद अच्छे भाव मिलने पर बेचेगी, लेकिन होनी को जैसे कुछ और ही मंजूर था। पूरी फसल पानी में गल कर खराब हो गई।

रजोपा पंचायत
यही हाल रजोपा पंचायत के गांव में देखने को मिला। पंचायत में रजोपा, केशवपुरा, हथौली, रामपुरिया, फतहपुर, किशनपुरा गांव आते है। इनमें केशवपुरा,रजोपा व हथौली में गांववासियों पर दुःखों का पहाड़ टूटा है।

कुदरत के कहर ने एक पल में ही घर से बेघर कर दिया।
कुदरत के कहर ने एक पल में ही घर से बेघर कर दिया।

ठंडी रोटी खाई, बारिश का पानी पिया
परमानंद सुमन रजोपा पंचायत के केशवपुरा गांव में अपनी मां, छोटे भाई का परिवार व दो बच्चों के साथ रहते हैं। 4 अगस्त को सवेरे 5 बजे मकान में 1 फीट पानी भर गया। उस रात परिवार के सदस्य सोए नहीं। सामान बांधने में लग गए। मकान के बाहर 4 से 6 फीट पानी था। बाहर नहीं जा सके। एक दिन घर में कैद रहे। ठंडी रोटी खाई। मकान के छत के चद्दर से गिरा पानी स्टोर करके पीना पड़ा। दूसरे दिन पानी उतरने पर घर से बाहर निकले। मकान जगह-जगह से दरक रहा है। जैसे-जैसे धूप लगती है, वैसे वैसे मकान में दरारें आना शुरू हो गई है और टूटने का खतरा बना हुआ है।

मकान का आधा हिस्सा जमींदोज हो गया है। बाकी बचे हिस्से में जॉइंट छूट गए हैं। पानी सूखने के साथ ही मकान फैलता जा रहा है।
मकान का आधा हिस्सा जमींदोज हो गया है। बाकी बचे हिस्से में जॉइंट छूट गए हैं। पानी सूखने के साथ ही मकान फैलता जा रहा है।

स्कूल में रहने को मजबूर
जेपी मीणा के मकान का आधा हिस्सा जमींदोज हो गया है। बाकी बचे हिस्से में जॉइंट छूट गए हैं। पानी सूखने के साथ ही मकान फैलता जा रहा है। कभी भी गिर सकता है। अपने माता-पिता और 3 बच्चों के साथ पिछले 8 दिन से सरकारी स्कूल में रहने को मजबूर हैं। 4 अगस्त को अचानक मकान में पानी भर गया था। परिवार के सदस्य पानी घुसने वाली जगह पर रात भर मिट्टी लगाते रहे। बाल्टी भर-भरकर पानी को बाहर निकालते रहे। घर में बंधे जानवर डूब गए। दूसरे दिन जैसे-तैसे रिश्तेदार के यहां गए, फिर बाद में स्कूल में शरण ली। कुदरत के कहर ने एक पल में ही घर से बेघर कर दिया।

मकान में रखा धान गीला होने से बचाने के लिए कट्टो में भरकर खाट पर रखा। पूरी रात खड़े रहकर जागते रहे।
मकान में रखा धान गीला होने से बचाने के लिए कट्टो में भरकर खाट पर रखा। पूरी रात खड़े रहकर जागते रहे।

पूरी रात जागे
यही हाल चन्दप्रकाश का है। परिवार में 2 बच्चों सहित 5 सदस्य हैं। पानी भरने से मकान बैठ गया। मकान में रखा धान गीला होने से बचाने के लिए कट्टो में भरकर खाट पर रखा। पूरी रात खड़े रहकर जागते रहे। बचा हुआ सामान ट्रेक्टर में डालकर सरकारी स्कूल में रखा है। वर्तमान में सरकारी स्कूल में रहने को मजबूर है।

ग्रामीण पड़ोसी व रिश्तेदारों के यहां रहकर दिन गुजार रहे हैं।
ग्रामीण पड़ोसी व रिश्तेदारों के यहां रहकर दिन गुजार रहे हैं।

राहत का इंतजार
महमूद खान का आशियाना भी बारिश के कहर में बिखर गया है। 3 अगस्त की रात को मकान में घुटनों तक पानी था। 4 अगस्त को सुबह 6 बजे जैसे-तैसे पड़ोसी के मकान में पहुंचकर शरण ली। राहत कैंप इटावा में बनाया हुआ है। जो गांव से 7-8 किलोमीटर पड़ता है, इसलिए फिलहाल पड़ोसी व रिश्तेदारों के यहां रहकर दिन गुजार रहे हैं और सरकारी राहत के इंतजार में बैठे है।

अधिकांश मकान मलबे का ढेर बन चुके हैं। जो अब भी खड़े हैं, उनकी हालत अब रहने लायक नहीं है।
अधिकांश मकान मलबे का ढेर बन चुके हैं। जो अब भी खड़े हैं, उनकी हालत अब रहने लायक नहीं है।
मदनपुरा गांव में बाढ़ के बाद मकान की हालत।
मदनपुरा गांव में बाढ़ के बाद मकान की हालत।

गांवों में चारों ओर तबाही का मंजर दिखाई पड़ता है। एक भी घर ऐसा नहीं था, जो सुरक्षित हो। ज्यादातर मकान मलबे का ढेर बन चुके हैं। जो खड़े है, उनकी हालत अब रहने लायक नहीं है। खातौली के मदनपुरा गांव में 70 प्रतिशत मकान पार्वती नदी के पानी भरने के कारण ढह गए। इटावा क्षेत्र के लुहावद ,अमरपुरा ,गणेशपुरा, गणेशखेड़ा, रामपुरिया धाभाई, छापौल, आसीदा व कैथूदा तथा सुल्तानपुर क्षेत्र के सनीजा बावड़ी, किशनगंज, बुढादीत और बनेठिया सहित अन्य जगहों से दर्द, आंसू और तबाही की कहानियां सुनाई देती है।

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